بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

नमाज़ी के सामने से गुज़रने की सज़ा

नमाज़ी के आगे से गुज़रना बड़ा गुनाह है। लिहाज़ा गुज़रने वालों को चाहिए कि वह नमाज़ी ख्याल रखें। इसी तरह नमाज़ पढ़ने वालों को भी चाहिए कि वह ऐसी जगह नमाज़ पढ़ें जहां से गुज़रने वालों को परेशानी न हो और अगर ऐसी जगह न मिले तो उन्हें चाहिए कि वह अपने सामने कोई चीज़ मसलन कुर्सी या लकड़ी का तख्ता सुतरह के तौर पर रख लें, जिसकी ऊचाई तकरीबन एक ज़िरा के करीब (एक फिट से कुछ ज़्यादा) हो।

नमाज़ी के सामने गुज़रने और सुतरह के मुतअल्लिक चंद अहादीस
हज़रत अबू जुहम से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया नमाज़ी के सामने से गुज़रने वाला अगर जान ले कि इसपर कितनी बड़ी सज़ा है तो वह उस के सामने से गुज़रने के बजाए चालीस तक ठहरा रहता तो यह बेहतर था। (बुखारी, मुस्लिम, मुअत्ता मालिक)

अबू नज़र कहते हैं कि मुझे मालूम नहीं, आपकी मुराद चालीस दिन थी या चालीस महीना या चालीस साल। अलबत्ता मुसनद अहमद और इब्ने माजा की अहादीस से मालूम होता है कि इससे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुराद चालीस साल है, यानी नमाज़ी के आगे गुज़रना नहीं चाहिए चाहे 40 साल तक खड़े रहना पड़े।

हज़रत काब अहबार फरमाते हैं कि अगर नमाज़ी के सामने गुज़रने वाले को मालूम हो जाए कि इसपर कितनी सख्त सज़ा है तो उसके बदले अगर वह ज़मीन में धंस जाए तो उसके लिए नमाज़ी के सामने गुज़रने से यह बेहतर है। (मुअत्ता मालिक)

हज़रत आइशा फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से नमाज़ के सुतरह के बारे में पूछा गया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुअखिरूहल (कजावा की कील) की तरह। (मुस्लिम)
अल्लामा नववी इसकी तशरीह फरमाते हैं कि सुतरह की कम से कम मिक़दार कजावा की कील जितनी होती है जो कि कलाई की हडडी और दो तिहाई ज़िरा के बराबर होती है और इसी तरह की कोई चीज़ खड़ी करने से यह मकसद हासिल हो जाएगा।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ईदगाह तशरीफ ले जाते और आपके आगे नेज़ा बरदार होता। यह नेज़ा ईदगाह में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने गाड़ दिया जाता फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस तरफ नमाज़ पढ़ते। (मुस्लिम)

चंद ज़रूरी मसाइल
अगर किसी मैदान या सेहन में नमाज़ अदा की जा रही है तो बाजमाअत नमाज़ में इमाम का सुतरह सबकी तरफ से काफी है। फिर सुतरह की मौजूदगी में अगर कोई शख्स सामने से गुज़र जाए तो गुनहगार नहीं होगा।

मस्जिदे हराम (मक्का) में नमाज़ पढ़ने वालों के आगे से गुज़रने की गुनजाइश है। मस्जिदे नबवी (मदीना) का हुकुम भी मस्जिदे हराम की तरह है कि वहां पर भी भीड़ ज़्यादा होने की सूरत में नमाज़ पढ़ने वालों के आगे से गुज़र सकते हैं। मगर दोनों मस्जिदों (मस्जिदे हराम और मस्जिदे नबवी) में भी नमाज़ी के आगे गुज़रने से जहां तक मुमकिन हो बचने की कोशिश करें।

अहादीस में नमाज़ी के आगे से गुज़रने से मना किया गया है, लिहाज़ा अगर कोई शख्स मस्जिद में बैठा हुआ है और उसके पीछे कोई शख्स नमाज़ पढ़ रहा है तो यह शख्स नमाज़ी के आगे से उठ कर जा सकता है क्योंकि यह नमाज़ी के आगे से गुज़रना नहीं कहलाया जाएगा।

नमाज़ी अगर किसी शख्स को उसके आगे से गुज़रता हुआ देखे तो एक हाथ से इशारा से नमाज़ी उस गुज़रने वाले शख्स को रोक सकता है। अगर कोई शख्स गुज़र ही जाए तो नमाज़ पढ़ने वाले की नमाज़ उससे खराब नहीं होगी।
अगर सुतरह नहीं रखा है तो तीन चार सफों के बाद नमाज़ी के आगे से गुज़रने की गुनजाइश है। दूसरे उलमा ने एक सफ के बाद गुज़रने की इजाज़त दी है। मगर इहतियात इसी में है कि नमाज़ी के आगे से गुज़रने से जहां तक मुमकिन हो बचें क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात नमाज़ी के आगे से गुज़रने से बचने की हैं।

किसी सुतून के पीछे नमाज़ पढ़ने की सूरत में सुतून सुतरह का बदल हो जाएगा।
फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने के बाद सुन्नत या नफल की नियत न बांधे बल्कि कुछ देर अल्लाह का ज़िक्र कर लें या दुआएं कर लें। ताकि जिन हज़रात को कोई ज़रूरीयात या तकाज़ा हो तो वह मस्जिद से निकल सकें।

याद रखें कि सुन्नत और नफल का घर पर पढ़ना ज़्यादा बेहतर है, अलबत्ता अगर किसी शख्स के लिए घर सुन्नत या नफल का एहतेमाम दुशवार है तो वह शख्स फ़र्ज़ नमाज़ से फरागत के बाद मस्जिद में ही सुन्नत अदा कर लें।
औरतें घर के किसी कोने में इस तरह नमाज़ अदा करें कि किसी शख्स को उसके आगे से गुज़रना न पड़े। किसी कोने में जगह न मिलने की सूरत में कोई चीज़ सुतरह के तौर पर रख कर उसके पीछे नमाज़ पढ़ें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)