بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

जुमा के दिन जुमा मुबारक कहना

बहुत से दोस्तों ने मुझसे जुमा के दिन लोगों को जुमा मुबारक कह कर मुबारकबादी देने का हुकुम मालूम किया क्योंकि बाज़ हज़रात ने शिद्दत से काम लेकर इस अमल को बिदअत ही क़रार दे दिया है, बात इसी पर खत्म नहीं होती बल्कि इस अमल को बिदअत क़रार दे कर जहन्नम में ले जाने वाला अमल भी साबित कर दिया है। और इसकी वजह यह बयान की है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम के ज़माना में जुमा को जुमा मुबारक कहने का कोई सुबूत नहीं मिलता है।

जवाब अर्ज़ है कि जुमा के दिन को अहादीसे नबविया में ईद से ताबीर किया गया है, जैसा कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया “बेशक जुमा को अल्लाह तआला ने मुस्लमानों के ईद का दिन बनाया है, जो शख्स जुमा की नमाज़ पढ़ने के लिए आए उसे चाहिए कि ग़ुस्ल करे जिसे खुशबू मुयस्सर हो वह खुशबू भी लगाए और मिसवाक को अपने लिए लाज़िम समझो” (इब्ने माजा) अल्लामा इबनुल क़य्यिम ने अपनी मशहूर किताब “ज़ादुल मआद बयानु खसाइसि यौमिल जुमा” में लिखा है कि यह ईद का दिन है जो हर हफ्ते में एक बार आती है।

गरज़ ये कि इस तरह मुसलमान की तीन ईद हो जाती है। एक ईदुल फितर दूसरे ईदुल अज़हा और तीसरे जुमा का दिन। ईदुल फितर और ईदुल अज़हा के मौका पर सहाबा-ए-किराम का एक दूसरे को मुबारकबाद पेश करना साबित है। लेकिन जुमा के दिन मुबारकबादी पेश करने का कोई सुबूत नहीं मिलता लेकिन फिर भी जुमा हफ्ता की ईद है। इस मसअला का तअल्लुक लोगों की आदत से भी है। इस वजह से उलमा-ए-किराम ने लिखा है कि अगर कोई शख्स किसी जुमा को जुमा मुबारक कह कर किसी शख्स को मुबारक बाद पेश करना चाहे तो यह जाएज़ है लेकिन एहतेमाम के साथ हर जुमा को जुमा की नमाज़ के बाद जुमा मुबारक कह कर मुबारकबाद पेश करना सही नहीं है। सउदी अरब के उलमा ने भी तकरीबन यही बात कही है जो इस लिंक पर पढ़ी जा सकती है। हिन्द व पाक के उलमा का भी यही ख्याल है।

अब रहा मामला के बाज़ हज़रात ने जुमा के दिन जुमा मुबारक कह कर किसी शख्स को मुबारक बाद पेश करने को बिदअत क़रार दिया है तो इस नौइयत की शिद्दत सही नहीं है, वरना हमारे बेशुमार आमाल बिदअत बन जाएंगे, हाँ हर जुमा को एहतेमाम के साथ लोगों को जुमा मुबारक कह कर मुबारकबादी देने की आदत बनाना सही नहीं है।

वल्लाहु अलामु बिसवाब

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)