بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

मरीज़ की नमाज़ का हुकुम

अगर कोई बीमार ऐसा है कि उसके कपड़े या बदन की नापाकी दूर नहीं की जा सकती है मसलन पेशाब के लिए थैली लगी हुई है तो वह नापाकी की मौजूदगी में नमाज़ अदा करेगा। जहां तक वज़ू करने का मामला है तो अगर वज़ू कर सकता है तो वज़ू करे वरना तयम्मुम करे। और अगर कोई दूसरा शख्स वज़ू या तयम्मुम करा सकता है तो करा दे। वज़ू में जो आज़ा धोए जाते हैं अगर उस जगह पर पट्टी बंधी हुई है तो वज़ू करने की सूरत में जिस जगह पर पट्टी पंधी हुई है उस जगह पर मसह कर लें, बाकी आज़ा को धोले। तयम्मुम के लिए मिट्टी या मिट्टी की जिन्स से कोई चीज़ होनी चाहिए या कम से कम उस पर मिट्टी का कुछ असर हो। आज कल जो आला क़िस्म के पेंट दीवारों पर होते हैं उस से तयम्मुम नहीं किया जा सकता है। अगर कोई बीमार वज़ू नहीं कर सकता है और मिट्टी या मिट्टी की जिन्स से कोई चीज़ नहीं है तो फिर बेगैर वज़ू या तयम्मुम के ही नमाज़ अदा करले।

बीमार अगर खड़े होकर नमाज़ अदा नहीं कर सकता है तो बैठ कर अदा करे अगर बैठ कर अदा नहीं कर सकता तो लेट कर ही अदा करे, हत्ताकि उलमा ने लिखा है कि इशारा से भी नमाज़ पढ़ सकता है तो उसको पढ़नी चाहिए। यानी यह ख्याल करे के मैं अब रुकू में हूं और अब सजदा में हूं और दिल ही दिल में जो नमाज़ में पढ़ा जाता है पढ़ता रहे।

अगर मरीज़ क़िबला की तरफ रूख करके नमाज़ पढ़ सकता है तो उसको क़िबला की तरफ रूख करके नमाज़ पढ़नी चाहिए लेकिन अगर किसी उज़्र की वजह से क़िबला की तरफ रूख करके नमाज़ पढ़ना मुमकिन नहीं है तो जिस तरफ मुमकिन हो रूख करके नमाज़ पढ़ ले।

अगर किसी शख्स की सख्त बीमारी की वजह से नमाजें छूट जाए तो सेहत के बाद उनकी क़ज़ा करनी होगी लेकिन अगर कोई शख्स सेहतयाब न हो सका और दुनिया से रूखसत हो गया तो वारिसीन को चाहिए कि हर नमाज़ के बदले सदका फितर के मिक़दार सदका निकालें, हज़रत इमाम अबू हनीफा और उलमा-ए-अहनाफ की तहक़ीक़ के मुताबिक़ तक़रीबन दो किलो गेंहू या उसकी क़ीमत हर नमाज़ के बदले में गरीबों को दें। इसी तरह अगर कोई शख्स बीमारी की वजह से रोज़ा नहीं रख सका तो उको बाद में क़ज़ा करनी होगी। लेकिन अगर कोई शख्स अपने मर्ज़ या बुढ़ापे की वजह से बाद में भी रोज़ा नहीं रख सकता है तो हर रोज़े के बदले में सदक़ए फितर के मिक़दार सदक़ा निकाले। जो औरतें हैज़ या निफास की वजह से रोज़ा नहीं रखती हैं उन्हें बाद में क़ज़ा करनी होगी, सदक़ा देना काफी नहीं होगा मगर यह कि औरत के लिए अपने किसी मर्ज़ की वजह से बाद में भी रोज़ा रखना दुशवार हो। बीमार शख्स अगर सुन्नत और नफल पढ़ सकता है तो पढ़ ले वरना सिर्फ फ़र्ज़ अदा कर ले।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)