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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

नमाज़े वित्र, अहमियत, तादादे रिकात और पढ़ने के तरीका

वित्र के मानी ताक़ के है, अहादीस की रौशनी में उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ है कि हमें नमाज़े वित्र की खास पाबन्दी करनी चाहिए क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफर व हज़र हमेशा नमाज़े वित्र का एहतेमाम करते थे। नीज़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़े वित्र पढ़ने की बहुत ज़्यादा ताकीद फरमाई है यहां तक कि फरमाया कि अगर कोई शख्स वक़्त पर वित्र न पढ़ सके तो वह बाद में उसकी क़ज़ा करे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उम्मते मुस्लिमा को वित्र की अदाएगी का हुकुम बहुत बार दिया है, अरबी ज़बान में अमर का सेगा वुजूब के लिए आता है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से नमाज़े वित्र का ज़िन्दगी में एक मरतबा भी छोड़ना यहां तक कि हज के मौक़े पर मुज़दलफा में भी साबित नहीं है जैसा कि सउदी अरब के साबिक़ मुफती आम शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ ने एक सवाल के जवाब में फरमाया।

वित्र को वाजिब या सुन्नते मुअक्कदा अशद्दुत ताकीद के साथ बयान है। ज़माना कदीम में फुक़हा व उलमा के दरमियान इख्तिलाफ चला आ रहा है। फुक़हा व उलमा की एक जमाअत ने सुन्नते मुअक्कदा अशद्दुत ताकीद कहा है जबकि फुक़हा व उलमा की दूसरी जमाअत मसलन शैख नोमान बिन साबित यानी इमाम अबू हनीफा ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल की रौशनी में वाजिब क़रार दिया है। जिसका दरजा फ़र्ज़ से यक़ीनन कम है। जैसे कि बाज़ उलमा ने तहैय्यतुल मस्जिद की दो रिकात को वाजिब क़रार दिया है जिसका दरजा फ़र्ज़ से यक़ीनन कम है। अगरचे उलमा व फुक़हा के इत्तिफाक़ के साथ तहैय्यतुल मस्जिद की कोई क़ज़ा नही है। जिन फुक़हा व उलमा ने सुन्नते मुअक्कदा अशद्दुत ताकीद कहा है उन्होंने भी अहादीस शरीफ की रौशनी में यही फरमाया है कि नमाज़े वित्र का हमेशा एहतेमाम करना चाहिए और वक़्त पर अदा न करने पर उसकी क़ज़ा करनी चाहिए। शैख इमाम अहमद बिन हमबल ने तो यहां तक फरमाया है कि जिसने जानबूझ कर नमाज़े वित्र को छोड़ा वह बुरा शख्स है और उसकी शहादत क़बूल नहीं करनी चाहिए। (फतावा अल्लामा इब्ने तैमिया 23/127, 253) अल्लामा इब्ने तैमिया ने भी नमाज़े वित्र छोड़ने वाले की शहादत क़बूल न करने का फैसला किया है। गरज़ ये कि अमली एतबार से उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ हैं कि नमाज़े वित्र की हमेशा पाबन्दी करनी चाहिए और वक़्त पर अदा न करने पर उसकी क़ज़ा भी करनी चाहिए चाहे उसको जो भी टाइटल दिया जाए।

नमाज़े वित्र की अहमियत व ताकीद नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात की रौशनी में
हज़रत अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया सुबह होने से पहले नमाज़े वित्र पढ़ो। (मुस्लिम, तिर्मीज़ी)

हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ऐ मुसलमानो! वित्र पढ़ो, इसलिए कि अल्लाह तआला भी वित्र है और वित्र को पसन्द करता है। (अबू दाऊद, नसई, इब्ने माजा, तिर्मीज़ी)

हज़रत खारजा बिन हुज़ैफा (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे पास तशरीफ लाए और इरशाद फरमाया अल्लाह तआला ने तुम्हें एक नमाज़ अता फरमाई है वह तुम्हारे लिए सुर्ख ऊंटों से भी बेहतर है और वह वित्र की नमाज़ है। अल्लाह तआला ने यह नमाज़ तुम्हारे लिए नमाज़े इशा के बाद से सुबह होने तक मुक़र्रर की है। मुहद्दिसीन ने लिखा है कि सुर्ख़ ऊंटों से बेहतर होने का मतलब ये है कि नमाज़े वित्र दुनिया और जो कुछ उसमें है उससे बेहतर है क्योंकि उस ज़माना में सुर्ख़ ऊंट सबसे ज़्यादा क़ीमती चीज़ थी। (तिर्मीज़ी)

हज़रत अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स वित्र से सोता रह जाए या भूल जाए तो जब याद आए (या जागे) तो उसी वक़्त पढ़ले। (अबू दाऊद, तिर्मीज़ी, इब्ने माजा)

हज़रत बुरैदा असलमी (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इरशाद फरमाते हुए सुना, आपने फरमाया नमाज़े वित्र हक है, जो वित्र अदा नह करे वह हम में से नहीं। नमाज़े वित्र अदा नह करे वह हम में से नहीं। नमाज़े वित्र हक़ है जो वित्र अदा न करे वह हम में से नही। बाज़ रिवायत में यह हदीस अलवित्र वाजिब के लफ्ज़ से मरवी है। (अबू दाऊद)

जिन हज़रात ने वित्र को वाजिब क़रार नहीं दिया है हसबे मामूल उन्होंने इस हदीस को ज़ईफ क़रार देने की कोशिश की है इसमें कोई शक नहीं कि बाज़ मुहद्दिसीन ने इस हदीस की सनद में आए एक रावी (अबू मुनीब अब्दुल्लाह बिन अब्दुल्लाह अलअतकी) को ज़ईफ क़रार दिया है जबकि मुहद्दिसीन की दूसरी जमाअत मसलन इमाम यहया बिन मईन इन्हें सिक़ह कहते हैं, इमाम हाकिम ने इस हदीस को सही अला शर्तिशशैखैन क़रार दिया है। इमाम दाऊद ने इस हदीस को नक़ल करने के बाद इस पर खामोशी इख्तियार की है जो उनके नज़दीक हदीस के सही या कम से कम हसन होने की दलील होती है। (दरसे तिर्मीज़ी, शैख मोहम्मद तक़ी उसमानी)

नमाज़े वित्र का वक़्त
नमाज़े वित्र का वक़्त इशा की नमाज़ के बाद से सुबह होने तक रहता है जैसा कि हदीस 1 और 3 में लिखा है। बाज़ उलमा ने नमाज़े फज़्र की अदाएगी तक नमाज़े वित्र का वक़्त लिखा है मगर जमहूर उलमा के नज़दीक सुबह होने के बाद वित्र अदा न की जाए बल्कि आफताब निकलने के बाद वित्र की क़ज़ा की जाए, क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल से मालूम होता है कि सुबह होने के बाद से आफताब के निकलने के वक़्त तक सिर्फ दो रिकात सुन्नते मुअक्कदा और दो रिकात फ़र्ज़ है जैसा कि जलीलुल क़दर ताबई शैख सईद बिन अलमुसैयिब का फतवा है जो इमाम बैहक़ी ने अपनी किताब ‘‘सुनन अलबैहक़ी” में सही सनद के साथ नक़ल किया है कि शैख सईद बिन अलमुसैयिब ने एक आदमी को देखा कि वह सुबह होने के बाद दो रिकात से ज़्यादा नमाज़ पढ़ता है और इस नमाज़ में खूब रुकू व सजदे करता है तो शैख सईद बिन अलमुसैयिब ने उसे इस काम से मना किया। उस शख्स ने कहा कि क्या अल्लाह मुझे नमाज़ पर अज़ाब देगा? तो शैख ने जवाब दिया नहीं लेकिन तुम्हें सुन्नत की ख़िलाफ वरज़ी पर अज़ाब देगा।

शैख अब्दुल अज़ीज़ का फतवा भी यही है कि जो शख्स सुबह होने तक वित्र न पढ़ सके तो वह सूरज निकलने के बाद पढ़े। (मजमूआ फतावा इब्ने बाज़ 11/300)

नमाज़े वित्र के लिए अफ़ज़ल वक़्त
रात के आखिर हिस्सा में नमाज़े तहज्जुद पढ़ कर नमाज़े वित्र की अदाएगी अफ़ज़ल है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मुस्तक़िल मामूल भी यही था। अलबत्ता वह हज़रात जो रात के आखिरी हिस्सा में नमाज़े तहज्जुद और नमाज़े वित्र का एहतेमाम नहीं कर सकते हैं तो वह सोने से पहले ही वित्र अदा कर लें।

हज़रत जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसको खौफ है कि वह आखिरी रात में उठ कर नमाज़ नहीं पढ़ सकता है तो वह रात के शुरू हिस्सा में ही वित्र अदा करले। अलबत्ता जिसको रगबत है कि वह रात के आखिरी हिस्सा में नमाज़े वित्र अदा करे तो उसे ऐसा ही करना चाहिए क्योंकि रात के आखिरी हिस्सा में अदा की गई नमाज़ के वक़्त फरिशते हाज़िर रहते है और यही अफ़ज़ल है। (बुखारी व मुस्लिम)
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मेरे खलील रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे तीन बातों की वसीयत की है जिनमें एक सोने से पहले वित्र की अदाएगी है। मैं इन्हें मरते दम तक नहीं छोडूंगा। (बुखारी व मुस्लिम,तिर्मीज़ी व नसई, अबू दाऊद व मुसनद अहमद)

वित्र छूट जाए तो क़ज़ा पढ़ें
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल की रौशनी में तमाम फुक़हा फुक़हा व उलमा नमाज़े वित्र की क़ज़ा की मशरूइयत पर तो मुत्तफिक़ हैं (जैसा कि सउदी अरब के बड़े उलमा की कौनसल ने फतवा नं॰ 11271 में लिखा है) लेकिन क़ज़ा के वक़्त में उनकी रायें मुख्तलिफ हैं अगरचे तक़रीबन तमाम ही फुक़हा व उलमा आफताब के निकलने के बाद से लेकर ज़ावाल तक के वक़्त को वित्र की नमाज़ का बेहतरीन वक़्त क़रार देते हैं ।

हज़रत अबू सईद खुदरी की हदीस (4) गुजर चुकी है। सुनन बैहक़ी में यह हदीस थोड़ी वज़ाहत के साथ आई है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स वित्र पढ़े बेगैर सो गया वह सुबह को पढ़े और जो भूल गया वह याद आने पर पढ़े। (बैहक़ी)

इमाम मालिक फरमाते हैं कि उन्हें यह बात पहुंची कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास, हज़रत उबादा बिन सामित वगैरह (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने फज़्र के बाद वित्र पढ़े (यानी वक़्त पर वित्र की नमाज़ अदा न कर सके तो बाद में क़ज़ा की) (मुअत्ता मालिक)

हज़रत उमर फारूक (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स का रात का कोई मामूल सोने की वजह से रह जाए और वह फज़्र के बाद ज़ुहर से पहले अदा कर ले तो उसके लिए ऐसा ही है जैसा कि उसने उसको मामूल के मुताबिक़ अदा किया। (बुखारी, मुस्लिम, तिर्मीज़ी, नसई, इब्ने माजा)

वित्र की तादादे रिकात
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बहुत तरीक़ों से वित्र अदा किए हैं। अल्लाह तआला ने यह तरीक़े आज तक उम्मते मुस्लिमा में जिन्दा रखे हैं। नीचे दिए गये दो तरीक़े उ म्मते मुस्लिमा में ज़्यादा राएज है।
1) वित्र की 3 रिकात इस तरह अदा की जाएं कि 2 रिकात पर सलाम फेर दिया जाए और फिर एक रिकात अदा की जाए यानी 3 रिकात दो तशहहुद और 2 सलाम के साथ।
(नोट) कुछ हज़रात ने सहूलत पर अमल करने का कुछ ज़्यादा ही मिज़ाज बना लिया है चुनांचे वह सिर्फ एक ही रिकात वित्र अदा कर लेते हैं सिर्फ एक रिकात वित्र अदा करने से बचना चाहिए क्योंकि उलमा व फुक़हा की एक जमाअत की राय में ऐसा करना सही नहीं है।
2) एक सलाम और दो कादों के साथ नमाज़े मग़रिब की तरह वित्र की तीन रिकात अदा की जाएं।
इन मज़कूरा दोनों शकलों में वित्र की अदाएगी सही है अलबत्ता फुक़हा व उलमा ने अपने अपने नुक़्तए नज़र से वित्र की किसी एक शकल को राजेह क़रार दिया है मसलन सउदी अरब के उलमा ने पहली सूरत को राजेह कहा है जबकि दूसरे फुक़हा व उलमा मसलन शैख नोमान बिन साबित यानी इमाम अबू हनीफा ने दूसरी शकल को नीचे की अहादीस की रौशनी में राजेह कहा है।

वित्र की तीन रिकात
हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ान और गैरे रमज़ान में 11 रिकात से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पहले चार रिकात पढते थे, उनके हुस्‍न और लम्बाई के बारे में कुछ न पूछो। फिर आप चार रिकात पढ़ते थे उनके हुस्‍न और लम्बाई के बारे न पूछो फिर आप तीन रिकात वित्र पढ़ते थे। (बुखारी व मुस्लिम तिर्मीज़ी, व इब्ने माजा व नसई) यह हदीस, हदीस की हर मशहूर किताब में मौजूद है, इस हदीस में तीन रिकात वित्र का ज़िक्र है।

हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वित्र की पहली रिकात में सूरह फातिहा और सब्बेह इसमा दूसरी रिकात में क़ुल या अय्युहल काफिरून और तीसरी रिकात में क़ुल हु अल्लाहु अहद पढ़ते थे। (तिर्मीज़ी)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आदते मुबारका यह थी कि वह रात में तहज्जुद की 8 रिाकत पढ़ते थे फिर तीन वित्र पढ़ते और फज़्र की नमाज़ से पहले दो रिकात पढ़ें थें। (नसई)
इन अहादीस से मालूम हुआ कि नमाज़े वित्र में तीन रिकात हैं, नीज़ तीन रिकात वित्र के जवाज़ पर तमाम उलमाए उम्मत का इजमा है, इमाम तिर्मीज़ी फरमाते हैं कि जमहूर सहाबा को भी तीन रिकात वित्र पसंद थे। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक्सर सहाबा किराम और बाद में आने वाले जमहूर अहले इल्म का पसंदीदा अमल भी यही है कि वित्र की पहली रिकात में सब्बेह इसमा दूसरी रिकात में सूरह काफिरून और तीसरी रिकात में सूरह इखलास पढ़ी जाए। (तिर्मीज़ी) एक रिकात वित्र पढ़ने में उलमाए उम्मत का इख्तिलाफ है बाज़ के नज़दीक यह सही नहीं है लिहाज़ा मज़बूत दलील के साथ इहतियात का तक़ाज़ा भी यही है कि वित्र में तीन रिकात ही पढ़ी जाए।

एक सलाम दो तशहहुद के साथ तीन रिकात वित्र
हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वित्र की दो रिकात पर सलाम नहीं फेरते थे। (नसई)

हज़रत काब (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वित्र की पहली रिकात में सूरह आला दूसरी रिकात में काफिरून और तीसरी रिकात में सूरह अहद पढ़ते थे और तीसरी रिकात के आखिर में सलाम फेरते थे। (नसई)

हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इशा की नमाज़ के बाद घर में तशरीफ लाते थे फिर दो रिकात पढ़ते थे फिर मज़ीद दो रिकात पहली दोनों रिकात से लम्बी पढ़ते थे फिर तीन रिकात वित्र पढ़ते थे और (सलाम के ज़रिया) जुदा नहीं करते थे। (मतलब ये कि यह तीनों रिकात एक ही सलाम से पढ़ते थे) (मुसनद अहमद)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मग़रिब की नमाज़ दिन की वित्र है, सो जो रात में भी वित्र पढ़ो। (मुसनद अहमद, मुअत्ता मालिक)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद फरमाते हें कि रात के वित्र में दिन के वित्र यानी नमाज़े मग़रिब की तरह तीन रिकात हैं। (अजमोजमुल कबीर)

हज़रत हसन बसरी फरमाते हैं कि सहाबी रसूल हज़रत ओबय बिन काब तीन रिकात वित्र पढ़ते थे और मग़रिब की नमाज़ की तरह तीसरी रिकात में सलाम फेरते थे। (मुसन्नफ अब्दुर रज़्ज़ाक़)

हज़रत हसन बसरी फरमाते हैं कि मुसलमानों का इजमा है कि वित्र की तीन रिकात हैं और आखिर में ही सलाम फेरा जाए। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)

सहाबी रसूल हज़रत अनस ने तीन रिकात वित्र की नमाज़ पढ़ी और सिर्फ आखिरी रिकात में सलाम फेरा। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)

(वज़ाहत) इन तमाम अहादीस से मालूम हुआ कि वित्र की तीन रिकात एक सलाम से हैं, रहा दूसरी रिकात के बाद क़ादा करने का सबूत तो सही हदीस भी ऐसी नही मिलती जिसमे ये ज़िक्र हो कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तीन रिकात वित्र एक सलाम से पढ़ते थे और दूसरी रिकात के बाद बैठने से मना करते थे। इसके बरअक्स बहुत सी एसी अहादीस मिलती है जिन में आप सल्लल्लाहु अलेहि वसल्लम ने दिन रात की हर नमाज़ में हर दूसरी रिकात पर कादा करने का हुकुम दिया है। वित्र का इस उमूम से मुस्तसना होना किसी एक हदीस में नहीं मिलता अगर ऐसा होता तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़रूर बयान फरमाते और सहाबा एहतेमाम से उम्मत तक पहुंचाते।
बाज़ हज़रात ने दारे क़ुतनी और बैहक़ी में वारिद हज़रत अबू हुरैरा की हदीस के सिर्फ एक हिस्सा को ज़िक्र करके लिखा है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक सलाम और दो तशहहुद के ज़रिया नमाज़े वित्र पढ़ने से मना किया है।
हदीस के सिर्फ एक हिस्सा को ज़िक्र करके कोई फैसला करना ऐसा ही होगा जैसे कि कोई कहे क़ुरान में अल्लाह तआला ने नमाज़ पढ़ने से मना फरमाया हे और दलील के तौर पर पेश करे ‘‘नमाज़ के करीब भी मत जाओ”।
दारे क़ुतनी और बैहक़ी में वारिद इस हदीस का तअल्लुक अगर सिर्फ वित्र से है तो इसका मतलब ये होगा कि मग़रिब की तरह तीन वित्र न पढ़ो बल्कि पांच या सात पढ़ो जिसका कोई भी क़ायल नहीं है। यक़ीनन इसका दूसरा मफहूम है। मुमकिन है कि इस हदीस का तअल्लुक तहज्जुद की नमाज़ से हो यानी जब तुम नमाज़े तहज्जुद और उसके बाद वित्र पढ़ना चाहो तो कम से कम 8 या 7 रिकात पढ़ो। और अगर यह तसलीम कर भी लिया जाए कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़े वित्र में मग़रिब से मुशाबहत से मना फरमाया है तो किस बुनियाद पर हम यह कहेंगे कि इससे मुराद यह है कि दूसरी रिाकत में कादा न किया जाए। कल क़यामत तक भी कोई शख्स नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात से दारे क़ुतनी और बैहक़ी में वारिद इस हदीस का यह मफहूम साबित नहीं कर सकता है। इसके यह मतलब भी तो हो सकते हैं।

1) नमाज़े वित्र को मग़रिब की तरह न पढ़ो यानी वित्र की तीसरी रिकात में भी सूरह फातिहा के बाद कोई सूरत मिलाओ ताकि मग़रिब और वित्र में फ़र्क़ हो जाए।
2) नमाज़े वित्र को मग़रिब की तरह न पढ़ो यानी वित्र में दुआए क़ुनूत भी पढ़ो ताकि मग़रिब और वित्र में फ़र्क़ हो जाए।
गरज़ ये कि इस हदीस की बुनियाद पर यह कहना कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वित्र की तीन रिकात एक सलाम से पढ़ने पर वित्र की दूसरी रिकात में कादा करने से मना फरमाया है सही नहीं है क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तलीमात में हदीस का यह मफहूम ज़िक्र नहीं है। हां किसी आलिम या फक़ीह की अपनी राय हो सकती है जो गलती का इहतिमाल रखती है, जिसपर अमल करना हमारे लिए ज़रूरी नहीं है, फुक़हा व उलमा की दूसरी जमाअत मसलन इमाम अबू हनीफा की राय यह है कि इस हदीस से यह मफहूम लेना सही नहीं है। लिहाज़ा ऐसे मुख्तलफ फी मसाइल में वुसअत से काम लेना चाहिए, न कि इमाम अबू हनीफा की राय को क़ुरान व सुन्नत के खिलाफ क़रार दी जाए। इस मौका को गनीमत समझ कर यह बात वाज़ेह करना अपनी ज़िम्मेदारी समझता हूं कि इन दिनों बाज़ हज़रात इमाम अबू हनीफा (जिन्हें तक़रीबन सात सहाबा के दीदार का शर्फ हासिल है) की क़ुरान व सुन्नत की रौशनी में बाज़ रायें (अगर वह उन उलमा के राय से मुख्तलिफ होती है) को क़ुरान व सुन्नत के खिलाफ बताते हैं और और ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि जो उन्होंने 1400 साल के बाद क़ुरान व सुन्नत को समझा है वही सही है, सहाबा और बड़े बड़े ताबेईन की सुहबत से फायदा उठाने वाले हज़रत इमाम अबू हनीफा ने क़ुरान व सुन्नत के खिलाफ फरमाया है और उनकी राय पर इस तरह लानात व मलामत शुरू कर देते हैं कि मालूम होता है कि इमाम अबू हनीफा ने यह राय गीता, रामाएण और बाइबल से लिया है। (अल्लाह की पनाह) अगर किसी मसअला में इमाम अबू हनीफा की राय की दलील तिर्मीज़ी जैसी मुस्तनद किताब में वारिद नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ौल या अमल पर मुशतमिल होती है तो बुखारी व मुस्लिम की हदीस का मुतालबा किया जाता है। एक सलाम और दो तशहहुद से वित्र की तीन रिकात को गलत क़रार देने के लिए सहीहैन ही नहीं बल्कि सिहाये सित्ता से भी बाहर निकल कर दारे क़ुतनी और बैहक़ी की उस रिवायत को बुनियाद बनाया जा रहा है जिसके बहुत से मफहूम हो सकते हैं।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

दुआए क़ुनूत का वक़्त
दुआए क़ुनूत चाहे रुकू से पहले या रुकू के बाद पढ़ी जाए, दोनों शकलों में नमाज़ अदा हो जाएगी, अलबत्ता अफ़ज़ल वक़्त के मुतअल्लिक़ फुक़हा व उलमा के दरमियान इख्तिलाफ है। सहाबी रसूल हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद की राय कि दुआए क़ुनूत को रुकू से पहले पढ़ी जाए (तिर्मीज़ी) शैख इमाम अबू हनीफा, शैख इमाम सुफियान सौरी, शैख इमाम इसहाक और शैख इमाम इब्ने मुबारक जैसे जलीलुल क़दर फुक़हा ने बहुत सी अहादीस की बिना पर इसी क़ौल को इख्तियार किया हे। इसकी दलील में इख्तिसार की वजह से सिर्फ दो हदीसें पेश कर रहा हूं।

हज़रत आसिम (रहमतुल्लाह अलैह) कहते हैं मैंने हज़रत अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से क़ुनूत के मुतअल्लिक़ सवाल किया? हज़रत अनस ने फरमाया क़ुनूत साबित है। मैंने अर्ज़ किया रुकू से पहले या बाद में? हज़रत अनस ने फरमाया रुकू से पहले। मैंने कहा कि फलां ने मुझे आपके बारे में बताया है कि आपने रुकू के बाद पढ़ी है? हज़रत अनस ने फरमाया उसने झूट कहा है। रुकू के बाद तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ एक माह दुआए क़ुनूत पढ़ी है। (बुखारी)

बुखारी शरीफ की सबसे ज़्यादा मशहूर शरह लिखने वाले अल्लामा इब्ने हजर फरमाते हैं कि हज़रत अनस की तमाम रिवायात को पेशे नज़र रखने से मालूम होता है कि जब दुआए क़ुनूत किसी खास वजह से (दुआ वगैरह के लिए) पढ़ी जाए तो बिलइत्तिफाक़ वह रुकू के बाद है और जो क़ुनूत आम हालात में पढ़ी जाए तो हज़रत अनस से सही तौर पर यही साबित है कि वह रुकू से पहले है। (फतहुल बारी पेज 491)


हज़रत ओबय बिन काब (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वित्र में रुकू से पहले क़ुनूत पढ़ते थे। (इब्ने माजा)

दुआए क़ुनूत से पहले हाथों का उठाना

हज़रत असवद हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) रिवायत करते हैं कि वह वित्र की आखिरी रिकात में सूरह अहद पढ़ते थे, फिर दोनों हाथों को उठाते और उसके बाद रुकू से पहले दुआए क़ुनूत पढ़ते थे। (बुखारी 28)

दुआए क़ुनूत
जो दुआए क़ुनूत अमूमन हम पढ़ते हैं (अल्लाहुम्मा इन्ना आखिर तक) वह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है, तफसीलात के लिए देखें मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा जिल्द 2 पेज 95)

खुलासा कलाम
फ़र्ज़ नमाज़ों के साथ हमें नमाज़े वित्र का खास एहतेमाम करना चाहिए जैसा कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल की रौशनी में ज़िक्र किया गया है। नीज़ सुन्नत और नफल का भी एहतेमाम करना चाहिए ताकि अल्लाह तआला का क़ुर्ब भी हासिल हो जाए जैसा कि सही बुखारी की हदीस में है कि बन्दा नवाफिल के ज़रिये अल्लाह तआला से करीब होता जाता है। नीज़ अगर खुदा नखास्ता क़यामत के दिन फ़र्ज़ नमाज़ों में कुछ कमी निकले तो सुन्नत और नफल से उसकी पूरी कर दी जाएगी जैसा कि अहादीस में ज़िक्र आता है।

अल्लाह तआला हम सबको नमाज़ों का एहतेमाम करने वाला बनाए और हमारी नमाज़ों में ख़ुशू व ख़ुज़ू पैदा फरमाए ताकि हमारी नमाजें दुनिया में हमें बुराईयों से रोकने का ज़रिया बनें और क़यामत के दिन जहन्नम की आग से बचाने का ज़रिया बनें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)