بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

जुमा के फ़ज़ाइल, अहमियत, मसाइल और अहकामात

अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत से सारी कायनात पैदा फरमाई और इनमें से बाज़ को बाज़ पर फौकियत दी। सात दिन बनाए और जुमा के दिन को दूसरे दिनों पर फौक़ियत दी। जुमा के फ़ज़ाइल व अहमियत में यह बात खास तौर पर काबिले ज़िक्र है कि हफ्ता के तमाम दिनों में सिर्फ जुमा के नाम से ही क़ुरान करीम में सूरह नाज़िल हुई जिसकी रहती दुनिया तक तिलावत होती रहेगी इंशाअल्लाह।

सूरह जुमा का मुख्तसर बयान
सूरह जुमा मदनी है। इस सूरह में 11 आयात और दो रुकू हैं। इस सूरह की इब्तिदा अल्लाह तआला की तसबीह और तारीफ से की गई है, जिसमें अल्लाह तआला की चार सिाफात बयान की गई हैं।
1) अलमलिक (बादशाह) हक़ीक़ी व दायमी बादशाह, जिसकी बादशाहत पर कभी ज़वाल नहीं है।
2) अलक़ुद्दूस (पाक ज़ात) जो हर एैब से पाक व साफ है।
3) अलअज़ीज़ (ज़बरदस्त) जो चाहता है करता है, वह किसी का मुहताज नहीं है, सारी कायनात के बेगैर सब कुछ करने वाला है।
4) अलहकीम (हिकमत वाला) उसका हर फैसला हिकमत पर मबनी होता है।
इससके बाद नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रिसालत व नुबूव्वत का ज़िक्र किया गया कि हमने ना जानने वालों लोगों में उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उन्हें हमारी आयतें पढ़ कर सुनाता है, उनको पाक करता है और उन्हें किताब व हिकमत सिखाता है फिर यहूद व नसारा का तज़किरा किया गया है। इस सूरह की आखिरी 3 आयात में नमाज़े जुमा का ज़िक्र है जिनका तरजुमा यह है।
“ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन के लिए पुकारा जाए, यानी नमाज़ की अज़ान हो जाए तो अल्लाह की याद के लिए जल्दी करो, और खरीद व फरोख्त छोड़ दो। यह तुम्हारे हक में बहुत ही बेहतर है अगर तुम जानते हो” (आयत 9)
“और जब नमाज़ हो जाए तो ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह का फज़ल तलाश करो यानी रिज़्क़ हलाल तलाश करो और अल्लाह को बहुत याद करो ताकि तुम कामयाब हो जाओ। यानी नमाज़ तो सिर्फ इसी जगह अदा कर सकते हो लेकिन ज़िक्र हर जगह कर सकते हो। देखो मुझे भूल न जाना, काम करते हुए, मेहनत मजदूरी और मुलाज़मत करते हुए हर जगह मझे याद रखना” (आयत 10)
“जब लोग सौदा बिकता देखते हैं या तमाशा होता देखते हैं तो उधर भाग जाते हैं और तुझे खड़ा छोड़ देते हैं तो फरमा दीजिए जो अल्लाह के पास है वह बेहतर है तमाशे से और सौदे से, और अल्लाह सबसे बेहतर रिज़्क़ देने वाले हैं” (आयत 11)

आखिरी आयत (आयत 11) का शाने नुज़ूल
इब्तिदाए इस्लाम में जुमा की नमाज़ पहले और खुतबा बाद में होता था। चुनांचे एक मरतबा नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जुमा की नमाज़ के बाद खुतबा दे रहे थे कि अचानक दहया बिन खलीफा क़ाफ़िला मुल्के शाम से गल्ला लेकर मदीना पहुंचा। उस ज़माने में गल्ले की इंतिहाई कमी थी। सहाबा-ए-किराम ने समझा कि नमाज़े जुमा से फरागत हो गई है और घरों में गल्ला नहीं है, कहीं सामान खत्म न हो जाए चुनांचे खुतबा जुमा छोड़ कर बाहर खरीद व फरोख्त के लिए चले गए। सिर्फ 12 सहाबा मस्जिद में रह गए। इस मौक़ा पर यह आयत नाज़िल हुई। हज़रत इराक बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) जुमा की नमाज़ से फारिग हो कर मस्जिद के दरवाज़ा पर खड़े हो जाते और यह दुआ पढ़ते।
“ऐ अल्लाह! मैंने तेरी आवाज़ पर हाज़िरी दी, और तेरी फ़र्ज़ नमाज़ अदा की, फिर तेरे हुकुम के मुताबिक इस मजमा से उठ आया, अब तू मुझे अपना फ़ज़ल नसीब फरमा, तू सबसे बेहतर रोज़ी देने वाला है।“ (इब्ने अबी हातिम, तफसीर इब्ने कसीर)
इस आयत के पेशे नज़र बाज़ सलफे सालेहीन ने फरमाया है कि जो शख्स जुमा के दिन नमाज़े जुमा के बाद खरीद व फरोख्त करे उसे अल्लाह तआला सत्तर हिस्से ज़्यादा बरकत देगा। (तफसीर इब्ने कसीर)

अज़ाने जुमा
जिस अज़ान का इस आयत में ज़िक्र है उससे मुराद वह अज़ान है जो इमाम के मिम्बर पर बैठ जाने के बाद होती है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में यही एक अज़ान थी। जब आप हुजरा से तशरीफ लाते, मिम्बर पर जाते तो आप के मिम्बर पर बैठने के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने यह अज़ान होती थी। इससे पहले की अज़ान हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर फारूक (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के ज़माने में नहीं थी। हज़रत उसमान बिन अफ्फान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने में जब लोग बहुत ज़्यादा हो गए तो आपने दूसरी अज़ान एक अलग मकान (ज़ुरा) पर कहलवाई ताकि लोग नमाज़ की तैयारी में मशगूल हो जाऐं, ज़ुरा मस्जिद के करीब सबसे बुलंद मकान था।

एक अहम नुकता
अल्लाह तआला ने इन आयात में इरशाद फरमाया जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, जब नमाज़ से फारिग हो जाऐं यह अज़ान किस तरह दी जाए? उसके अल्फाज़ क्या हों? नमाज़ किस तरह अदा करें? यह क़ुरान करीम में कहीं नहीं है, अलबत्ता हदीस में है। मालूम हुआ कि हदीस के बेगैर क़ुरान करीम समझना मुमकिन नहीं है।

जुमा का नाम जुमा क्यों रखा गया
इसके मुखतलिफ असबाब बयान किए जाते हैं।
1) जुमा जमा से निकला है जिसके माना हैं जमा होना। क्योंकि मुसलमान इस दिन बड़ी तादाद में मसाजिद में जमा होते हैं और उम्मते मुस्लिमा के इजतिमाआत होते हैं, इसलिए इस दिन को जुमा कहा जाता है।
2) छः दिन में अल्लाह तआला ने ज़मीन व आसमान और तमाम मखलूक़ को पैदा फरमाया। जुमा के दिन मखलूक़ात की तखलीक पूरी हुई यानी सारी मखलूक़ इस दिन जमा हो गई इस लिए इस दिन को जुमा कहा जाता है।
3) इस दिन यानी जुमा के दिन हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पैदा किए गए यानी उनको इस दिन जमा किया गया।

इस्लाम का पहला जुमा
यौमूल जुमा को पहले यौमूल अरूबा कहा जाता था। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मदीना हिजरत करने और सूरह जुमा के नुज़ूल से पहले अंसार सहाबा ने मदीना में देखा कि यहूदी हफ्ता के दिन और नसारा इतवार के दिन जमा हो कर इबादत करते हैं। लिहाज़ा सबने तैय किया कि हम भी एक दिन अल्लाह तआला का ज़िक्र करने के लिए जमा हों। चुनांचे हज़रत अबू ओमामा (रज़ियल्लाहु अन्हु) के पास जुमा के दिन लोग जमा हुए, हज़रत असद बिन ज़ुरारह ने दो रिकात नमाज़ पढ़ाई। लोगों ने अपने इस इजतिमा की बुनियाद पर इस दिन का नाम यौमूल जुमा रखा। इस तरह यह इस्लाम का पहला जुमा है। (तफसीर क़ुर्तुबी)

नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पहला जुमा
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का से मदीना हिजरत के वक़्त मदीना के करीब बनु उमर बिन औफ के बस्ती क़ुबा में चंद रोज़ के लिए क़याम फरमाया। क़ुबा से रवाना होने से एक रोज़ पहले जुमेरात के दिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मस्जिदे क़ुबा की बुनियाद रखी। यह इस्लाम की पहली मस्जिद है जिस की बुनियाद तक़वा पर रखी गई। जुमा के दिन सुबह को नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़ुबा से मदीना के लिए रवाना हुए जब बनु सालिम बिन औफ की आबादी में पहुंचे तो जुमा का वक़्त हो गया, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बतने वादी में उस मक़ाम पर जुमा पढ़ाया जहां अब मस्जिद (मस्जिदे जुमा) बनी हुई है। यह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पहला जुमा है। (तफसीर क़ुर्तुबी)

जुमा के दिन की अहमियत
यहूदियों ने हफ्ता का दिन पसन्द किया जिस में मखलूक़ की पैदाइश शुरू भी नहीं हुई थी, नसारा ने इतवार को इखतियार किया जिसमें मखलूक़ की पैदाइश की इब्तिदा हुई थी। और इस उम्मत के लिए अल्लाह तआला ने जुमा को पसन्द फरमाया जिस दिन अल्लाह तआला ने मखलूक़ को पूरा किया था। सही बुखारी की हदीस में है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म ने इरशाद फरमाया हम दुनिया में आने के एतेबार से तो सबसे पीछे हैं लेकिन क़यामत के दिन सबसे पहले होंगे। मुस्लिम की रिवायत में इतना और भी है कि क़यामत के दिन तमाम मखलूक़ में सबसे पहले फैसला हमारे बारे में होगा। (इब्ने कसीर)

जुमा के दिन की अहमियत के मुतअल्लिक चंद अहादीस
रसूलुल्लह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जुमा का दिन सारे दिनों का सरदार है। अल्लाह तआला के यहां सारे दिनों में सबसे ज़्यादा अज़मत वाला है। यह दिन अल्लाह तआला के नज़दीक ईदुल अज़हा और ईदुल फितर के दिन से भी ज़्यादा मरतबा वाला है। इस दिन की पांच बातें खास हैं।
1) इस दिन अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पैदा फरमाया
2) इसी दिन उनको ज़मीन पर उतारा
3) इसी दिन उनको मौत दी
4) इस दिन में एक घड़ी ऐसी है कि बन्दा इसमें जो चीज़ मांगता है अल्लाह तआला उसको ज़रूर पूरा फरमाते हैं बशर्तें कि किसी हराम चीज़ का सवाल न करे
5) और इसी दिन क़यामत क़ायम होगी। तमाम मुक़र्रब फरिशते, आसमान, ज़मीन, हवाएं, पहाड़, समुन्दर सब जुमा के दिन से घबराते हैं कि कहीं क़यामत क़ायम न हो जाए इस लिए कि क़यामत जुमा के दिन ही आएगी (इब्ने माजा)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया सूरज निकलने और डूबने वाले दिनों में कोई भी दिन जुमा के दिन से अफ़ज़ल नहीं यानी जुमा का दिन तमाम दिनों से अफ़ज़ल है। (सही इब्ने हिब्बान)
मुस्लमानो! अल्लाह तआला ने इस दिन को तुम्हारे लिए ईद का दिन बनाया है लिहाज़ा इस दिन ग़ुस्ल किया करो और मिसवाक किया करो। (तबरानी, मजमउज़्ज़वाएद) इस हदीस से मालूम हुआ कि जुमा का दिन हफ्ता की ईद है।
अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम की सूरह बुरूज में (वशाहिद व मशहुद) के ज़रिया क़सम खाई है। शाहिद से मुराद जुमा का दिन है यानी इस दिन जिसने जो भी अमल किया होगा यह जुमा का दिन क़यामत के दिन उसकी गवाही देगा।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अल्लाह के नज़दीक सबसे अफ़ज़ल नमाज़ जुमा के दिन फज्र की नमाज़ जमाअत के साथ अदा करना है। (तबरानी, बज़्ज़ार)
जहन्नम की आग रोज़ाना दहकाई जाती है मगर जुमा के दिन उसकी अज़मत और खास अहमियत व फज़ीलत की वजह से जहन्नम की आग नहीं दहकाई जाती। (ज़ादुल मआद जिल्द 1 पेज 378)

जुमा के दिन क़बूलियत वाली घड़ी की ताईन
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जुमा के दिन का ज़िक्र किया और फरमाया इसमें एक घड़ी ऐसी है जिसमें कोई मुसलमान नमाज़ पढ़े और अल्लाह तआला से कुछ मांगे तो अल्लाह तआला उसको इनायत फरमा देता है और हाथ के इशारे से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वाज़ेह फरमाया कि वह घड़ी मुख्तसर सी है। (बुखारी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया वह घड़ी खुतबा शुरू होने से लेकर नमाज़ के खत्म होने तक का दरमियानी वक़्त है। (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जुमा के दिन एक ऐसी घड़ी होती है कि मुसलमान बन्दा जो मांगता है अल्लाह उसको ज़रूर देते हैं। और वह घड़ी असर के बाद होती है। (मुसनद अहमद)
मज़कूरा और दूसरी अहादीस की रोशनी में जुमा के दिन क़बूलियत वाली घड़ी के मुतअल्लिक उलमा ने दो वक़्तों की तज़किरा किया है।
1) दोनों खुतबों का दरमियानी वक़्त, जब इमाम मिम्बर पर कुछ लम्हात के लिए बैठता है।
2) आफताब डूबने से कुछ वक़्त पहले।

नमाज़े जुमा की फज़ीलत
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया पाच नमाज़ें, जुमा की नमाज़ पिछले जुमा तक और रमज़ान के रोज़े पिछले रमज़ान तक दरमियानी अवक़ात के गुनाहों के लिए कफ्फारा हैं जबकि इन आमाल को करने वाला बड़े गुनाहों से बचे (मुस्लिम) यानी छोटे गुनाहों की माफी हो जाती है।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स अच्छी तरह वज़ू करता है फिर जुमा के लिए आता है, खूब ध्यान से खुतबा सुनता है और खुतबा के दौरान खामोश रहता हैं तो इस जुमा से गुज़शता जुमा तक और मज़ीद तीन दिन के गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। (मुस्लिम)

जुमा के नमाज़ के लिए मस्जिद जल्दी पहुंचना
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स जुमा के दिन जनाबत के ग़ुस्ल की तरह ग़ुस्ल करता है यानी एहतेमाम के साथ फिर पहली फुर्सत में मस्जिद जाता है गोया कि उसने अल्लाह की खुशनूदी के लिए ऊँटनी क़ुर्बान की। जो दूसरी फुर्सत में मस्जिद जाता है गोया उसने गाए क़ुर्बान की। जो तीसरी फुर्सत में मस्जिद जाता है गोया उनके मेंढा क़ुर्बान किया। जो चैथी फुर्सत में मस्जिद जाता गोया उसने मुर्गी क़ुर्बान की। जो पांचवीं फुर्सत में मस्जिद जाता है गोया उसने अंडे से अल्लाह तआला की खुशनूदी हासिल की। फिर जब इमाम खुतबा के लिए निकल आता है तो फरिशते खुतबे में शरीक हो कर खुतबा सुनने लगते हैं। (बुखारी व मुस्लिम)
यह फुर्सत की घड़ी किस वक़्त शुरू होती है, उलमा की मुख्तलिफ रायें हैं। मगर खुलासा कलाम यह है कि जितना जल्दी हो सके मस्जिद पहुंचे। अगर ज़्यादा जल्दी न जा सकें तो कम से कम खुतबा शुरू होने से कुछ पहले ज़रूर मस्जिद पहुंच जाएं।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब जुमा का दिन होता है तो फरिशते मस्जिद के हर दरवाजे पर खड़े हो जाते हैं। पहले आने वाले का नाम पहले उसके बाद आने वाले का नाम उसके बाद लिखते हैं (इसी तरह आने वालों के नाम उनके आने की तरतीब से लिखते रहते हैं) जब इमाम खुतबा देने के लिए आता है तो फरशिते अपने रजिस्टर (जिन में आने वालों के नाम लिखे गए हैं) बन्द कर देते हैं और खुतबा सुनने में मशगूल हो जाते हैं। (मुस्लिम)
खुतबा जुमा शुरू होने के बाद मस्जिद पहुंचने वाले हज़रात की नमाज़े जुमा तो अदा हो जाती है मगर नमाज़े जुमा की फज़ीलत उनको हासिल नहीं होती।

खुतबा जुमा
जुमा की नमाज़ के सही होने के लिए यह शर्त है कि नमाज़ से पहले दो खुतबे दिए जाएं। क्येंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमेशा जुमा के दिन दो खुतबे दिए। (मुस्लिम)
दोनों खुतबों के दरमियान खतीब का बैठना भी सुन्नत है (मुस्लिम) मिम्बर पर खड़े हो कर हाथ में लाठी लेकर खुतबा देना सुन्नत है।

दौराने खुतबा किसी तरह की बात करना यहां तक कि नसीहत करना भी मना है
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने जुमा के रोज़ दौराने खुतबा अपने साथी से कहा (खामोश रहो) उसने भी बेकार काम किया। (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स ने कंकड़ियों को हाथ लगाया यानी दौराने खुतबा उनसे खेलता रहा (या हाथ, चटाई, कपड़े वगैरह से खेलता रहा) तो उसने भी फज़ूल काम किया (और उसकी वजह से जुमा का खास सवाब बरबाद कर दिया)। (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुतबा के दौरान गूठ मार कर बैठने से मना फरमाया है। (तिर्मीज़ी)
(आदमी अपने घुटने खड़े करके रानों को पेट से लगा कर दोनों हाथों को बांध ले तो उसे गूठ मारना कहते हैं।)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन बुस्‍र (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मैं जुमा के दिन मिम्बर के करीब बैठा हुआ था एक शख्स लोगों की गर्दनों का फलांगता हुआ आया जबकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुतबा दे रहे थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया बैठ जा, तूने तकलीफ दी और ताखीर की। (सही इब्ने हिब्बान)
नोट- जब इमाम खुतबा दे रहा हो तो लोगों की गर्दनों को फलांग कर आगे जाने से मना किया गया है बल्कि जहां जगह मिले वहीं बैठ जाए।

जुमा की नमाज़ का हुकुम
जुमा की नमाज़ हर उस मुसलमान, सेहतमंद, बालिग मर्द के लिए ज़रूरी है जो किसी शहर या ऐसे इलाके में रहता हो जहां रोज़मर्रा की ज़रूरियात दस्तियाब हों। मालूम हुआ कि औरतों, बच्चों, मुसाफिरों और मरीज़ के लिए जुमा की नमाज़ ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता औरतें, बच्चे मुसाफिर और मरीज़ अगर जुमा की नमाज़ में हाज़िर हो जाएं तो नमाज़ अदा हो जाएगी। वरना इन हज़रात को जुमा की नमाज़ की जगह ज़ुहर की नमाज़ अदा करनी होगी।
अगर आप जंगल में हैं जहां कोई नहीं या हवाई जहाज़ में सवार हैं तो आप ज़ुहर की नमाज़ अदा फरमा लें।
नमाज़े जुमा की दो रिकात फ़र्ज़ है, जिसके लिए जमाअत की नमाज़ शर्त है। जुमा की दोनों रिकात में जेहरी क़िरात ज़रूरी है। नमाज़े जुमा में सूरह अलआला और सूरह अलगाशिया या सूरह अलजुमा और सूरह अलमुनाफेक़ून की तिलावत करना मसनून है।

जुमा की चंद सुन्नतें और आदाब
जुमा के दिन ग़ुस्ल करना वाजिब या सुन्नते मुअक्कदा है यानी शरई उज़्र के बेगैर जुमा के दिन ग़ुस्ल को नहीं छोड़ना चाहिए। पाकी का एहतेमाम करना, तेल लगाना, खुशबू इस्तेमाल करना और हस्बे इस्तिताअत अच्छे कपड़े पहनना सुन्नत है।
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जुमा के दिन का ग़ुस्ल गुनाहों को बालों की जड़ों तक से निकाल देता है यानी छोटे गुनाह माफ हो जाते हैं, बड़े गुनाह बेगैर तौबा के माफ नहीं होते। अगर छोटे गुनाह नहीं हैं तो नेकियों में इज़ाफा हो जाता है। (तबरानी, मजमउज़्ज़वायद)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स जुमा के दिन गुस्ल करता है जितना हो सके पाकी का एहतेमाम करता है और तेल या खुशबू का इस्तेमाल करता है फिर मस्जिद जाता है मस्जिद पहुंच कर जो दो आदमी पहले से बैठे हों उनके दरमियान नही बैठता और जितनी तौफ़ीक़ हो जुमा से पहले नमाज़ पढ़ता है फिर जब इमाम ख़ुत्बा देता है उसको तवज्जोह और खामोशी से सुनता है तो उस शख्स के इस जुमा से पिछले जुमा तक के गुनाहों को माफ कर दिया जाता है (बुखारी)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने जुमा के दिन ग़ुस्ल किया फिर मस्जिद में आया और जितनी नमाज़ उसके मुक़द्दर में थी अदा की फिर खुतबा होने तक खामोश रहा और इमाम के साथ फ़र्ज़ नमाज़ अदा की उसके जुमा से जुमा तक और मज़ीद तीन दिन के गुनाह बख्श दिए जाते हैं। (मुस्लिम)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स जुमा के दिन ग़ुस्ल करता है अगर खुशबू हो तो उसे भी इस्तेमाल करता है, अच्छे कपड़े पहनता है उसके बाद मस्जिद जाता है फिर मस्जिद आ कर अगर मौका हो तो नफल नमाज़ पढ़ता है और किसी को तकलीफ नहीं पहुंचाता है फिर जब इमाम खुतबा देने के लिए आता है उस वक़्त से नमाज़ होने तक खामोश रहता है यानी कोई बातचीत नहीं करता तो यह आमाल इस जुमा से दूसरे जुमा तक के गुनाहों की माफी का ज़रिया हो जाते हैं। (मुसनद अहमद)

जुमा की सुन्नतें
मज़कूरा बाला अहादीस से मालूम हुआ कि जुमा की नमाज़ से पहले बाबरकत घडि़यों में जितनी ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़ पढ़ सकें, पढ़ें। कम से कम खुतबा शुरू होने से पहले चार रिकातें तो पढ़ ही लें जैसा कि (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा जिल्द 2 पेज 131) में मज़कूर है।
नमाज़े जुमा के बाद दो रिकातें या चार रिकातें या छः रिकातें पढ़ें। यह तीनों अमल नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा से साबित हैं। बेहतर यह है कि छः रिकात पढ़ लें ताकि तमाम अहादीस पर अमल हो जाए और छः रिकातों का सवाब भी मिल जाए। इसी लिए अल्लामा इब्ने तैमिया फरमाते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जुमा के बाद चार रिकात पढ़नी चाहिए और हज़रात सहाबा-ए-किराम से छः रिकात भी मंक़ूल है। (मुख्तसर फतावा इब्ने तैमिया, पेज 79) (नमाज़ पयम्बर पेज 281)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब तुम में से कोई जुमा की नमाज़ पढ़ ले तो उसके बाद चार रिकातें पढ़े। (मुस्लिम)
हज़रत सालिम अपने वालिद से नक़ल करते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जुमा के बाद दो रिकातें पढ़ते थे। (मुस्लिम)
हज़रत अता फरमाते हैं कि उन्होंने हज़रत उमर बिन अब्दुल्लाह को जुमा के बाद नमाज़ पढ़ते देखा कि जिस मुसल्ला पर आपने जुमा पढ़ा उससे थोड़ा सा हट जाते थे फिर दो रिकात पढ़ते फिर चार रिकातें पढ़तें थे। मैंने हज़रत अता से पूछा कि आपने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर को कितनी मरतबा ऐसा करते देखा? उन्होंने फरमाया बहुत मरतबा। (अबू दाऊद)

नमाज़े जुमा छोड़ने पर वईदें
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़े जुमा पढ़ने वालों के बारे में फरमाया मैं चाहता हुं कि किसी को नमाज़ पढ़ाने का हुकुम दुं फिर जुमा न पढ़ने वालों को उनके घरों समेत जला डालूं। (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया खबरदार! लेग जुमा छोड़ने से रूक जाएं या फिर अल्लाह तआला उनके दिलों पर मुहर लगा देगा फिर यह लोग गाफिलीन में से हो जाएंगे। (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स ने तीन जुमा गफलत की वजह से छोड़ दिए अल्लाह तआला उसके दिलों पर मुहर लगा देगा। (नसई, इब्ने माजा, तिर्मीज़ी, अबू दाऊद)

जुमा की नमाज़ के लिए पैदल जाना
हज़रत यज़ीद बिन अबी मरयम (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं कि मैं जुमा के लिए पैदल जा रहा था कि हज़रत इबाया बिन राफे (रहमतुल्लाह अलैह) मुझे मिल गए और फरमाने लगे तुम्हें खुशखबरी हो कि तुम्हारे कदम अल्लाह तआला के रास्ता में हैं। मैंने अबू अब्स को यह फरमाते हुए सुना कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो कदम अल्लाह के रास्ता में गुबार आलूद हुए तो वह क़दम जहन्नम की आग पर हराम हैं। (तिर्मीज़ी) इसी मज़मून की रिवायत कुछ लफ़्ज़ी इखतिलाफ के साथ सही बुखारी में भी मौजूद है।

जुमा के दिन या रात में सूरह कहफ की तिलावत
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स सूरह कहफ की तिलावत जुमा के दिन करेगा आने वाले जुमा तक उसके लिए एक खास नूर की रोशनी रहेगी। (नसई, बैहक़ी, हाकिम)
सूरह कहफ के पढ़ने से घर में सुकून और बरकत नाज़िल होती है। हज़रत बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि एक मरतबा एक सहाबी ने सूरह कहफ पढ़ी घर में एक जानवर था वह बिदकना शुरू हो गया उन्होंने गौर से देखा कि क्या बात है? तो उन्हें एक बादल नज़र आया जिसने उनको ढांप रखा था। सहाबी ने इस वाक़या का ज़िक्र जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से किया तो आप सल्लल्लहु आपने फरमाया सूरह कहफ पढ़ा करो। क़ुरान करीम पढ़ते वक़्त सकीनत नाज़िल होती है। (सही बुखारी, फजल सूरह अलकहफ, मुस्लिम किताबुस्सलात)

जुमा के दिन दरूद शरीफ पढ़ने की खास फज़ीलत
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हारे दिनों में सबसे अफ़ज़ल जुमा का दिन है। इस दिन कसरत से दरूद पढ़ा करो क्योंकि तुम्हारा दरूद पढ़ना मुझे पहुंचाया जाता है। (मुसनद अहमद, अबू दाऊद, इब्ने माजा, सही इब्ने हिब्बान)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जुमा के दिन और जुमा की रात कसरत से दरूद पढ़ा करो जो ऐसा करेगा मैं क़यामत के दिन उसकी शिफाअत करूंगा। (बैहक़ी)

जुमा के दिन या रात में इंतिक़ाल कर जाने वाले की खास फज़ीलत
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो मुसलमान जुमा के दिन या जुमा की रात में इंतिक़ाल कर जाए अल्लाह तआला उसको कब्र के फितना से महफूज़ फरमा देते हैं। (मुसनद अहमद, तिर्मीज़ी)

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)