بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

क़ुरान व हदीस में फज्र और असर नमाज़ों की खुसूसी ताकीद

नमाज़ पढ़ने वालों में से हमारे कुछ भाई, फज्र और असर खास कर फज्र नमाज़ में कोताही करते है, हालांकि क़ुरान व हदीस में इन दोनों नमाज़ों (फज्र और असर) की खास ताकीद व अहमियत मज़कूर है, जैसा कि नीचे की आयात व आहादीस से मालूम होता है।
“नमाज़ों की हिफाज़त करो बिलखुसूस दरमियान वाली नमाज़ (यानी असर) की, और अल्लाह तआला के सामने अदब से खड़े रहो।” (सूरह अलबक़रा 238)
“नमाज़ क़ायम करो आफताब के ढलने से लेकर रात की तारीकी तक और फज्र का क़ुरान पढ़ना भी। यक़ीनन फज्र का क़ुरान पढ़ना हाज़िर किया गया।” (यानी उस वक़्त फरिश्ते हाज़िर होते हैं) (सूरह बनी इसराइल 78)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स दो ठंडी नमाज़ें (फज्र और असर) पाबन्दी से पढ़ता है वह जन्नत में दाखिल होगा। (बुखारी) तजरबा है कि फज्र व असर का एहतेमाम करने वाला यक़ीनन दूसरी नमाज़ों का भी एहतेमाम करने वाला होगा।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया वह शख्स हरगिज़ जहन्नम में दाखिल नहीं होगा जिसने सूरज के निकलने से पहले यानी फज्र और सूरज के डूबने से पहले यानी असर की नमाज़ें पाबन्दी से पढ़ी होंगी। (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हारे पास रात और दिन के फरिशते बारी बारी आते रहते हैं और वह फज्र और असर की नमाज़ों में इकट्‌ठे होते हैं। फिर फरिशते जो तुम्हारे पास होते हैं, आसमान पर चले जाते हैं तो अल्लाह तआला उन से पूछता है हालांकि वह सबसे ज़्यादा जानता है कि तुमने मेरे बन्दों को किस हाल में छोड़ा। फरिशते कहते हैं कि हम उन्हें नमाज़ की हालत में छोड़ कर रूख्सत हुए और नमाज़ ही की हालत में उनके पास पहुंचे थे। (बुखारी व मुस्लिम)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने चौदहवीं के चांद को देखा तो फरमाया, तुम अपने रब को ऐसे ही देखोगे जैसे इस चांद को देख रहे हो, तुम्हें ज़रा ज़रा भी शक व शुबहा नह होगा, लिहाज़ा तुम अगर सूरज के निकलने और डुबने से पहले की नमाज़ों (फज्र और असर) का एहतेमाम कर सको तो ज़रूर करो। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह आयत तिलावत फरमाई, तरजुमा ‘‘सूरज के निकलने और डुबने से पहले अपने रब की पाकी बयान करो।” (बुखारी व मुस्लिम) इस हदीस से मालूम हुआ कि नमाज़ों की पाबन्दी खासकर फज्र और असर की नमाज़ों के एहतेमाम से जन्नत में अल्लाह तआला का दीदार होगा जो जन्नत की नेमतों में सबसे बड़ी नेमत है।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स फज्र की नमाज़ पढ़ता है वह अल्लाह तआला की हिफाज़त में आ जाता है (लिहाज़ा उसे न सताओ) और इस बात का ख्याल रखो कि अल्लाह तआला अपनी हिफाज़त में लिए हुए शख्स को सताने की वजह से तुम किसी चीज़ का मुतालबा न फरमाएं क्योंकि जिससे अल्लाह तआला अपनी हिफाज़त में लिए हुए शख्स के बारे में मुतालबा फरमाऐंगे उसकी पकड़ फरमाऐंगे फिर उसे फिर उसे उल्टे मुंह जहन्नम की आग में डाल देंगे
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स इशा की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े गोया कि उसने आधी रात इबादत की और जो फज्र की नमाज़ भी जमाअत के साथ पढ़ले गोया कि उसने पूरी रात इबादत की। (मुस्लिम)

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स की असर की नमाज़ छूट गई वह ऐसा है कि गोया उसके घर के लोग और माल व दौलत सब छीन लिया गया हो। (बुखारी व मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने असर की नमाज़ छोड़ दी उसके सारे आमाल बरबाद हो गए। (बुखारी)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने ऐसे शख्स का तज़किरा किया गया जो सुबह होने तक सोता रहता है (फज्र की नमाज़ नहीं पढ़ता है) तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ऐसे शख्स के कानों में शैतान पेशाब कर देता है। (बुखारी व मुस्लिम)
नमाज़े फज्र की बाजमाअत अदाएगी में मुआविन चंद उमूर
अगर नीचे में लिखे हुए चंद बातों का खास एहतेमाम रखा जाए तो इंशाअल्लाह फज्र की नमाज़ जमाअत के साथ अदा करना आसान होगा।
1) फज्र की नमाज़ जमाअत से अदा करने के फज़ाएल हमारे सामने हों।
2) फज्र की नमाज़ जमाअत से अदा न करने की वईदें हमें मालूम हों।
3) रात को जितना जल्दी हो सके सोने की कोशिश करें।
4) सोते वक़्त फज्र की नमाज़ जमाअत से अदा करने का पक्का इरादा करें और इरादा करने में इखलास भी हो।
5) ऐसे असबाब इखतियार करें जिनसे फज्र की नमाज़ के लिए उठना आसान हो। मसलन अलारम वाली घड़ी में मुनासिब वक़्त पर अलारम सेट करके उसको मुनासिब जगह पर रखें या किसी ऐसे शख्स से जो फज्र की नमाज़ के लिए पाबन्दी से उठता है घंटी बजाने या दरवाजे खटखटाने की ताकीद कर दें वगैरह।
6) वज़ू करके और अल्लाह के ज़िक्र के साथ सोएं क्योंकि अल्लाह का नाम लेकर सोने की वजह से शैतान के हमले से हिफाज़त रहेगी।
7) अगर मुमकिन हो तो दोपहर का खाना खा कर थोड़ी देर आराम कर लिया करें।
8) मगरिब से पहले और मगरिब और इशा के दरमियान न सोएं।
9) दूसरी चार नमाज़ों की पाबन्दी करें, उसकी बदौलत पांचवीं की तौफीक होगी। (इंशा अल्लाह)
अगर इन बातों की रिआयत करके सोएंगे तो इंशा अल्लाह फज्र की नमाज़ जमाअत के साथ अदा करना आसान होगा, फिर भी अगर किसी दिन इत्तिफाक से बेदार होने में ताखीर हो जाए तो जिस वक़्त भी आंख खुले सबसे पहले नमाज़ अदा करलें। इंशा अल्लाह ताखीर का कोई गुनाह नहीं होगा।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)