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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

नमाज़े जनाज़ा (गायबाना)

दुनिया में हर इंसान की ज़िन्दगी तैयशुदा है। वक़्त मुअय्यन आने के बाद एक लम्हा भी मोहलत नहीं दी जाती। मुक़र्रर वक़्त पर इस दुनिया से कब्र वाले घर की तरफ मुंतकिल होना ही है। अल्लाह तआला अपने पाक कलाम में फरमाता है।
“जब उनका वक़्त आ पहुंचा फिर एक सेकेंड इधर उधर नहीं हो सकता”
“जब किसी का मुक़र्ररह वक़्त आ जाता है फिर उसे अल्लाह तआला हरगिज़ मोहलत नहीं देता है”
“हर शख्स को मौत का मजा चखना है”
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल की रोशनी में इंतिक़ाल के बाद जितनी जल्दी मुमकिन हो सके मय्यत को ग़ुस्ल व कफन के बाद उसकी नमाज़े जनाज़ा का इहतिाम करना चाहिए। नमाज़े जनाज़ा में जिस क़दर भी ज़्यादा आदमी शरीक हों इसी क़दर मय्यत के हक में अच्छा हैं क्योंकि न मालूम किस की दुआ लग जाए और मय्यत की मगफिरत हो जाए।
रसूलुल्लह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अगर किसी जनाज़ा में 100 मुसलमान शरीक हो कर उस मुर्दे के लिए शिफाअत करें यानी नमाज़े जनाज़ा पढ़ें तो उनकी शिफाअत क़बूल की जाती है। (मुस्लिम)

रसूलुल्लह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अगर किसी मुसलमान के इंतिक़ाल पर ऐसे चालीस आदमी जो अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक नहीं ठहराते हैं उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ते हैं तो अल्लाह तआला उनकी शिफाअत (दुआ) को मय्यत के हक में क़बूल फरमाता है। (मुस्लिम)

रसूलुल्लह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स किसी मुसलमान के जनाज़ा में ईमान के और सवाब की नियत के साथ चला यहां तक कि उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और उसको दफन करने में भी शरीक रहा तो वह दो क़ीरात अज्र (सवाब) लेकर लौटता है और हर क़ीरात उहद पहाड़ के बराबर है और जो शख्स नमाज़ जनाज़ा में शरीक हुआ मगर तदफीन से पहले ही वापस आ गया तो वह एक क़ीरात अज्र के साथ लौटता है। (बुखारी व मुस्लिम)

नमाज़े जनाज़ा में अगर कम लोग हों तब भी तीन सफों में लोगों का खड़ा होना ज़्यादा बेहतर है क्योंकि बाज़ अहादीस में जनाज़ा की तीन सफों की खास फज़ीलत आई हैं। (अबू दाऊद)

नमाज़े जनाज़ा का आगाज़
मुअररेखीन ने लिखा है कि नमाज़े जनाज़ा का हुकुम मक्का में नहीं था, इसी लिए हज़रत खदीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की नमाज़े जनाज़ा अदा नहीं की गई थी। नमाज़े जनाज़ा का हुकुम मदीना में हिजरत के फौरन बाद पहली हिजरी को हुआ और हज़रत बरा बिन मारूर (रज़ियल्लाहु अन्हु) की सबसे पहली नमाज़े जनाज़ा हिजरत के एक माह बाद अदा की गई। (तबक़ात इब्ने साद)

हज़रत नजाशी का तआरूफ
आपका नाम असहमा बिन अबहर है। नजाशी आप का लक़ब है जैसा कि हबशा के हर बादशाह को नजाशी कहा जाता है। बहुत कम उम्र में आप हबशा के बादशाह हुए। हज़रत नजाशी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाए मगर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुलाक़ात न हो सकी। इमाम क़ा ज़हबी ने लिखा है कि आप एक लिहाज़ से सहाबी हैं और एक लिहाज़ से ताबई हैं। (सीरतुल आलामुन नुबला) दो मरतबा सहाबा ने हबशा हिजरत की, एक नबूवत के पांचवीं साल और एक मरतबा बाद में। जब कुफ्फारे मक्का ने सहाबा को वापस करने के लिए हज़रत नजाशी से राब्ता किया तो नजाशी बादशाह ने हज़रत जाफर (रज़ियल्लाहु अन्हु) को अपने पास बुलाया। हज़रत जाफर ने सूरह मरयम की इब्तिदाई आयात पढ़ी तो हज़रत नजाशी जो उस वक़्त तक ईसाई थे रोने लगे, यहां तक कि दाढ़ी भीग गई और कहा बेशक यह कलाम और वह जो हज़रत मूसा ले कर आए थे एक ही मेहराब से निकलने वाला (नूर) है। अल्लाह की क़सम! ऐ कुरैशे मक्का मैं इनको तुम्हारे हवाले नहीं करूंगा। बाद में हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आपको दावते इस्लाम दी, हज़रत नजाशी ने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का खत पकड़ कर उसे अपने आंखों पर रखा, तवाज़ो के साथ अपने तख्त से उतर कर ज़मीन पर बैठ गए और इस्लाम क़बूल फरमा लिया। 9 हिजरी में उनका हबशा में इंतिक़ाल हुआ और उनको नमाज़े जनाज़ा के बेगैर दफन कर दिया गया, हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीना में उनकी नमाज़े जनाज़ा अदा फरमाई।

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को हज़रत नजाशी के इंतिक़ाल की खबर दी फिर आगे बढ़े, सहाबा ने पीछे सफें लगाईं, हुज़ूर ने चार तकबीरें कहीं। (सही बुखारी व सही मुस्लिम)

इमाम बुखारी ने यह हदीस मुख्तलिफ अल्फ़ाज़ के साथ सही बुखारी में बहुत सी जगहों पर ज़िक्र फरमाई है मगर एक मरतबा भी हदीस के लफ्ज़ में यह नहीं है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लहु अलैह वसल्लम ने उनकी गायबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ी। हां इन अहादीस से यह बात ज़रूर मालूम हुई कि हज़रत नजाशी का हबशा में इंतिक़ाल हुआ और उनको नमाज़े जनाज़ा के बेगैर दफन कर दिया गया था नीज़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पहले से बाक़ादा इलान के बेगैर मस्जिदे नबवी में नमाज़ न पढ कर खुले मैदान में जा कर उस वक़्त जो सहाबा मौजूद थे उनकी मौजूदगी में नमाज़ जनाज़ा पढ़ी, यह गायबाना नमाज़ जनाज़ा नहीं थी बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मरई (जो नज़र आ रहा हो) और हाज़िर पर नमाज़ जनाज़ा पढ़ी है, गायब तो वह होता है जो दिखाई न दे क्योंकि बहुत सी अहादीस से मालूम होता है कि हज़रत नजाशी के जनाज़ा को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने कर दिया गया था। जैसा कि हदीस में है। हज़रत इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें खबर दी तुम्हारे भाई हज़रत नजाशी इंतिक़ाल कर गए हैं, खड़े हो जाओ, उनकी नमाज़े जनाज़ा अदा करो, पस हुज़ूर खड़े हो गए और सहाबा ने आप के पीछे सफें बना लीं। हुज़ूर ने चार तकबीरें कहीं, सहाबा यही समझ रहे थे कि हज़रत नजाशी का जिस्म रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आगे हैं। (सही इब्ने हिब्बान, मुसनद अहमद, फतहुल बारी)

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी में इस क़िस्म के वाक़यात इसके अलावा भी पेश आए हैं जिसमें दुनियावी दूरी के बावजूद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने तमाम दुनियावी परदों को हटा दिया गया हो चुनांचे मक्का में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए ज़मीन को लपेट दिया गया था यहां तक कि आपने मक्का में बैठे मस्जिदे अकसा को देख कर उसके अहवाल लोगों के सामने बयान किए। इसी तरह हज़रत उकबा बिन आमिर से रिवायत है कि हुज़ूर ने एक दिन इरशाद फरमाया कि अल्लाह की क़सम! मैं इस वक़्त अपने हौज़ की तरफ देख रहा हूं। (सही बुखारी, सही मुस्लिम)

नमाज़े जनाज़ा (गायबाना) के लिए हज़रत मआविया बिन मआविया मुज़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु) के वाक़या से भी इस्तिदलाल किया जाता है कि हज़रत जिबरईल अलैहिस्सलाम हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास (तबूक में) तशरीफ लाए और कहा या रसूलुल्लाह! हज़रत मआविया मुज़नी फौत हो गए, क्या आप उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ना चाहते हैं? आपने फरमाया हाँ। हज़रत जिबरईल अलैहिस्सलाम ने ज़मीन पर अपना पर मारा तो हर दरख्त और टीला पस्त हो गया और हुज़ूर के लिए हज़रत मआविया की चारपाई बुलंद कर दी गई यहां तक कि हुज़ूर ने उन्हें देखते हुए उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत जिबरईल अलैहिस्सलाम से फरमाया कि हज़रत मआविया को अल्लाह तआला से यह मक़ाम कैसे मिला? हज़रत जिबरईल ने जवाब दिया उनके सूरह इखलास यानी कुल हुवल्लाहु अहद के साथ उनके तअल्लुक की वजह से कि आते जाते उठते बैठते इसकी तिलावत किया करते थे।
लेकिन इस हदीस से नमाज़े जनाज़ा गायबाना के जवाज़ पर इस्तिदलाल करना सही नहीं है क्योंकि इस हदीस की सनद में ज़ोफ है और अगर मज़कूरा हदीस को सही मान भी लिया जाए तो यह भी गायबाना नमाज़े जनाज़ा नहीं थी बल्कि तमाम परदों को हटा कर हज़रत मआविया के जनाज़ा को आप सल्लल्लाहु अलैहि के सामने हाज़िर कर दिया गया था जैसा कि हदीस की इबारत से खुद वाज़ेह हो रहा है। नीज़ अगर गायबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़नी जाएज़ होती तो हज़रत जिबरईल ज़मीन पर अपना पर मारने का एहतेमाम न करते।

खुलासा कलाम
लाखों सफहात पर मुशतमिल हदीस के ज़ख़ीरे में नमाज़े जनाज़ा (गायबाना) पढ़ने के लिए सिर्फ दो वाक़या दलील के तौर पर पेश किया जा सकता है। हालांकि इनकी तौजीह भी हो सकती है और दोनों को खुसूसियत पर भी महमूल किया जा सकता है। अगर नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ने की आम इजाज़त होती तो हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इन बीसियों सहाबा-ए-किराम पर नमाज़े जनाज़ा न छोड़ते जिनकी वफात आप की ज़िन्दगी में मदीना से बाहर हुई। हालांकि हुज़ूर अपने सहाबा की नमाज़े जनाज़ा पढ़ने का खास एहतेमाम फरमाते थे, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा को तालीमात भी दे रखी थी कि अगर कोई जनाज़ा हाज़िर हो तो मुझे ज़रूर बताना। इसी तरह आपके बाद सहाबा का भी कोई मामूल गायबाना नमाज़े जनाज़ा का नहीं था। खुलफाए राशिदीन में से किसी एक की नमाज़े जनाज़ा गायबाना अदा नहीं की गई और न ही नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के बाद किसी सहाबी से किसी एक शख्स की नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ने का कोई सुबूत मिलता है। इल्म और मक़ाम के एतेबार से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद खुलफाए राशिदीन और सहाबा-ए-किराम से बढ़कर कौन हो सकता हैं?

उलमा-ए-उम्मत के अक़वाल
80 हिजरी में पैदा हुए हज़रत इमाम अबू हनीफा और 93 हिजरी में पैदा हुए हज़रत इमाम मालिक के नज़दीक गायबाना नमाज़े जनाज़ा जाएज़ ही नहीं है क्योंकि हज़रत नजाशी की नमाज़े जनाज़ा गायबाना नहीं थी जैसा कि अहादीस से मालूम होता है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और हज़रत नजाशी के दरमियान जितने हिजाबात थे वह सब अल्लाह के हुकुम से दूर कर दिए गए थे यहां तक कि हज़रत नजाशी का जनाज़ा अल्लाह के हुकुम से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने कर दिया गया था। ज़माना कदीम से असरे हाज़िर तक के उलमा अहनाफ और मालकी उलमा की किताबें इसकी गवाह हैं।

हज़रत इमाम शाफई से दो अक़वाल मंकूल हैं, उनमें एक क़ौल यह है कि दूसरे मुल्क में तो नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ने की गुंजाइश है मगर इसी मुल्क में नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ने की इजाज़त नहीं जहां तदफीन हुई हो।
हज़रत इमाम अहमद बिन हमबल से भी दो अक़वाल मंकूल हैं, इनमें से एक क़ौल यह है कि अगर कोई मुसलमान ऐसे मुल्क में फौत हो गया हो जहां कुफ्फार ही रहते हैं तो फिर इसकी नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ी जा सकती हैं
मुफस्सीरे क़ुरान इमाम क़ुर्तुबी ने लिखा है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब हज़रत नजाशी के जिस्म को देखा है, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने गायब पर नमाज़ नहीं पढ़ी बल्कि आपने मरई और हाज़िर पर नमाज़े जनाज़ा पढ़ी है गायब तो वह होता है जो दिखाई न दे। इमाम क़ुर्तुबी आगे लिखते हैं कि हुज़ूर के लिए ज़मीन को हर तरफ से लपेट दिया गया था यहां तक कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत नजाशी को देख लिया जैसे आप के लिए ज़मीन को हर तरफ से लपेट दिया गया था यहां तक कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का में बैठे मस्जिद अक़सा को देख कर उसके अहवाल बयान किए। (क़ुर्तुबी)

मशहूर मुहद्दिस इमाम ज़हबी हज़रत नजाशी की नमाज़े जनाज़ा के मुतअल्लिक लिखा है कि इस जनाज़ा को पढ़ने की वजह यह थी कि हज़रत नजाशी का विसाल कौमे नसारा में हुआ था और वहां कोई ऐसा नहीं था जो आप की नमाज़ अदा करें क्योंकि सहाबा जो हिजरत करके वहां गए थे वह फतहे खैबर के साल हिजरत करके मदीना चले गए थे। (सियरूल आलाम)

अल्लामा इबनुल क़य्यिम अपनी किताब (ज़ादुल मआद) में लिखते हैं कि जिस शख्स की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जा चुकी है उसकी गायबाना नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जाएगी। अल्लाह इब्ने तैमिया का भी यही मौक़िफ है। अल्लामा अलबानी ने आपनी किताब (तलखीस अहकामुल जनाएज़) में लिखा है कि जिस शख्स की नमाज़े जनाज़ा अदा की जा चुकी है उसकी गायबाना नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जाएगी क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद खुलफाए राशिदीन में से किसी की गायबाना नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी गई। अल्लामा इब्ने तैमिया, अल्लामा इबनुल क़य्यिम और अलबानी का तज़किरा इस वजह से किया गया है कि इन दिनों जो हज़रात गायबाना नमाज़ जनाज़ा पढ़ने की बात करते हैं इनमें से अक्सर हज़रात अहकाम व मसाइल में इन हज़रात के अक़वाल को हरफ आखिर समझते हैं।

नमाज़े जनाज़ा (गायबाना)
हज़रत नजाशी के वाक़या से ज़्यादा से ज़्यादा यह साबित हो सकता है कि अगर कोई मुसलमान ऐसे इलाका में इंतिक़ाल कर जाए जहां उसकी नमाज़े जनाज़ा अदा नहीं की गई हो तो ऐसे शख्स की गायबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ने की गुंजाइश है लेकिन आज कल बाज़ हज़रात ने गायबाना नमाज़े जनाज़ा पर इस तरह अमल शुरू कर दिया है कि हर आम व खास की नमाज़े जनाज़ा गायबाना अदा करते हैं हालांकि एलाने आम के बाद मय्यत की बाक़ादा नमाज़े जनाज़ा अदा हो जाए और इसमें सैकड़ों या हजारों लोगों ने शिरकत भी करली तो गायबाना नमाज़े जनाज़ा की बात बिल्कुल समझ में नहीं आती। हां दुनिया के कोने कोने से मय्यत के लिए हम दुआ व इस्तिगफार कर सकते हैं और खूब दुआ व इस्तिगफार करना चाहिए ताकि अल्लाह तआला मय्यत की मगफिरत फरमाए और उसके दरजात को बुलंद फरमाए। रही बात शाहे हबशा हज़रत नजाशी की नमाज़े जनाज़ा की, तो दलाइल के साथ ज़िक्र किया गया कि जब उनका इंतिक़ाल हुआ तो वहां कोई और मुसलमान नहीं था, नीज़ अल्लाह तआला ने उनके जनाज़ा के सामने से तमाम रूकावटों को दूर कर दिया था जैसा कि अहादीस व सीरत की किताबों में वज़ाहत मौजूद है लिहाज़ा हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इनकी नमाज़े जनाज़ा अदा फरमाई। इस वाक़या के अलावा किसी की नमाज़े जनाज़ा (गायबाना) नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नहीं पढ़ी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बहुत से जानिसार सहाबा, आपके चचाज़ाद भाई हज़रत जाफर, आपके मुंह बोले बेटे हज़रत जैद बिन हारसा इन सबका इंतिक़ाल हालते सफर में हुआ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद आपके चार खुलफा में से किसी एक की नमाज़े जनाज़ा गायबाना नहीं पढ़ी गई, नीज़ किसी एक सहाबी से भी एक वाक़या भी नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ने का कोई सुबूत नहीं मिलता हालांकि वह हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल को हम से ज़्यादा अच्छी तरह समझते थे और हम से ज़्यादा हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल पर अमल करने का जज़बा रखते थे।

दीनी भाईयो! जिस अमल की मशरूइयत में ही इखतिलाफ हो कि हज़रत इमाम अबू हनीफा और हज़रत इमाम मालिक के नज़दीक नमाज़े जनाज़ा गायबाना जाएज़ ही नहीं है। हज़रत इमाम शाफई और हज़रत इमाम अहमद बिन हमबल ने चंद शराएत के साथ महदूद इजाज़त तो दी है लेकिन कभी भी ज़िन्दगी में इन दोनों हज़रात से नमाज़े जनाज़ा गायबाना पढ़ने का कोई सुबूत नहीं मिलता है तो अक़्ल भी कहती है कि मशकूक अमल को क्यों किया जाए बल्कि मय्यत के लिए सदका जारिया के तौर पर कुछ काम करा दें जिससे मुस्लमानों का तालीमी या माली फायदा भी हो या कम से कम मय्यत की मगफिरत और दरजात की बुलंदी के लिए दुआ ही करें, इसमें किसी तरह का कोई इखतिलाफ भी नहीं है।

नमाज़ पढि़ए इससे पहले कि आपकी नमाज़ पढ़ी जाए अकलमंद शख्स वह है जो मरने से अपने मरने की तैयारी कर ले।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)