बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम

अलहमदु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन,वस्सलातु वस्सलामु अला आलिहि व असहाबिहि अजमईन

सफ़रे हज की आप बीती और इन्तज़ामी उमूर का जायज़ा

इस साल शव्वाल की इब्तदाई तारीखों में ही हज की अदायगी का इरादा कर लिया था। साले गुज़श्ता से सऊदी अरब में मुक़ीम आज़मीने हज के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू कर दिया गया है। जिससे जहाँ आज़मीने हज को सहूलत हुई है, वहीं हुज्जाज-ए-किराम के लिए माली अख़राजात में कमी वाके हुई है और ग़ैर क़ानूनी तौर पर जाने वाले आज़मीने हज पर काफ़ी हद तक कन्ट्रोल भी हुआ है। सऊदी हुकूमत का यह क़दम क़ाबिले तहसीन है, अलबत्ता इसमें मज़ीद बेहतरी लाने की ज़रूरत है। सऊदी हुकूमत ने इस साल भी तक़रीबन पचास हज़ार लोकल हाजियों को रियायती क़ीमत पर हज कराने का फ़ैसला किया। रियायती क़ीमत पर रजिस्ट्रेशन के हुसूल के लिए एक ज़िल क़अदा को सुबह आठ बजे से बेशुमार हज़रात की तरह मैं भी ऑनलाइन कोशिश में लग गया, मगर साले गुज़श्ता की तरह इस साल भी हजारों अफ़राद के बयक वक़्त रजिस्ट्रेशन के हुसूल की कोशिश की वजह से वैबसाइट सही तरीक़े से काम नहीं कर रही थी। मुसल्सल कोशिश करने के बाद ही जुहर तक ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने में कामयाबी मिल सकी। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के अमल में मज़ीद सहूलत पैदा करने की अशद ज़रूरत है। रियायती क़ीमत का मतलब सिर्फ़ यह है कि हुकूमत अपनी फ़ीस कम लेती है, बाक़ी अख़राजात तक़रीबन बराबर ही होते हैं। रजिस्ट्रेशन के बाद चार हजार रियाल प्रति शख़्स (तक़रीबन सत्तर हजार रुपये) फ़ीस भी ऑनलाइन जमा कर दी गयी। दीगर मतलूबा दस्तावेज़ात भी ऑनलाइन इरसाल कर दिये गये। कुछ दिनों में हज की तसरीह (इजाज़त नामा) भी ऑनलाइन दस्तयाब हो गया।

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के वक़्त मक्का मुकर्रमा की हज कम्पनी “शरिकह मोहम्मद अब्दुल्लाह अलकुरशी”को इख़्तियार करने की वजह से रियाज़ से मक्का मुकर्रमा आने जाने का इन्तज़ाम हमें ख़ुद करना था, चुनांचे सापतको (सरकारी बस सर्विस) का 220 रियाल प्रति शख़्स आने जाने का टिकट ज़िल क़अदा के आख़िर में हज की तसरीह दिखाकर ख़रीद लिया था। 7 सितम्बर बरोज़ बुध को एयरकन्डीशन बस के ज़रिए मक्का मुकर्रमा के लिए रवाना हुए। रात नौ बजे ताइफ़ के क़रीब वाक़े मीक़ात (अस्सैलुल कबीर) पहुंच गयेजो रियाज़ से तक़रीबन 800 किलोमीटर के फ़ासले पर है। रियाज़ व दम्माम वग़ैरह से उमूमी तौर पर आज़मीने हज 6 या 7 ज़ुल हिज्जा को रवाना होते हैं, हम 5 ज़ुल हिज्जा की दोपहर को रवाना हो गये थे, इसलिए मीक़ात पर भीड़ नहीं थी। सहूलत के साथ गुस्ल किया, एहराम बांधकर मस्जिद में सुन्नत के मुताबिक दायाँ क़दम रखकर दुआ पढ़ते हुए दाख़िल हुए। पहले इशा की नमाज़ अदा की और फिर अपने नबी की इक़्तिदा में दो रकअत नफ़िल एहराम की नीयत से अदा की और हज की नीयत करके तलबिया पढ़ा। तलबिया पढ़ते ही यक़ीन हो गया कि हमारी रूह ने भी आज से तक़रीबन चार हज़ार साल क़ब्ल हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की निदा के जवाब में कई मर्तबा लब्बैक कहा था।

तक़रीबन दो घंटा हज का तराना (लब्बैक अलहुम लब्बैक) पढ़ते हुए मीक़ात (अस्सैलुल कबीर) से 100 किलोमीटर पर दुनिया के वस्त में वाक़े शहर मक्का मुकर्रमा पहुंच गये जहाँ की ज़ियारत हर मुसलमान की दिली ख़्वाहिश होती है और कितने ही मुसलमान अपनी इसी तमन्ना को दिल में लेकर दुनिया से चले जाते हैं। मस्जिदे हराम से 7 किलोमीटर के फ़ासले पर तन्ईमजहाँ मस्जिदे आयशा बनी हुई हैके क़रीब अपने क़रीबी रिश्तेदार के घर पर थोड़ा आराम करके तलबिया पढ़ते हुए मस्जिदे हराम की तरफ रवाना हुए।

सुन्नत के मुताबिक मस्जिदे हराम में दाख़िल होकर बैतुल्लाह पर पहली निगाह पड़ने पर दुआ की, क्योंकि इस मौक़े पर मांगी गई दुआ क़ुबूल होती है। यही वह हमारा क़िबला है जिसकी तरफ़ रुख करके दुनियाभर के मुसलमान अपने नबी की आंखों की ठंडक यानि नमाज़ की अदायगी करते हैं। हज की तीन क़िस्मों में से हज्जे बदल में हज्जे इफ़राद करना एहतियात पर मबनी है, अगरचे हज्जे क़िरान और हज्जे तमत्तो की भी गुंजाइश है। हिन्द व पाक से आने वाले आज़मीने हज अमूमन हज तमत्तो ही करते हैं, जिसमें पहले उमरे की अदायगी और फिर बाद में हज की अदायगी की जाती है, जबकि क़िरान में उमरा और हज का एक साथ एहराम बांधा जाता है। हज्जे इफ़राद में उमरा शामिल नहीं होता है। हमारा एहराम हज्जे इफ़राद का था, लिहाज़ा बैतुल्लाह का तवाफ़ (तवाफे क़ुदूम जो सुन्नत है) किया और ख़्वातीन साथ में होने की वजह़ से सहूलत पर अमल करते हुए हज की सई भी उसी वक़्त कर ली। सई की इब्तदा सफ़ा से होती है और आख़िरी सातवां चक्कर मरवा पर मुकम्मल होता है।

६ और 7 ज़ुल हिज्जा को मक्का मुकर्रमा के क़याम के दौरान शदीद गर्मी के बावजूद मस्जिदे हराम में नमाज़ें अदा करने की कोशिश की क्योंकि मस्जिदे हराम में एक नमाज़ एक लाख नमाज़ों के बराबर है जो पूरी ज़िन्दगी की नमाज़ों की तादाद से ज़्यादा है। मोहसिने इन्सानियत के तरीक़े के मुताबिक यौमुत्तर्विया (यानि 8 ज़ुल हिज्जा) की सुबह को मक्का मुकर्रमा से हज कम्पनी की बस के ज़रिए मिना पहुंच कर ख़ेमे में क़याम किया। रियाज़ वापसी तक सिर्फ़ 9 रोज़ प्रोग्राम होने की वजह से इस पूरे सफ़र में जु़हर, अस्र और इशा की 2 रकआत फ़र्ज़ अदा कीं। नमाज़ वित्र और फज्ऱ की सुन्नत के एहतमाम के साथ जब भी सहूलत हुई सुनन व नवाफ़िल के पढ़ने के साथ तिलावते क़ुरआन और ज़िक्रे इलाही का एहतमाम किया। वक़्तन फ़वक्तन हज का तराना थोड़ी आवाज़ के साथ पढ़ते रहे। सऊदी हुकूमत की तालीमात के मुताबिक हज कम्पनी की तरफ़ से मक़ामाते मुक़द्दसा में नाश्ता, दोपहर और शाम के खाने के अलावा चौबीस घंटे पानी, जूस और चाय वगै़रह का माक़ूल इन्तज़ाम था। हमारे साथ अक्सर हुज्जाज-ए-किराम अरब थे, वह अपनी आदत से मजबूर खाना बहुत जाया कर रहे थेजिस पर काफ़ी तकलीफ़ हुई। अल्लाह तआला हमें खाने की चीज़ो को ज़ाये करने से महफूज़ फ़रमाये। हाँ अरबो के साथ हज की अदायगी का एक फ़ायदा ज़रूर हुआ कि मसालेदार खाने नहीं मिले, इसलिए इस पूरे सफ़र में अलहम्दु लिल्लाह पेट का निज़ाम सही रहा।

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के वक़्त ही मक़ामाते मुकद्दसा में नक़ल मकानी के लिए 250 रियाल अदायगी पर ट्रेन की सहूलत हासिल कर ली थी। मक़ामाते मुकद्दसा में ट्रेन का सिलसिला 2010 ई॰ में 18 ट्रेनों के साथ शुरू हुआ था। पहला साल तजरबाती होने की वजह से ट्रेन के इलैक्ट्रिानिक निज़ाम को कम इस्तेमाल किया गया था। अलबत्ता 2011 ई॰ से ट्रेन के दरवाजे बंद करने के अलावा मुकम्मल तौर से इलैक्ट्रानिक निज़ाम का इस्तेमाल किया जा रहा है। ख़्वातीन और बूढ़े हुज्जाज-ए-किराम की रियायत में तमाम डिब्बों के गार्ड की जानिब से ग्रीन सिग्नल के बाद ही ड्राईवर ट्रेन के दरवाजे बंद करता है। यह ट्रेन बग़ैर ड्राईवर के भी चल सकती है। मजमूअी तौर पर 9 रेलवे स्टेशन बनाये गये हैं। तीन मिना में, तीन मुजदल्फ़ा में और तीन अरफ़ात में। अपने नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के मुताबिक 9 ज़ुल हिज्जा यौमुलअरफ़ा की सुबह नाश्ता वगैरह से फ़राग़त के बाद हज कम्पनी के मुशर्दीन के साथ ट्रेन के ज़रिए अरफ़ात के लिए रवाना हुए। ट्रेन का सफ़र तक़रीबन 10 मिनट का था लेकिन ट्रेन को हासिल करने और ट्रेन से उतरकर अरफ़ात के ख़ेमे तक पहुंचने में कई घंटे लग गये, जिसकी वजह़ से काफ़ी थकन भी हुई, लेकिन इस यक़ीन के साथ बर्दाश्त किया कि अल्लाह तआला इस पर अज्रे अज़ीम अता फ़रमायेगा। हुज्जाज-ए-किराम की मक़ामाते मुकद्दसा के दौरान नक़ल मकानी के लिए छः साल में जितनी बेहतरी होनी चाहिए थीनहीं हो सकी। यक़ीनन लाखों हुज्जाज-ए-किराम की नक़ल मकानी एक बड़ा प्रोजेक्ट है, लेकिन दुश्वारकुन मराहिल पर सलाहियतें लगाकर उनको आसान बनाना ही असल कामयाबी है। हज के दिनों के अलावा मक़ामाते मुकद्दसा के बिल्कुल ख़ाली होने की वजह से दिन रात काम करके हुज्जाज-ए-किराम की नक़ल मकानी को ज़्यादा बेहतर बनाया जा सकता है।

ख़ेमे में थोड़ा आराम करके तक़रीबन 2 किलोमीटर के फ़ासले पर वाके मस्जिदे नमरा की तरफ़ तलबिया पढ़ते हुए पैदल रवाना हुए। यही वह जगह है जहाँ सारी इन्सानियत के नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 10 हिजरी को ज़वाले आफ़ताब के बाद ख़ुतबा दिया थाजो ख़ुतबा हज्जतुल विदाअ के नाम से मशहूर है। यह ख़ुतबा क़यामत तक आने वाली नस्ले इन्सानी के लिए अज़ीम मनशूर व दस्तूर है। 8 हिजरी में मक्का मुकर्रमा फ़तह हुआ, 9 हिजरी में हज की फर्ज़ियत हुई मगर 9 हिजरी को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज की अदायगी नहीं कर सके, बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अबूबकर सिद्दीक रजि॰ को आज़मीने हज का अमीर बनाकर रवाना फ़रमाया और सुरतुत्तौबा आयत 28 के मुताबिक यह एलान कर दिया गया कि इस साल के बाद इस मुबारक जगह में कोई काफ़िर या मुशरिक नहीं रहेगा। आईन्दा साल यानि 10 हिजरी को मदीना मुनव्वरा से पहला और आख़िरी हज आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तक़रीबन एक लाख चैबीस हज़ार सहाबा-ए-किराम के साथ किया। और उसके सिर्फ़ तीन माह बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस दारेफ़ानी से दारेबक़ा की तरफ़ कूच कर गये। मस्जिद नमरा की दीवार के नीचे धूप की तपिश में छतरी लगाये बैठकर ख़ुतबा शुरू होने तक इन्तिज़ार किया। हुज्जाज-ए-किराम की अक्सरियत मस्जिद नमरा नहीं पहुंच पाती है, बल्कि ज़्यादातर हुज्जाज-ए-किराम अपने अपने ख़ेमों में ही नमाज़ अदा करते हैं। सऊदी हुकूमत की जानिब से लगाये गये फ़व्वारों से हलका हलका पानी जिस्म पर गिरने की वजह से गर्मी की शिद्दत से काफ़ी राहत मिल रही थी। पानी, जूस और लस्सी वगैरह ऐसी अक़ीदत के साथ मुस्लिम भाई तक़सीम कर रहे थे कि उनके खुलूस और मोहब्बत की वजह से हुज्जाज-ए-किराम खुशी खुशी ले रहे थे। मुख्तिलफ़ मुल्कों के रहने वाले, मुख़्तिलफ रंग वाले और मुख़्तिलफ़ ज़बान बोलने वाले शदीद गर्मी के बावजू़द सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म की तामील में अपनी ज़ाहिरी जे़ब व ज़ीनत छोड़कर थोड़ी बुलन्द आवाज़ के साथ तलबिया पढ़ रहे थे। इस मौक़े पर दिल से दुआ भी निकल रही थी कि अल्लाह तआला हाजियों की ख़िदमत करने वालों को अज्रे अज़ीम से नवाज़े। इस पूरे सफ़र में एक दूसरे के लिए हमदर्दी, उख़व्वत और जांनिसारी की जो मिसालें देखने को मिलीं, दुनिया के किसी कोने में बज़ाहिर नज़र नहीं आतीं।

ज़वाले आफ़ताब के फ़ौरन बाद मस्जिदे हराम के इमाम व ख़तीब डाक्टर अब्दुर्रहमान सुदैस ने तक़रीबन 40 मिनट का ख़ुतबा दिया जिसमें इस्लाम के महासिन और खूबियां बयान करके उम्मत मुस्लिमा के तमाम अफ़राद को क़ुरआन व हदीस पर अमल करने की दावत दी। शेख सुदैस के लिए यह पहला मौक़ा था कि उन्होंने हज का ख़ुतबा दिया, क्योंकि सऊदी अरब के मुफ़ती आज़म शेख अब्दुल अज़ीज अल शेख 35 साल से बराबर इस ज़िम्मेदारी को अन्ज़ाम दे रहे थे। ख़ुतबा सुनकर ज़ुहर व अस्र की नमाज़ें शेख अब्दुर्रहमान सुदैस की इमामत में पढ़ी। नमाज़ से फ़राग़त के बाद तलबिया पढ़ते हुए पैदल चलकर ख़ेमे में पहुंच गये। हज कम्पनी की जानिब से पेश किया गया दोपहर का खाना तनावुल किया और ग़ुरूबे आफ़ताब तक ख़ेमे में ही दुआओं में मशग़ूल रहे। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ जु़हर और अस्र से फ़राग़त के बाद जबलुर्रहमह के क़रीब वुकूफे अर्फ़ा किया था, लेकिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया था कि अर्फ़ा के मैदान में किसी भी जगह वुकूफ़ किया जा सकता है। यही वह अज़ीम रुक्न है जिसके मुताल्लिक सारे नबियों के सरदार हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि हज अरफ़ात ही है। इसी तरह फ़रमान रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है कि अर्फ़ा के दिन के अलावा कोई दिन ऐसा नहीं है जिसमें अल्लाह तआला कसरत से बंदों को जहन्नम से निजात देते हों, उस दिन अल्लाह तआला (अपने बन्दों के) बहुत ज़्यादा क़रीब होते हैं और फ़रिश्तों के सामने उन (हाजियों) की वजह से फ़ख्र करते हैं और फ़रिश्तों से पूछते हैं (ज़रा बताओ तो) यह लोग मुझसे क्या चाहते हैं। इस यक़ीन के साथ कि उससे ज़्यादा क़ीमती वक़्त ज़िन्दगी में कभी नहीं मिल सकता है, ग़ुरूब आफ़ताब तक अपने लिए, अपने बच्चों, घर वालों, दोस्त व अहबाब व मुताअल्लिक़ीन और उम्मत मुस्लिमा के लिए दुआओं का ख़ास एहतमाम किया।

ट्रेन सर्विस की इन्तज़ामिया की जानिब से हमारी हज कम्पनी के हाजियों के लिए अरफ़ात से मुजदल्फ़ा रवानगी का वक़्त रात 10 बजे दिया गया था। मगर ख़ेमे से अरफ़ात रेलवे स्टेशन और फिर ट्रेन हासिल करने में डेढ़ घंटा लग गया। लेकिन सिर्फ़ 8 मिनट में मुजदल्फ़ा रेलवे स्टेशन पहुंच गये। मुजदल्फ़ा में हमारी कम्पनी के हुज्जाज-ए-किराम के लिए खास जगह रेलवे स्टेशन के बिल्कुल क़रीब में वाके थी। 12 बजे मग़रिब और इशा की नमाज़ अदा की और खाना खाया। थोड़ी देर के लिए आराम किया और कंकरियां भी उठा लीं। हमारी हज कम्पनी की जानिब से एलान किया गया कि नमाज़े फज्र से क़ब्ल मिना के लिए रवाना होना है, हालांकि वुकूफ़े मुजदल्फ़ा हज के वाज़िबात में से है। ख़्वातीन, बूढ़े लोग और वह हज़रात जो ख़्वातीन या बूढ़े लोगों के साथ हैंके अलावा हुज्जाज-ए-किराम को नमाज़ फ़ज्र से पहले मुजदल्फ़ा से मिना जाने पर दम देना होगा, इस पर पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफ़ाक़ है, लिहाज़ा इन्तज़ामिया को ऐसे फ़ैसले करने से क़ब्ल उलमा-ए-किराम से रुजूअ करना चाहिए, ताकि हुज्जाज किराम को बिला वजह दम ना देना पड़े।

10 ज़ुल हिज्जा को सुबह को बेशुमार हाजियों के टेलीफोन के ज़रिए मालूम हुआ कि कुछ हज कंपनियों और मुअल्लिमों ने सुबह यानि अज़ाने फज्ऱ से कब़्ल ही कहकर रमी (कंकरियाँ मारना) करा दी कि उन्हें हुकूमत की जानिब से रमी के लिए यही वक़्त मिला है, हालांकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल की रोशनी में दुनिया के किसी भी मकतबे फ़िक्र या आलिमे दीन ने 10 ज़ुल हिज्जा को सुबह होने से क़ब्ल रमी की इज़ाजत नहीं दी है। इन्तज़ामिया की शरअी ज़िम्मेदारी है कि इस तरह के फ़ैसला से कब़्ल उलमा-ए-किराम से रुजूअ करे। 10 ज़ुल हिज्जा को सुबह होने से क़ब्ल रमी करने पर दोबारा सुबह होने के बाद कंकरियाँ मारनी होंगी वरना एक दम (यानि हुदूदे हरम में ज़िन्दगी में एक कु़रबानी करना) लाज़िम होगा।

10 ज़ुल हिज्जा को नमाज़ जुहर अपने ख़ेमे में पढ़ने के बाद मिना रेलवे स्टेशन 2 से मिना रेलवे स्टेशन 3 पर पहुंचे जहाँ से जमरात तक पहुंचने के लिए तक़रीबन एक किलोमीटर धूप में चलना पड़ा। इस मौके पर कुछ बूढ़े मर्द व औरतों को बेहाल देख कर क़लक़ भी हुआ, मगर इन्तज़ामिया की जानिब से फ़ौरी मदद करने पर इत्मिनान भी हुआ। गर्मी की शिद्दत से बचाओ के लिए इन्तज़ामिया के अफ़राद का हुज्जाज-ए-किराम पर पानी डालना और गत्ते से हवा करना यक़ीनन अल्लाह तआला के महमानों की अज़ीम ख़िदमत हैजिसका बदला सिर्फ़ अल्लाह की ज़ात ही दे सकती है, हम तो सिर्फ़ दुआ कर सकते हैं कि अल्लाह तआला उनको दोनो जहां में अज्र अता फ़रमा। मिना रेलवे स्टेशन 3 से जमरात के रास्ते पर गर्मी से बचाओ के लिए अगर टैंट लगा दिये जाये तो उससे अल्लाह के मेहमानों को बहुत सहूलत मिलेगीऔर अगर रास्ता के दोनों तरफ़ टैंट के नीचे जमरात के पुल की तरह पंखे भी लगा दिये जायें तो नुरुन अला नूर। आज के दिन पहले और दूसरे जमराह पर कंकरियाँ नहीं मारीं। सिर्फ़ आख़िरी जमराह पर सात दफ़ा में सात कंकरियाँ बिल्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कहकर मारीं और हज का तराना यानि लब्बैक पढ़ना बंद कर दिया। और इसके बाद ख़ेमा जाने के लिए मिना रेलवे स्टेशन 3 तक पहुंचने के लिए वही धूप वाला रास्ता इख़्तियार करना पड़ा, क्योंकि इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। क्या ही अच्छा होता कि इस रास्ते पर भी गर्मी से बचाओ के लिए टैंट लग जाते, ताकि हुज्जाज किराम को पचास फ़ीसद गर्मी से राहत मिल जाती। ट्रेन के ज़रिए अस्र तक अपने ख़ेमे में वापिस पहुंच गये। क़ुरबानी व हलक़ से फ़राग़त के बाद गु़स्ल किया और आम लिबास पहन लिया। अब हमारे लिए एहराम की तमाम पाबंदियाँ ख़त्म हो गयीं सिवाए मियाँ बीवी वाले ताल्लुक़ात केजिसकी पाबंदी हटने के लिए तवाफ़े ज़ियारत (हज का तवाफ़) करना शर्त है। तमाम नमाज़ों की वक़्त पर अदायगी, तिलावते क़ुरआन, ज़िक्रे इलाही और तकबीर तशरीक़ पढ़ने के साथ हुज्जाज किराम के सवालात का जवाब देने का सिलसिला बराबर जारी रहा। बड़ी खुश नसीबी और सआदत की बात है कि हज़ारों हुज्ज़ाज़े किराम ने हज के दिनों में टेलीफोन करके मसाइले हज मालूम किये। अल्लाह तआला तमाम हुज्जाजे किराम के हज को मक़बूल व मबरूर बनाये। क़ुरबानी, हल्क़ या क़स्र और तवाफ़े ज़ियारत 12 ज़ुल हिज्जा के ग़ुरूबे आफ़ताब तक दिन रात में किसी भी वक़्त किया जा सकता है।

11 ज़ुल हिज्जा को नमाज़ अस्र से फ़राग़त के बाद 10 जु़ल हिज्जा की तरह जमरात पर गये और तीनों जमरात पर सात सात कंकरियाँ मारीं। पहले और दूसरे जमरह पर कंकरियाँ मारने के बाद अपने नबी की इक़तदा में क़िबला रुख हाथ उठाकर खूब दुआएं भी कीं। आख़िरी जमराह पर कंकरियाँ मारकर मक्का मुकर्रमा जाने का इरादा किया। हुज्जाजे किराम को मिना से मक्का मुकर्रमा का कोई माक़ूल बंदोबस्त नहीं है। 2010 ई॰ में शुरू हुई ट्रेन सर्विस भी अभी तक मक्का मुकर्रमा (मस्जिदे हराम) नहीं पहुंच सकी है। हालांकि मक्का मैट्रो की तामीर के बाद उसे मिना रेलवे स्टेशन 3 से जोड़ना था, मगर कुछ वुजू़हात की वजह से मक्का मैट्रो के प्रोजेक्ट पर अभी तक अमल नहीं हो सका है। अगर ट्रेन सर्विस के ज़रिए मक़ामाते मुकद्दसा को मस्जिदे हराम से जोड़ दिया जाये तो यह हुज्जाज किराम पर एहसान अज़ीम होगा। यह यक़ीनन एक दुश्वारकुन मरहला है, लेकिन रहमान के मेहमानों की ख़िदमत के जज़्बे से उठे हुए क़दम पर अल्लाह तआला की ज़रूर मदद आयेगी, इंशाअल्लाह और मुश्किल से मुश्किल काम भी आसान हो जायेगा।

फिलहाल हाजियों के लिए मिना से मस्जिदे हराम जाने के लिए दो ही आपशन हैं, एक पैदल चलकर जायें जो 4 या 5 किलोमीटर होने की वजह से आसान नहीं है। दूसरा किराये की बस या टैक्सी से जाया जाये जिसके लिए कम अज़ कम 40 रियाल फ़ी शख़्स अदा करने होते हैं, बल्कि एक तिहाई रास्ता फिर भी पैदल चलना पड़ता है। हमने यह यक़ीन करके (कि मक्का मुकर्रमा से पैदल चलकर हज करने की ख़ास फ़जीलत अहादीस में वारिद हुई है, कुछ सहाबा-ए-किराम मक्का मुकर्रमा से पैदल हज करने का एहतमाम करते थे। इसलिए अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में पैदल चलकर हज करने वालों का ज़िक्र पहले और सवारी पर सवार होकर हज करने वालों का ज़िक्र बाद में किया है) मिना से मक्का मुकर्रमा पैदल जाने का इरादा कर लिया, मगर आधे रास्ते के बाद यक़ीन हो गया कि ख़्वातीन और बूढ़े लोगो के लिए पैदल चलकर मस्जिदे हराम जाना आसान नहीं है। मस्जिदे हराम पहुंच कर नमाज़े मग़रिब से फ़राग़त के बाद तवाफ़े ज़ियारत (हज का तवाफ़) किया। इस साल हाज़ियों की तादाद गुज़श्ता सालों के मुक़ाबले में काफ़ी कम थी। इस साल बैरून मुमालिक से 13 लाख जबकि सऊदी अरब से 5 लाख हाजियों ने फ़रीज़ए हज की अदायगी की। इस से क़ब्ल यह तादाद पच्चीस लाख से ज़्यादा हुआ करती थी। इसलिए बहुत सहूलत के साथ तवाफे ज़ियारत कर लिया वरना तवाफे ज़ियारत की अदायगी एक मुश्किल मरहला होता है। हज्जे इफ़राद में एक सई करनी होती है जो हम तवाफे क़ुदूम के साथ कर चुके थे, अलबत्ता तवाफ़े इफ़ाज़ा (हज का तवाफ़) करना थाजो वुकू़फ़ अर्फ़ा के बाद हज का सबसे अहम रुक्न है। उसूली तौर पर तवाफ़े विदाअ आख़िरी अमल होना चाहिए, लेकिन हमारे हमराह ख़्वातीन की तबियत काफ़ी नासाज़ हो रही थी, इसलिए रुख़सत पर अमल करते हुए तवाफे ज़ियारत के बाद तवाफ़े विदा भी कर लिया। तवाफ़ फर्ज़ हो या वाज़िब, सुन्नत हो नफ़िल, उसका एक ही तरीक़ा है कि बैतुल्लाह के सात चक्कर लगाये जायें, हर चक्कर की इब्तिदा हज्रे असवद के इस्तलाम से और आख़िर में मुक़ाम इब्राहिम के पीछे वरना मस्जिदे हराम में किसी भी जगह दो रकअत अदा कर ली जायें।

तवाफ़ से फ़राग़त के बाद टैक्सी के ज़रिए मिना के लिए रवाना हुए, लेकिन टैक्सी को मिना में ना जाने देने की वजह से तक़रीबन डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर रात 11 बजे ख़ेमे में पहुंचे। हुज्जाज-ए-किराम का अय्यामे तशरीक़ की रात का अक्सर हिस्सा मिना में गुज़ारना सुन्नत है, लेकिन अगर कोई कोताही हो जाये तो उस पर कोई दम लाज़िम नहीं होता। ख़ेमे पहुंच कर थोड़ा खाना खाया मगर थकान इतनी ज़्यादा हो गयी थी कि पूरा जिस्म दर्द कर रहा था, जिसकी वजह से नींद भी नहीं आ रही थी। नमाज़े तहज्जुद, नमाज़े फज्र और नमाज़े इश्राक़ से फ़राग़त के बाद आराम किया।

12 ज़ुल हिज्जा को नमाजे जुहर की अदायगी के बाद ट्रेन के ज़रिए जमरात गये और 11 ज़ुल हिज्जा की तरह तीनों जमरात पर कंकरियां मारीं। इस तरह मजमूअी तौर पर 49 कंकरियां मारींजो हर हाजी के लिए ज़रूरी हैं। जम्हूर उलमा की राय के मुताबिक 11 और 12 ज़ुल हिज्जा को ज़वाल आफ़ताब के बाद ही कंकरियां मारी जा सकती हैं। 13 जु़ल हिज्जा की कंकरियां मारना इख़्तियारी हैं, यानि अगर आप 12 ज़ुल हिज्जा को रमी के बाद मक्का मुकर्रमा चले गये तो फिर 13 ज़ुल हिज्जा की कंकरियां मारना ज़रूरी नहीं हैं, लेकिन अगर 13 ज़ुल हिज्जा की कंकरियां मारकर ही मिना से रवानगी का इरादा है तो फिर 12 ज़ुल हिज्जा के बाद आने वाली रात को मिना में क़याम करके 13 ज़ुल हिज्जा को ज़वाले आफ़ताब के बाद रमी करें।

रमी से फ़राग़त के बाद ट्रेन के ज़रिए वापस अपने ख़ेमे में आये। दोपहर के खाने और नमाज़े अस्र से फ़राग़त के बाद तक़रीबन एक किलोमीटर पैदल चलकर मस्जिद आयशा के क़रीब अपने रिश्तेदार के घर के लिए दो सौ रियाल में टैक्सी की, वहाँ मग़रिब और इशा के दरमियान आराम करके एयरकन्डीशन बस के ज़रिए 12 घंटे में रियाज़ वापसी हुई। वापसी पर बस यही दुआ ज़बान पर थी कि अल्लाह तआला हमारे हज को हज्जे मबरूर बनाये, जिसका बदला सिर्फ़ और सिर्फ़ जन्नत है। और हमारे छोटे बड़े तमाम गुनाहों को इस तरह माफ़ कर दे जैसे कोई बच्चा अपनी माँ के पेट से पैदा होने के रोज़ पाक व साफ़ था, जैसा कि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिस शख़्स ने महज अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए हज किया और उस दौरान कोई बेहूदा बात या गुनाह नहीं किया तो वह (पाक होकर) ऐसा लौटता है जैसा माँ के पेट से पैदा होने के रोज़ (पाक था)। नीज़ यह दुआ भी करते रहे कि अल्लाह तआला इस पाक सर ज़मीन में बार-बार आने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये। हुज्जाज-ए-किराम से दरख़्वास्त है कि वतन वापसी के बाद हुकू़कुल्लाह और हुक़ूक़ुल इबाद में कोताही से अपने आप को बचायें। अहकामे इलाही को नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़े के मुताबिक बजा लाकर गुनाहों से अपने आपको महफूज़ रखें और अल्लाह तआला से मग़फ़िरत मांगते रहें।

मोहम्मद नजीब क़ासमी सम्भली