Print

بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

सुनन व नवाफिल

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अल्लाह तआला फरमाता है कि बन्दा नवाफिल के ज़रिये मेरे क़ुर्ब में तरक़्क़ी करता रहता है यहां तक कि मैं उसको अपना महबूब बना लेता हूं और जब मैं उसका कान बन जाता हूं जिससे वह सुने, उसकी आंख बन जाता हूं जिससे वह देखे, उसका हाथ बन जाता हूं जिससे वह पकड़े, उसका पांव बन जाता हूं जिससे वह चले, जो वह मुझसे मांगता है मैं उसको देता हूं। (सही बुखारी) हाथ पांव बन जाने का मतलब यह है कि उसका हर काम अल्लाह की रिज़ा और मोहब्बत के मातहत होता है, उसका कोई भी अमल अल्लाह की मर्ज़ी के खिलाफ नहीं होता।

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया क़यामत के दिन आदमी के आमाल में से सबसे पहले फ़र्ज़ नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा अगर नमाज़ सही निकली तो वह कामयाब होगा अगर नमाज़ खराब हुई तो वह नाकाम और घाटा में होगा और नमाज़ में कुछ कमी पाई गई तो इरशादे खुदावंदी होगा कि देखो इस बन्दे के पास कुछ नफलें भी हैं जिनसे फ़र्ज़ों को पूरा कर दिया जाए, अगर निकल आएं तो उनसे फ़र्ज़ की पूरी कर दी जाएगी। (तिर्मीज़ी, इब्ने माजा, नसई, अबू दाऊद, मुसनद अहमद)

मज़कूरा और दूसरे अहादीस की रौशनी में हर मुसलमान को चाहिए कि फ़र्ज़ नमाज़ के साथ सुनन व नवाफिल का भी खास एहतेमाम करे ताकि अल्लाह तआला का क़ुर्ब भी हासिल हो जाए जैसा कि ऊपर की हदीस से मालूम हुआ कि बन्दा नवाफिल के ज़रिये अल्लाह तआला से करीब होता जाता है। नीज़ अगर खुदानखास्ता क़यामत के दिन फ़र्ज़ नमाज़ों में कुछ कमी निकले तो सुनन व नवाफिल से उसकी भरपाई कर दी जाए जैसा कि हदीस की किताबों में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान ज़िक्र किया गया।

सुनन व नवाफिल को घर के उस खास हिस्सा में अदा करना जो नमाज़ के लिए मखसूस किया गया है मस्जिद में अदा करने से बेहतर है और अफ़ज़ल है, अलबत्ता घर में अगर सुकून व इतमिनान नहीं है या मस्जिद से वापस आ कर दुनियावी कामों में घिर जाने का अंदेशा है तो बेहतर है कि मस्जिद में ही सुनन व नवाफिल अदा कर लें। हज़रत ज़ैद बिन साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ऐ लोगो! अपने घरों में नमाजें पढ़ा करो, इसलिए कि सिवाए फ़र्ज़ नमाज़ों के बाकी नमाजें (सुन्नतें और नवाफिल) घर में अदा करना अफ़ज़ल है। (बुखारी व मुस्लिम) हज़रत जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब तुम फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद में अदा कर लो तो कुछ नमाज़ (सुनन व नवाफिल) घर में भी पढ़ा करो, इसलिए कि अल्लाह तआला नमाज़ों की बदौलत घर में खैर व बरकत पैदा करता है। (मुस्लिम)

नमाज़े तहज्जुद
क़ुरान करीम में फ़र्ज़ नमाज़ के बाद जिस नमाज़ का ज़िक्र ताकीद के साथ बार बार किया गया वह तहज्जुद की नमाज़ है जो तमाम नवाफिल में सबसे अफ़ज़ल नमाज़ है। इरशादे बारी है “वह लोग रातों को अपने बिस्तरों से उठकर अपने रब के अज़ाब के डर से और सवाब की उम्मीद पर पुकारते रहते हैं”” (यानी नमाज़, ज़िक्र और दुआ में लगे रहते हैं) (सूरह सजदा 16) यह उनकी सिफत और अमल है लेकिन जज़ा और बदला से बहुत ज़्यादा बड़ा है कि ऐसे लोगों के लिए आंखों की ठंडक का जो सामान गैब के खजाने में मौजूद है उसकी किसी शख्स को भी खबर नहीं। यह उनको उनके आमाल का बदला मिलेगा जो वह किया करते थे। (सूरह सजदा 17) इसी तरह अल्लाह तआला फरमाता है “रहमान के (सच्चे) बन्दे वह हैं जो ज़मीन पर आजिज़ी के साथ चलते हैं और जब बेइल्म लोग इनसे बातें करने लगते हैं तो वह कह देते हैं कि सलाम है और जो अपने रब के सामने सजदे और क़याम करते हुए रातें गुज़ार देतें हैं” (सूरह फ़ुरक़ान 64) इसके बाद सूरह के आखिर में अल्लाह तआला फरमाता है यही लोग हैं जिन्हें उनके सब्र के बदले जन्नत में बाला खाने दिए जाएंगे, नीज़ अल्लाह तआला का फरमान है वह लोग रात में बहुत ही कम सोया करते थे (यानी रात के अक्सर हिस्सा में इबादत में मशगूल रहते थे) और रात के आखिरी हिस्से में इस्तिगफार किया करते थे। (सूरह जारियात 178)

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया नमाज़ों के बाद सबसे अफ़ज़ल नमाज़ रात की है यानी तहज्जुद (जो रात के आखिर हिस्सा में अदा की जाती है)। (मुस्लिम)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ऐ लोगो! सलाम फैलाओ, लोगों को खाना खिलाओ और रातों में ऐसे वक़्त नमाजें पढ़ो जबकि लोग सो रहे हों, सलामती के साथ जन्नत में दाखिल हो जाओगे। (तिर्मीज़ी, इब्ने माजा)

हज़रत अबू हुरैरा और हज़रत अबू सईद (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब आदमी रात में अपने घर वालों को जगाता है और मियां बीवी दोनों तहज्जुद की (कम से कम) दो रिकात पढ़ लेते हैं तो उन दोनों का शुमार ज़िक्र करने वालों में हो जाता है। (अबू दाऊद)

हज़रत हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रात को क़याम फरमाते यहां तक कि आप के पांव मुबारक में वरम (फूल) आ जाता। मैंने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के रसूल! आपके तमाम अगले पिछले गुनाह माफ कर दिए गए हैं (अगर होते भी) फिर आप ऐसा क्यों करते हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया क्या मैं अपने रब का शुक्रगुजार बंदा न बनू। (बुखारी)

सुन्नते मुअक्कदा (दो रिकात नमाज़े फज़्र से पहले, चार रिकात नमाज़े ज़ुहर से पहले, दो रिकात नमाज़े ज़ुहर के बाद, दो रिकात नमाज़े मग़रिब के बाद और दो रिकात नमाज़े इशा के बाद)

हज़रत उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना जिस शख्स ने दिन और रात में बारह रिकातें पढीं जो कि फ़र्ज़ नहीं हैं उके लिए जन्नत में एक घर बना दिया गया। (मुस्लिम) तिर्मीज़ी में यह रिवायत वज़ाहत के साथ आई है। हज़रत उम्मे हबीबा फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो शख्स दिन रात में यह बारह रिकातें पढ़ेगा उसके लिए जन्नत में घर बनाया जाएगा, चार ज़ुहर से पहले और दो ज़ुहर के बाद, दो मग़रिब के बाद, दो इशा के बाद, दो फज़्र से पहले। (तिर्मीज़ी) हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़ुहर से पहले चार रिकातें अदा फरमाते, फिर लोगों को मग़रिब की नमाज़ पढ़ाते और घर वापस तशरीफ लाकर दो रिकात नमाज़ पढ़ते, फिर लोगों को इशा की नमाज़ पढ़ाते और घर तशरीफ लाकर दो रिकात नमाज़ अदा फरमाते थे। (मुस्लिम)

हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया फज़्र की दो रिकात (सुन्नत) दुनिया और दुनिया में जो कुछ है उससे बेहतर है। एक दूसरी रिवायत में है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया यह दो रिकात पूरी दुनिया से ज़्यादा महबूब हैं। (मुस्लिम) हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया फज़्र की दो रिकात (सुन्नत) न छोड़ो अगरचे घोड़ों से तुमको रौंद दिया जाए। (अबू दाऊद) हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने फज़्र की दो रिकात (सुन्नत) न पढ़ी हो तो उसे चाहिए कि सूरज निकलने के बाद पढ़े (तिर्मीज़ी) हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़ुहर से पहले चार रिकात और फज़्र से पहले दो रिकात कभी नहीं छोड़ते थे। (बुखारी) हज़रत उम्मुल मोमेनीन उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अन्हा) रिवायत करती हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिस शख्स ने ज़ुहर से पहले चार और और ज़ुहर के बाद भी चार रिकातें पढ़ने की पाबन्दी की अल्लाह तआला ने उसको (जहन्नम की) आग पर हराम कर दिया। (तिर्मीज़ी, अबू दाऊद) हज़रत उम्मुल मोमेनीन उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अन्हा) रिवायत करती हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो मोमिन बन्दा भी ज़ुहर के बाद चार रिकातें पढ़ता है उसे जहन्नम की आग इंशाअल्लाह कभी नहीं छुएगी। (नसई)

(वज़ाहत) हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की रिवायत से ज़ुहर से पहले की चार सुन्नतें और फज़्र से पहले की दो सुन्नतें साबित हुईं। यह सुन्नते मुअक्कदा हैं, आप इनका खास एहतेमाम फरमाते थे जबकि हज़रत उम्मे हबीबा वाली रिवायत में ज़ुहर के बाद चार रिकात की फज़ीलत बयान हुई। फुक़हा ने लिखा है कि यह दो रिकात सुन्नते मुअक्कदा के अलावा दो नफल हैं। हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब ज़ुहर से पहले चार रिकात न पढ़ते तो उन्हें बाद में पढ़ लेते। (तिर्मीज़ी) हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ुहर से पहली चार रिकात रह जाती तो आप ज़ुहर के बाद दो रिकात अदा करके छूटी हुई चार रिकात अदा फरमाते थे। (इब्ने माजा)

(वज़ाहत) कभी कभी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़ुहर से पहले दो रिकात अदा करते थे जैसा कि मुस्लिम में हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) की रिवायत में हैं।
सुनने गैर मुअक्कदा (चार रिकात नमाज़े असर से पहले और चार रिकात नमाज़े इशा से पहले)
हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम असर से पहले चार रिकात पढ़ते थे। (तिर्मीज़ी) हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह तआला उस शख्स पर रहम करे जिसने असर से पहले चार रिकात पढ़ी। (तिर्मीज़ी, अबू दाऊद)

(वज़ाहत) अगर वक़्त कम है तो दो रिकात भी पढ़ सकते हैं जैसा कि अबू दाऊद की रिवायत में है कि हज़रत अली फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़े असर से पहले (कभी कभी) दो रिकात नमाज़ अदा फरमाते थे। हज़रत अली के हवाला से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म का यह इरशाद नक़ल किया है कि जिसने इशा से पहले चार रिकात पढ़ी गोया उसने रात को तहज्जुद पढ़ी और इशा के बाद चार रिकात पढ़ने वाले को शबे क़दर में चार रिकात पढ़ने का सवाब मिलेगा। बैहक़ी ने इस रिवायत को हज़रत आइशा से और नसई व दारे क़ुतनी ने हज़रत काब से नक़ल किया है।

हज़रत ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि हज़रात सहाबा-ए-किराम इशा की नमाज़ से पहले चार रिकात को मुस्तहब समझते थे। अल्लामा नवाब सिद्दीक हसन खां शरह बुलूगुल मराम (मिसकुल खिताम, जिल्द 1, पेज 525-529) में नक़ल करते हैं कि इशा से पहले चार रिकात मुस्तहब हैं नीज़ इशा से पहले दो रिकात नमाज़ पढ़ने को भी वह हदीस शामिल है जिमें अज़ान व इक़ामत के दरमियान नफल नमाज़ पढ़ने की तरगीब है।

उम्मुल मोमेनीन हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नमाज़ के बारे में सवाल किया गया तो आप ने फरमाया कि आप लोगों के साथ इशा की नमाज़ पढ़ कर घर आते और चार रिकात पढ़कर बिस्तर पर आराम फरमाते। (अबू दाऊद) उम्मुल मोमेनीन हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कभी इशा के बाद नमाज़ पढ़कर मेरे यहां तशरीफ नहीं लाए मगर आपने चार या छः रिकातें (दो रिकात सुन्नते मुअक्कदा के साथ) ज़रूर पढ़ीं। (अबू दाऊद)

नमाज़े वित्र के बाद बैठ कर दो नफल पढ़ना मुस्तहब है
हज़रत अबू सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि मैंने हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम की नमाज़ के बारे मे पूछा तो हज़रत आइशा ने फरमाया कि आप तेरह रिकातें पढ़ते थे, पहले आठ रिकात तहज्जुद पढ़ते फिर तीन रिकात वित्र पढ़ते फिर दो रिकात बैठ कर पढ़ते। (मुस्लिम)
हज़रत उम्म सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वित्र के बाद दो हल्की रिकातें (नफल) बैठ कर पढ़ा करते थे। (इब्ने माजा, तिर्मीज़ी)
हज़रत अबू उमामा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वित्र के बाद दो रिकात (नफल) बैठ कर पढ़ा करते थे, पहली रिकात में सूरह ज़ुलज़िलत और दूसरी रिकात में सूरह काफेरून पढ़ते थे। (मुसनद अहमद)

नमाज़े इशराक़
अक्सर उलमा ने इशराक़ और चाश्त की नमाज़ों को अलग अलग नमाज़ शुमार किया है, सूरज निकलने से तक़रीबन 15 से 20 मिनट बाद इशराक की नमाज़ अदा की जाती है जो सूरज में तेजी आने तक पढ़ी जा सकती है। चाश्त की नमाज़ का वक़्त सूरज में तेजी आने के बाद ज़वाले आफताब तfक है। इशराक के वक़्त दो या चार रिकात अदा करें। चाश्त की भी चार रिकातें हैं अगरचे बाज़ अहादीस में आठ रिकातों का भी ज़िक्र मिलता है, इस लिए इन औक़ात में अल्लाह तआला जितनी तौफीक़ दे नफल नमाज़ अदा कर लें।
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मुझे मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन बातों की वसीयत फरमाई है, जब तक मैं ज़िन्दा रहूंगा इनको नहीं छोडूंगा, हर महीने तीन दिन के रोज़े रखना, इशराक की नमाज़ अदा करना, सोने से पहले वित्र पढ़ना। (मुस्लिम)

हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इशराक की चार रिकात नमाज़ पढ़ते थे और कभी ज़्यादा भी पढ़ते थे। (मुस्लिम)

हज़रत अबूज़र गिफारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया हर सही सालिम जोड़ या हडडी के बदले हर रोज़ सुबह को तुम पर सदका वाजिब होता है। सुबहानल्लाह कहना सदका है, अलहमदुलिल्लाह कहना सदका है, लाइलाह इल्लल्लाह कहना सदका है, अल्लाहु अकबर कहना सदका है, नेकी का हुकुम देना सदका है, बुराई से रोकना सदका है और इन सबके लिए वह दो रिकातें हो जाती हैं जिन्हें कोई चाश्त के वक़्त पढ़ता है। (मुस्लिम)

हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) चाश्त की आठ रिकात पढ़ा करती थीं, फिर फरमाती कि अगर मेरे वालिदैन को आरे से चीर भी दिया जाए तो मैं यह नहीं छोडूंगीं। (मुअत्ता इमाम मालिक)

हज़रत अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स फज़्र की नमाज़ जमाअत से पढ़ता है और सूरज निकलने तक अल्लाह तआला के ज़िक्र में मशगूल रहता है फिर दो रिकात नफल पढ़ता है तो उसे हज और उमरह का सवाब मिलता है, हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन मरतबा इरशाद फरमाया पूरे हज व उमरह का सवाब, पूरे हज व उमरह का सवाब, पूरे हज व उमरह का सवाब मिलता है। (तिर्मीज़ी)

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक लशकर भेजा जो बहुत ही जल्द बहुत सारा गनीमत का माल लेकर वापस लौट आया। एक सहाबी ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! हमने कोई ऐसा लशकर नहीं देखा जो इतनी जल्दी इतना सारा माले गनीमत लेकर वापस आया हो। अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि क्या मैं तुम्हें इससे भी कम वक़्त में इस माल से बहुत ज़्यादा माले गनीमत कमाने वाला शख्स न बताऊं? यह वह शख्स है जो अपने घर से अच्छी तरह वज़ू करके मस्जिद जाता है, फज़्र की नमाज़ पढ़ता है, फिर (सूरज निकलने के बाद) इशराक की नमाज़ पढ़ता है तो यह बहुत थोड़े वक़्त में ज़्यादा नफा कमाने वाला है। (सही इब्ने हिब्बान)

हज़रत मआज़ बिन अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स फज़्र की नमाज़ से फारिग हो कर उसी जगह बैठा रहता है, खैर के अलावा कोई बात नहीं करता, फिर दो रिकात (इशराक की नमाज़) पढ़ता है उसके (छोटे) गुनाह माफ हो जाते हैं चाहे वह समुन्दर के झाग से ज़्यादा ही क्यों न हों। (अबू दाऊद)

हज़रत अबू दरदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अल्लाह तआला फरमाता है आदम के बेटे! दिन के शुरू में चार रिकात पढ़ने से आजिज़ न बन, मैं तुम्हारे दिन भर के काम बना दूंगा। (मुसनद अहमद, सही इब्ने हिब्बान)

मग़रिब और इशा के दरमियान नवाफिल (नमाज़े औवाबीन)
मग़रिब और इशा के दरयमान का वक़्त बहुत क़ीमती वक़्त है, इसको गनीमत समझ कर इसमें कुछ नवाफिल पढ़ना यक़ीनन अजर व सवाब का बाइस है, अल्लाह तआला फरमाता है “इन के पहलू सोने की जगह से जुदा रहते हैं, अपने रब को खौफ और उम्मीद के साथ पुकारते हैं और जो कुछ हमने उन को दिया है उसमें खैरात किया करते हैं।” (सूरह सजदा 16) जमहूर उलमा की राय में इस आयत से मुराद दरमियान नफल नमाज़ अदा करना है। (तफसीर इब्ने कसीर, फतहुल क़दीर)

इसी तरह अल्लामा इब्ने जौज़ी अपनी किताब ज़ादुल मसीर जिल्द 6 पेज 339 में लिखते हैं: हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते है कि यह आयत उन सहाबा की तारीफ में नाज़िल हुई जो मग़रिब और इशा के दरमियान नफल नमाज़ पढ़ते थे।

शैख मोहम्मद बिन नसर अलमरवज़ी ने क़यामुल लैल पेज 56 पर बहुत से सहाबा का अमल नक़ल किया है कि वह उस वक़्त में नवाफिल पढ़ते थे, हज़रत अबू मामर फरमाते है कि सहाबा-ए-किराम मग़रिब के बाद चार रिकात पढ़ने को मुस्तहब समझते थे। (क़यामुल लैल, पेज 58)

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स मग़रिब की नमाज़ के बाद छः रिकातें इस तरह पढ़ता है कि उनके दरमियान कोई फ़िज़ूल बात नहीं करता तो उसे बारह साल की इबादत के बराबर सवाब मिलता है। (तिर्मीज़ी)

हज़रत अम्मार बिन यासिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साहबजादे हज़रत मोहम्मद बिन अम्मार फरमाते हैं कि मैंने हज़रत अम्मार बिन यासिर को मग़रिब के बाद छः रिकात अदा करते देखा और उन्होंने फरमाया कि मैंने अपने हबीब हज़रत मोहम्मद मुसतफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मग़रिब के बाद छः रिकात अदा करते हुए देखा और उन्होने फरमाया जो शख्स मग़रिब के बाद छः रिकात पढ़ले तो उसके तमाम (छोटे) गुनाह माफ कर दिए जाते है खाह वह समुन्दर के झाग के बराबर ही क्यो न हों।

(वज़ाहत) मग़रिब के बाद दो रिकात सुन्नते मुअक्कदा के अलावा चार रिकात नवाफिल और पढ़ी जाए तो छः रिकात हो जाऐगी, बाज़ उलमा के नज़दीक यह छः रिकत मग़रिब की दो रिकात सुन्नते मुअक्कदा के अलावा है।

तहैयतूल वज़ू
हज़रत अबू हूरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक रोज़ नमाज़े फज़्र के बाद हज़रत बिलाल से पूछा ऐ बिलाल इस्लाम लाने के बाद अपना वह अमल बताओ जिससे तुम्हें सवाब की सबसे ज़्यादा उम्मीद हो क्योंकि कि मैंने जन्नत में अपने आगे तुम्हारे जूतों की आहट सुनी, हज़रत बिलाल ने कहा कि मुझे अपने आमाल मे सबसे ज़्यादा उम्मीद जिस अमल से है वह यह है कि मैंने रात या दिन में जब किसी वक़्त वज़ू किया तो उस वज़ू से इतनी नमाज़ (तहैयतूल वज़ू) ज़रूर पढ़ी है जितनी मुझे अल्लाह तआला की तरफ से उस वक़्त तौफीक़ मिली है। (बुखारी व मुस्लिम)

तहैयतुल मस्जिद
हज़रत अबू क़तादा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब कोई आदमी मस्जिद मे दाखिल हो तो बैठने से पहले दो रिकात नमाज़ अदा करे। (बुखारी व मुस्लिम)

(वज़ाहत) अगर कोइ शख्स ऐसे वक़्त मे मस्जिद मे दाखिल हुआ कि जिसमे हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ पढ़ने को सराहतन मना किया है (सूरज निकलने के वक़्त, ठीक दोपहर मे और सूरज डूबने के वक़्त) तो उसे चाहिए कि वह तहैयतुल मस्जिद न पढ़े।

सुनन नमाज़े जुमा
हज़रत सलमान फारसी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स जुमा के दिन गुस्ल करता है, जितना हो सके पाकी का एहतेमाम करता है और तेल लगाता है या अपने घर से खुशबू इस्तेमाल करता है फिर मस्जिद जाता है, मस्जिद पहुंचकर जो दो आदमी पहले से बैठे हों उनके दरमियान में नहीं बैठता और जितनी तौफीक़ हो जुमा से पहले नमाज़ पढ़ता है, फिर जब इमाम खुतबा देता है उसको तवज्जोह और खामोशी से सुनता है तो इस जुमा से गुजशता जुमा तक के गुनाहों को माफ कर दिया जाता हे। (बुखारी)

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिसने जुमा के दिन गुस्ल किया फिर मस्जिद में आया और जितनी नमाज़ उसके मुक़द्दर में थी अदा की, फिर खुतबा होने तक खामोश रहा और इमाम के साथ फ़र्ज़ नमाज़ अदा की उसके जुमा से जुमा तक और मज़ीद तीन ज़्यादा के गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। (मुस्लिम)

बुखारी व मुस्लिम में वारिद मज़कूरा बाला हदीस से मालूम हुआ कि जुमा की नमाज़ से पहले बाबरकत घड़ियों में जितनी ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़ पढ़ सकें पढ़ें। कम से कम खुतबा शुरू होने से पहले चार रिकातें तो पढ़ ही लें जैसा (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा जिल्द 2 पेज 131) में लिखा है कि हज़रत इब्राहिम (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं कि हजराते सहाबा-ए-किराम नमाज़े जुमा से पहले चार रिकातें पढ़ा करते थे।

नमाज़े जुमा के बाद दो रिकातें या छः रिकातें पढ़ें, यह तीनों अमल नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम से साबित हैं। बेहतर यह है कि छः रिकातें पढ़ लें, ताकि तमाम अहादीस पर अमल हो जाए और छः रिकातों का सवाब भी मिल जाए। हज़रत सालिम (रहमतुल्लाह अलैह) अपने वालिद से नक़ल करते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जुमा के बाद दो रिकातें पढ़ते थे। (मुस्लिम)

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब तुम से कोई जुमा पढ़ ले तो उसके बाद चार रिकातें पढ़ें। (मुस्लिम)

हज़रत अता फरमाते हैं कि उन्होंने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) को जुमा के बाद नमाज़ पढ़ते देखा कि जिस जानमाज़ पर आपने जुमा पढ़ा उससे थोड़ा सा हट जाते थे फिर दो रिकातें पढ़ते थे फिर चार रिकातें पढ़ते थे। मैंने हज़रत अता से पूछा कि आपने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) को कितनी बार ऐसा करते देखा? उन्होंने फरमाया बहुत बार। (अबू दाऊद)
इसीलिए अल्लामा इब्ने तैमिया फरमाते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जुमा के बाद चार रिकात पढ़नी चाहिए और सहाबा-ए-किराम से छः रिकात भी मंकूल हैं। (मुख्तसर फतावा इब्ने तैमिया पेज 79)

(वज़ाहत) नमाज़े वित्र के वुजूब और उसके एहतेमाम के मुतअल्लिक़ दलाइले शरईया की रौशनी में तफसील से एक मज़मून तहरीर किया है, उसका मुतालआ करें।

नोट- मज़मून में वारिद तमाम अहादीस के तफसीली हवालों के लिए मेरी किताब (हैया अलस्सलात) का मुतालआ करें जो मुख्तलिफ वेबसाइट पर फ्री डाउनलोड करने के लिए मौजूद है।
अल्लाह तआला हम सबको फराएज़ के साथ नवाफिल का भी एहतेमाम करने वाला बनए, आमीन।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)