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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

उमरह की अदाएगी का तरीका

उमरह का हुकुम
साहबे इस्तिताअत के लिए ज़िन्दगी में एक मरतबा उमरह अदा करना सुन्नत है और एक से ज़्यादा करना मुस्तहब है अगरचे बाज़ उलमा के नज़दीक साहबे इस्तिाअत के लिए ज़िन्दगी में एक मरतबा उमरह की अदाएगी वाजिब है।

उमरह की फ़ज़ीलत
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया एक उमरह दूसरे उमरे तक उन गुनाहों का कफ्फरा है जो दोनों उमरों के दरमियान सरज़द हों और हज्जे मबरूर का बदला तो जन्नत है। (बुखारी व मुस्लिम)
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया पै दर पै हज व उमरे किया करो, बेशक यह दोनों (हज व उमरह) गरीबी और गुनाहों को इस तरह दूर कर देते हैं जिस तरह भटठी लोहे और सोने व चांदी के मैल कुचैल को दूर कर देती है। (तिर्मीज़ी, इब्ने माजा)
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया हज व उमरह करने वाले अल्लाह तआला के मेहमान हैं अगर वह अल्लाह तआला से दुआ करें तो वह क़बूल फरमाए, अगर वह इससे मगफिरत तलब करें तो वह उनकी मगफिरत फरमाए। (इब्ने माजा)
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया रमज़ान में उमरे का सवाब हज के बराबर है। (बुखारी व मुस्लिम) दूसरी रिवायत में है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया रमज़ान में उमरह करना मेरे साथ हज करने के बराबर है। (मुस्लिम)

सफर का शुरू करना
घर से रवानगी के वक़्त दो रिकात नफल अदा करें और अल्लाह तआला से सफर की आसानी के लिए उमरह के क़बूल होने की दुआएं करें। अपनी ज़रूरीयात के सामान के साथ अपना पासपोर्ट या इक़ामा, टिकट और खर्च के लिए रकम भी साथ ले लें। मर्द हज़रात हस्बे ज़रूरत एहराम की चादरें भी ले लें।

सफर में नमाज़ को क़स्र (कम) करना
अगर आप का यह सफर 48 मील यानी तकरीबन 77 किलो मीटर से ज़्यादा का है तो आप अपने शहर की हुदूद से बाहर निकलते ही शरई मुसाफिर हो जाएंगे। लिहाज़ा ज़ुहर, असर और इशा की चार रिकात के बजाए दो रिकात फ़र्ज़ अदा करें और फजर की दो और मगरिब की तीन ही रिकात अदा करें। अलबत्ता किसी मुक़ीम इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ें तो इमाम के साथ पूरी नमाज़ें अदा करें। हाँ अगर इमाम भी मुसाफिर हो तो चार के बजाए दो ही रिकात पढ़ें। सुन्नतों और नफल का हुकुम यह है कि अगर इतमिनान का वक़्त है तो पूरी पढ़ें और अगर जल्दी है या थकन है या कोई और दुशवारी है तो न पढ़ें, कोई गुनाह नहीं अलबत्ता वितर और फजर की दो रिकात सुन्नतों को न छोड़ें ।

उमरह के अरकान
उमरह में चार अरकान होते हैं।
1) मीक़ात से एहराम बांधना।
2) मस्जिदे हराम पहुंच कर बैतुल्लाह का तवाफ करना।
3) सफा मरवा की सई करना।
4) सर के बाल मुंडवाना

मीक़ात
मीक़ात असल में वक़्त मुअैय्यन और मकाने मुअैय्यन का नाम है।

मीक़ाते जमानी
पूरे साल रात, दिन में जब चाहें और जिस वक़्त चाहें उमरह का एहराम बांध सकते हैं लेकिन उम्मुल मोमेनीन हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की हदीस के पेशे नजर हज़रत इमाम अबु हनीफा (रहमतुल्लाह अलैह) ने पांच दिन (9 जिलहिज्जा से 13 जिलहिज्जा तक) उमरह की अदाएगी को मकरूह तहरीमी करार दिया है खाह हज अदा कर रहा हो या नहीं। हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की यह हदीस बैहकी में मजकूर है।

मीक़ाते मकानी
वह मक़ामात जहाँ से हज या उमरह करने वाले हज़रात एहराम बांधते हैं मीक़ात कहलाता है। मीक़ात के एतेबार से पूरी दुनिया की सरज़मीन को शरीअते इस्लामिया ने तीन हिस्सों में तक़सीम किया है।

हरम
मक्का और उसके चारों तरफ कुछ दूर तक की ज़मीन हरम कहलाती है, इस मुक़द्दस सरज़मीन में गैर मुस्लिमों का आना हराम है। नीज़ हर शख्स के लिए चंद चीज़ें करना हराम हैं चाहे वहाँ का रहने वाला हो या हज व उमरह करने के लिए आया हो। इसी लिए इसको हरम कहा जाता है।
1) यहाँ के खुद उगे हुए दरख्त या पौधे काटना।
2) यहाँ के किसी जानवर का शिकार करना या उसको छेड़ना।
3) गिरी पड़ी चीज (लुक्ता) का उठाना।
हुदूदे हरम के अंदर मुस्तकिल या आरज़ी तौर पर रहने वाले यानी अहले हरम को उमरह का एहराम बांधने के लिए हरम से बाहर हिल में जाना होगा। हिल में सब से करीब जगह तनयीम है जहाँ मस्जिदे आइशा बनी हुई हैजो मस्जिदे हराम से साढ़े सात किलो मीटर के फासले पर है।

हिल
मीक़ात और हरम के दरमियान की सरज़मीन हिल कहलाती है जिसमें वह चीज़ें हलाल हैं जो हरम में हराम थीं। अहले हिल जिनकी रिहाइश मीक़ात और हुदूदे हरम के दरमियान है मसलन जद्दा के रहने वाले, उमरह का एहराम अपने घर से बांधेगें।

अफाक़
हरम और हिल के बाहर पूरी दुनिया की सरज़मीन अफाक़ कहलाती है, आफाक़ी हज़रात जब भी उमरह की नियत से मक्का जाना चाहें तो उनके लिए जरूरी है कि नीचे लिखे हुए पांच मीक़ातों में से किसी एक मीक़ात पर या उससे पहले या उसके मुक़ाबिल एहराम बांधें।
1) अहले मदीना और उसके रास्ते से आने वालों के लिए ज़ुलहुलैफा मीक़ात है जिसको आज कल बिरे अली कहा जाता है। मदीना के क़रीब ही यह मीक़ात वाके है। मक्का से तकरीबन 420 किलो मीटर दूर है।
2) अहले शाम और उसके रास्ते से आने वालों के लिए (मिस्र, लिबिया, अलजज़ाएर, मराक़श वगैरह) जुहफा मीक़ात है। यह मक्का से तकरीबन 186 किलो मीटर दूर है।
3) अहले नजद और उसके रास्ते से आने वालों के लिए (बहरैन, क़तर, दम्माम, रियाज़ वगैरह) करनुल मनाजिल मीक़ात है। इसको आज कल (अस्सैलुल कबीर) कहा जाता है। यह मक्का से तकरीबन 78 किलोमीटर दूर है।
4) अहले यमन और उसके रास्ते से आने वालों के लिए (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश वगैरह) यलमलम मीक़ात है। इसको आज कल (सादिया) कहा जाता है। मक्का से इसकी दूरी 120 किलो मीटर है।
5) अहले इराक़ और उसके रास्ते से आने वालों के लिए ज़ातुल इर्क़ मीक़ात है। यह मक्का से 100 किलो मीटर मशरिक़ में है।

एहराम
एहराम बांधने से पहले तहारत और पाकीज़गी का खास ख्याल रखें, नाखून काट लें और ज़ेरे नाफ व बगल के बाल साफ कर लें और एक सफेद चादर ओढ़ लें, तहबन्द नाफ के ऊपर इस तरह बांधें कि टखने खुले रहें और उन्हीं दो कपड़ों में दो रिकात नमाज़ नफल अदा करें और उमरह करने की नियत करें। ऐ अल्लाह! मैं आपकी रिज़ा के वास्ते उमरह की नियत करता हूँ इसको मेरे लिए आसान फरमा और अपने फज़्ल व करम से क़बूल फरमा। उसके बाद किसी क़दर बुलंद आवाज़ से तीन मरतबा तलबिया पढ़ें। (लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक अखिर तक) ‘‘मैं हाज़िर हुं, ऐ अल्लाह मैं हाज़िर हूं, मैं हाज़िर हूं, तेरा कोई शरीक नहीं, मैं हाज़िर हूं, बेशक तमाम तारीफें और सब नेमतें तेरी ही हैं, मुल्क और बादशाहत तेरी ही है, तेरा कोई शरीक नहीं।
एहराम बांध कर जो तलबिया पढ़ते हैं वह गोया हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की पुकार के जवाब में अर्ज़ करते हैं कि ऐ हमारे मौला! तुने अपने दोस्त हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से इलान कराके हमें अपने पाक घर बुलवाया था, हम तेरे दर पर हाज़िर हैं, हाज़िर हैं, ऐ अल्लाह! हम हाज़िर है। तलबिया पढ़ने के साथ ही आप का एहराम बंध गया, अब से ले कर मस्जिदे हराम पहुंचने तक यही तलबिया सबसे बेहतर ज़िक्र है। लिहाज़ा लिहाज़ा थोड़ी बुलंद आवाज़ के साथ बार बार तलबिया पढ़ते रहें।

एहराम से मुतअल्लिक बाज़ अहम मसाइल
गुस्ल से फारिग हो कर एहराम बांधने से पहले बदन पर खुशबू लगाना भी सुन्नत है।
चूंकि एहराम की पाबन्दियां तलबिया पढ़ने के बाद ही शुरू होती हैं, लिहाज़ा तलबिया पढ़ने से पहले गुस्ल के दौरान सबुन और तौलिया का इस्तेमाल कर सकते हैं नीज़ बालों में कंधी भी कर सकते हैं।
औरतों के एहराम के लिए कोई खास लिबास नहीं, बस गुस्ल वगैरह से फारिग हो कर आम लिबास पहन लें और चेहरा से कपड़ा हटा लें फिर नियत करके आहिस्ता से तलबिया पढ़ें। औरतें तलबिया हमेशा अहिस्ता आवाज़ से पढ़ें।
औरतें बालों की हिफाजत के लिए अगर सर पर रूमाल बांध लें तो कोई हर्ज नहीं लेकिन पेशानी के ऊपर सर पर बांधें और इसको एहराम को हिस्सा न समझें नीज़ वज़ू के वक़्त खास तौर पर यह सफेद रूमाल सर से खोल कर सर पर ज़रूर मसह करें।
अगर कोई औरत ऐसे वक़्त में मक्का पहुंची कि उसको माहवारी आ रही है तो वह पाक होने तक इंतिजार करे, पाक होने के बाद ही उमरह करने के लिए मस्जिद हराम जाए, उमरह की आदएगी तक उसको एहराम की हालत में रहना होगा।
आज कल चंद घंटों में आदमी मीक़ात पहुंच जाता है और मीक़ात पर काफी भीड़ भी रहती है लिहाज़ा घर से रवानगी से पहले ही हर तरह की पाकी हासिल कर लें। मीक़ात पर पहुंच कर अगर मौका मिल जाए तो गुस्ल कर लें वरना सिर्फ वज़ू करके एहराम पहन लें।
अगर आप पहले मदीना जा रहे हैं तो मदीना जाने के लिए किसी एहराम की ज़रूरत नहीं है, लेकिन जब आप मदीना से मक्का जाएं तो फिर मदीना की मीक़ात पर एहराम बांधें।
एहराम की हालत में अगर इहतिलाम हो जाए तो उससे एहराम में कोई फर्क नहीं पड़ता, कपड़ा और जिस्म धोकर गुस्ल कर लें और अगर एहराम की चादर बदलने की ज़रूरत हो तो दूसरी चादर इस्तेमाल कर लें लेकिन मीया बीवी वाले खास तअल्लुकात से बिल्कुल दूर रहें।

एक अहम हिदायत
मीक़ात पर पहुंच कर या उससे पहले पहले एहराम बांधना जरूरी है। लेकिन अगर आप हवाई जहाज़ से जा रहे हैं और आपको जद्दा में उतरना है, जद्दा चूंकि हिल में है यानी मीक़ात पहले रह जाती है लिहाज़ा आप हावई जहाज़ पर सवार होने से पहले ही एहराम बांध लें या हवाई जहाज़ में अपने साथ एहराम ले कर बैठ जाएं और फिर रास्ता में मीक़ात से पहले पहले बांध लें और अगर मौका हो तो दो रिकात भी अदा कर लें। फिर नियत करके तलबिया पढ़ें। एहराम बांधने के बाद नियत करने और तलबिया पढ़ने में ताखीर की जा सकती है यानी आप एहराम हवाई जहाज़ पर सवार होने से पहले बांध लें और तलबिया मीक़ात के आने पर या उससे कुछ पहले पढ़ें। याद रखें कि नियत करके तलबिया पढ़ने के बाद ही एहराम की पाबन्दियां शुरू होती हैं।

तम्बीह
अगर आफाक़ी यानी मीक़ात से बाहर रहने वाला बेगैर एहराम के मीक़ात से निकल गया तो आगे जा कर किसी भी जगह एहराम बांध ले लेकिन उस पर एक दम लाज़िम हो गया। हाँ अगर पहले ज़िक्र की गई पांचों मीक़ातों में से किसी एक पर या उसके मुक़ाबिल पहुंच कर एहराम बांध लिया तो फिर दम वाजिब न होगा। मसलन रियाज का रहने वाला बेगैर एहराम के जद्दा पहुंच गया तो जद्दा या मक्का से एहराम बांधने पर एक दम देना होगा लेकिन अगर उसने पांच मीक़ातों में से किसी एक मीक़ात मसलन अस्सैलुल कबीर, अत्ताइफ पर पहुंच कर एहराम बांध लिया तो फिर दम वाजिब नहीं होगा।

ममनूआते एहराम
एहराम बांध कर तलबिया पढ़ने के बाद यह चीज़ें हराम हो जाती हैं।

ममनूआते एहराम मर्द और औरतों के लिए
1) खुशबू का इस्तेमाल करना
2) नाखुन काटना
3) जिस्म से बाल दूर करना
4) चेहरे का ढांकना
5) मीया बीवी वाले खास तअल्लुकात और जिन्सी शहवत के काम करना
6) खुशकी के जानवर का शिकार करना

ममनूआते एहराम सिर्फ मर्द के लिए
1) सिले हुए कपड़े पहनना
2) सर को टोपी या पगड़ी या चादर वगैरह से ढांकना
3) ऐसा जूता पहनना जिससे पांव के दरमियान की हडडी छुप जाए

मकरूहाते एहराम
1) बदन से मैल दूर करना
2) साबुन का इस्तेमाल करना
3) कंधा करना

एहराम की हालत में जाएज़ काम
1) गुस्ल करना लेकिन खुशबूदार साबुन का इस्तेमाल न करना
2) एहराम को धोना और उसको बदलना
3) अंगूठी, घड़ी, चश्मा, बेल्ट, छतरी वगैरह का इस्तेमाल करना
4) एहराम के ऊपर चादर पर चादर डाल कर सोना मगर मर्द अपने सर और चेहरे को और औरतें अपने चेहरे को खुला रखें

मस्जिदे हराम की हाज़िरी
मक्का पहुंच कर सामान वगैरह अपने क़यामगाह पर रख कर अगर आराम की ज़रूरत हो तो थोड़ा आराम कर लें वरना वज़ू या गुस्ल करके उमरह करने के लिए मस्जिदे हराम की तरफ इंतिहाई सुकून और इतमिनान के साथ तलबिया पढ़ते हुए चलें। दरबारे इलाही की अज़मत व जलाल का लिहाज रखते हुए दायां कदम अंदर रख कर मस्जिद में दाखिल होने की दुआ पढ़ते हुए मस्जिदे हराम में दाखिल हो जाएं।

काबा पर पहली नजर
जिस वक़्त खाना काबा पर पहली नजर पड़े तो अल्लाह की बड़ाई बयान कर के जो चाहें अपनी ज़बान में अल्लाह तआला से मांगे क्योंकि यह दुआओं के क़बूल होने का खास वक़्त है।

तवाफ
मस्जिदे हराम में दाखिल हो कर काबा शरीफ के उस गोशा के सामने आ जाएं जिसमें हजरे असवद लगा हुआ है और तवाफ की नियत कर लें। उमरह की सई भी करनी है इसलिए मर्द हज़रात इज़तिबा कर लें (यानी एहराम की चादर को दाएं बगल के नीचे से निकाल कर बाएं मूंढे के ऊपर डाल लें) फिर हजरे असवद के सामने खड़े हो कर बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कहते हुए हजरे असवद का बोसा लें या दोनों हाथों की हथेलियों को हजरे असवद की तरफ करके हाथों का बोसा लें और फिर काबा को बाएं तरफ रख कर तवाफ शुरू कर दें। मर्द हज़रात पहले तीन चक्कर में (अगर मुमकिन हो) रमल करें यानी जरा मूंढे हिला के और अकड़ के छोटे छोटे कदम के साथ किसी कदर तेज़ चलें। तवाफ करते वक़्त निगाह सामने रखें यानी काबा शरीफ आप के बाएं जानिब रहें। तवाफ के दौरान बेगैर हाथ उठाए चलते चलते दुआएं करते रहें या अल्लाह का ज़िक्र करते रहें। आगे एक छोटे दायरे की शकल की चार या पांच फीट ऊंची दीवार आपके बाएं जानिब आएगी उसको हतीम कहते हैं। (हतीम दर असल बैतुल्लाह का ही हिस्सा है, इसमें नमाज़ पढ़ना ऐसा ही है जैसा बैतुल्लाह के अंदर नमाज़ पढ़ना, अगर तवाफ के बाद मौका मिल जाए तो वहां ज़रूर नफल अदा करें)। उसके बाद जब खाना काबा का तीसरा कोना आ जाए जिसे रूकने यमानी कहते हैं (अगर मुमकिन हो) तो दोनों हाथ या सिर्फ दाहिना हाथ उस पर फेरे वरना उसकी तरफ इशारा किए बेगैर यूं ही गुज़र जाएं। रूकने यमानी और हजरे असवद के दरमियान चलते हुए यह दुआ बार बार पढ़ें‘‘रब्बाना अतिना आखिर तक‘‘ फिर हजरे असवद के सामने पहुंच कर उसकी तरफ हथेलियों का रूख करें और बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कहें और हथेलियों का बोसा लें। इस तरह आपका एक चक्कर पूरा हो गया, इसके बाद बाकी छः चक्कर बिल्कुल इसी तरह करें। कुल सात चक्कर करने हैं, आखिरी चक्कर के बाद भी हजरे असवद का इस्तिलाम करें और सफा पर चले जाएं।

तवाफ से मुतअल्लिक बाज़ अहम मसाइल
तलबिया जो एहराम बांधने के बाद से बराबर पढ़ रहे थे मस्जिदे हराम में दाखिल होने के बाद बन्द कर दें।
मताफ में अगर ज़्यादा भीड़ हो या थकन हो रही हो तो तवाफ को बन्द कर सकते हैं लेकिन ममनूआते एहराम से बचते रहें।
तवाफ के दौरान कोई मखसूस दुआ जरूरी नहीं है बल्कि जो चाहें और जिस ज़बान में चाहें दुआ मांगते रहें अगर कुछ भी न भी पढ़े बल्कि खामुश रहें तब भी तवाफ सही हो जाता है।
तवाफ के दौरान जमाअत की नमाज़ शुरू होने लगे या थकन हो जाए तो तवाज रोक दें, फिर जिस जगह तवाफ बन्द किया था उसी जगह से तवाफ शुरू कर दें।
नफली तवाफ में रमल (जरा अकड़ कर चलना) और इज़तिबा नहीं होता है।
नमाज़ की हालत में बाजुओं को ढांकना चाहिए क्योंकि इज़तिबा सिर्फ तवाफ की हालत में सुन्नत है।
अगर तवाफ के दौरान वज़ू टूट जाए तो तवाफ रोक दें और वज़ू करके उसी जगह से तवाफ शुरू कर दें जहाँ से तवाफ बन्द किया था क्योंकि बेगैर वज़ू के तवाफ करना जाएज़ नहीं है।
तवाफ नफली हो या फ़र्ज़ इसमें सात ही चक्कर होते हैं नीज़ उसकी इब्तिदा हजरे असवद के इस्तिलाम से ही होती है और उसके बाद दो रिकात नमाज़ पढ़ी जाती है।
अगर तवाफ के चक्करों की तादाद में शक हो जाए तो कम तादाद शुमार करके बाकी चक्करों से तवाफ पूरा करें।
मस्जिदे हराम के अंदर, ऊपर या नीचे या मताफ में किसी भी जगह तवाफ कर सकते हैं।
तवाफ हतीम के बाहर से ही करें। अगर हतीम में दाखिल हो कर तवाफ करेंगे तो वह मोतबर नहीं होगा।
अगर किसी औरत को तवाफ के दौरान माहवारी शुरू हो जाये तो फौरन तवाफ बन्द कर दे और मस्जिद से बाहर चली जाए।
औरतें तवाफ में रमल (अकड़ कर चलना) न करें, सिर्फ यह मर्द के लिए खास है।
भीड़ होने के सूरत में औरतें हजरे असवद का बोसा लेने की कोशिश न करें, बस दूर से इशारा करने पर इकतिफा करें। इसी तरह भीड़ होने की सूरत में रूकने यमानी को भी न छुऐं।
अगर हजरे असवद के सामने से इशारा किए बेगैर गुजर गुज़र जाऐं और भीड़ ज़्यादा है तो हजरे असवद के इस्तिलाम के लिए दोबारा वापस आने की कोशिश न करें क्योंकि तवाफ के दौरान हजरे असवद का बोसा लेना या उसकी तरफ इशारा करना सुन्नत है वाजिब नहीं है।

अहम मसअला
बीमार शख्स जिसका वज़ू नहीं ठहरता (मसलन पेशाब के कतरात मुसलसल गिरते रहते हैं या मुसलसल रीह निकलती रहती है या औरत को बीमारी का खून आ रहा है) तो उसके लिए हुकुम यह है कि वह नमाज़ के एक वक़्त में वज़ू करे फिर उस वज़ू से उस वक़्त में जितने चाहे तवाफ करे, नमाज़ पढ़े और क़ुरान की तिलावत करे, दूसरे नमाज़ का वक़्त दाखिल होते ही वज़ू टूट जाएगा। अगर तवाफ पूरा होने से पहले ही दूसरी नमाज़ का वक़्त दाखिल हो जाए तो वज़ू करके तवाफ को पूरा करे।
दो रिकात नमाज़
तवाफ से फरागत के बाद मक़ामे इब्राहिम के पास आएं। उस वक़्त आपकी ज़बान पर यह आयत हो तो बेहतर है ‘‘मक़ामे इब्राहिम को नमाज़ पढ़ने की जगह बनाओ‘‘ अगर सहूलत से मक़ामे इब्राहिम के पीछे जगह मिल जाए तो वहाँ वरना मस्जिदे हराम में किसी भी जगह तवाफ की दो रिकात अदा करें। तवाफ की इन दो रिकात के मुतअल्लिक नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत यह है कि पहली रिकात में सूरह काफेरून और दूसरी रिकात में सूरह इखलास पढ़ी जाए। भीड़ के दौरान मक़ामे इब्राहिम के पास तवाफ की दो रिकात नमाज़ पढ़ने की कोशिश न करें क्योंकि इससे तवाफ करने वालों को तकलिफ होती है बल्कि मस्जिदे हराम में किसी भी जगह अदा कर लें।

मक़ामे इब्राहिम
यह एक पत्थर है जिसपर खड़े हो कर हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने काबा को तामीर किया था, इस पत्थर पर हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के कदमो के निशानात है। यह काबा के सामने एक जालीदार शीशे के छोटे से कुबा में महफूज है जिसके अतराफ पीतल की खुशनुमा जाली नसब है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया हजरे असवद और मक़ामे इब्राहिम कीमती पत्थरों में से दो पत्थर है। अल्लाह तआला ने दोनों पत्थरों की रौशनी खत्म कर दी अगर अल्लाह तआला ऐसा न करता यह दोनों पत्थर मशरिक और मगरिब के दरमियान हर चीज़ को रौशन कर देते। (इब्ने ख़ुज़ैमा)

मुलतज़िम
तवाफ और नमाज़ से फरागत के बाद अगर मौक़ा मिल जाए तो मुलतज़िम पर आएं। हजरे असवद और काबा के दरवाजे के दरमियान दो मीटर के करीब काबा की दीवार का जो हिस्सा है वह मुलतज़िम कहलाता है। और इससे चिमट कर खुब दुआएं मांगें। यह दुआओं के क़बूल होने की खास जगह है। हुज्जाजे किराम को तकलीफ दे कर मुलतज़िम पर पहुंचना जाएज़ नहीं लिहाज़ा तवाफ करने वालों की तादाद अगर ज़्यादा हो तो वहां पहुंचने की कोशिश न करें क्योंकि वहां दुआएं करना सिर्फ सुन्नत है।

आबे ज़मज़म
तवाफ से फरागत के बाद क़िबला की तरफ मुतवज्जह हो कर बिस्मिल्लाह पढ़ कर तीन सांस में खूब सैर हो कर ज़मज़म का पानी पियें और अलहमदु लिल्लाह कह कर यह दुआ पढ़ें अगर याद हो तो ‘‘अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका इल्मन नाफिअन आखिर तक‘‘ (ऐ अल्लह! मैं आपसे नफा देने वाले इल्म का और कुशादा रिज़्क़ का और हर मर्ज से शिफायाबी का सवाल करता हूँ)। मस्जिदे हराम में हर जगह ज़मज़म का पानी बआसानी मिल जाता है। ज़मज़म का पानी खड़े हो कर पीना मुस्तहब है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ज़मज़म पीलाया तो आप सल्लल्लाहुअलैहि वसल्लम ने खड़े हो कर पीया। (बुखारी) ज़मज़म का पानी पीकर उसका कुछ हिस्सा सर और बदन पर डालना भी मुस्तहब है। हज़रत जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुए सुना ज़मज़म का पानी जिस नियत से पीया जाए वही फायदा उससे हासिल होता है। (इब्ने माजा) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत करते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया रूऐ ज़मीन पर सबसे बेहतर पानी ज़मज़म है जो भूके के लिए खाना और बीमार के लिए शिफा हे। (तबरानी)

सफा मरवा के दरमियान सई
सफा पर पहुंच कर बेहतर यह है कि ज़बान से कहें ‘‘अबदओ बिमा बदअल्लाहु आखिर तक‘‘ फिर खाना काबा की तरफ रूख करके दुआ की तरह हाथ उठा लें और तीन मरतबा अल्लाहु अकबर कहें और अगर यह दुआ याद हो तो उसे भी तीन बार पढ़े ‘‘ला इलाहा इल्लाहु वहदहु आखिर तक‘‘ उसके बाद खड़े हो खूब दुआएं मांगे। यह दुआओं के क़बूल होने का खास मक़ाम और खास वक़्त है। दुआओं से फारिग हो कर नीचे उतर कर मरवा की तरफ आम चाल से चलें। दुआऐं मांगते रहें या अल्लाह का ज़िक्र करते रहें। सई के दौरान भी कोई खास दुआ लाज़िम नहीं अलबत्ता इस दुआ को भी पढ़ते रहें ‘‘रब्बिग फिर वरहम आखिर तक‘‘ जब सब्ज़ सुतून (जहां हरी टूयब लाइट लगी हुई हैं) के क़रीब पहुंचें तो मर्द हज़रात जरा तेज़ रफतार से चलें उसके बाद फिर ऐसे ही हरा सुतून और नजर आएगा वहां पहुंचकर तेज़ चलना बंद कर दें और आम चाल से चलें। मरवा पर पहुंच कर क़िबला की तरफ रूख करके हाथ उठा कर दुआएं मांगें, यह सई का एक फेरा हो गया। इसी तरह मरवा से सफा की तरफ चलें। यह दूसरा चक्कर हो जाएगा। इस तरह आखरी व सातवां चक्कर मरवा पर खत्म होगा। हर मरतबा सफा और मरवा पर पहुंच कर खाना काबा की तरफ रूख करके दुआएं करनी चाहिए।

सई से मुतअल्लिक बाज़ अहम मसाइल
सई के लिए वज़ू का होना जरूरी नहीं अलबत्ता अफज़ल व बेहतर है।
हैज़ (माहवारी) की हालत में भी सई की जा सकती है अलबत्ता तवाफ, हैज़ की हालत में हरगिज़ न करें बल्कि मस्जिदे हराम में भी न दाखिल हों। यानी अगर औरत को तवाफ के बाद माहवारी आ जाए तो नापाकी की हालत में सई कर सकती है।
तवाफ से फारिग हो कर अगर सई करने में ताखीर हो जाए तो कोई हर्ज नहीं।
सई को तवाफ के बाद करना शर्त है, तवाफ के बेगैर सई मोतबर नहीं होगी।
सफा व मरवा पर पहुंच कर बैतुल्लाह की तरफ हाथ से इशारा न करें बल्कि दुआ की तरह दोनों हाथ उठा कर दुआएं करें।
सई के दौरान नमाज़ शुरू होने लगे या थक जाएं तो सई रोक दें फिर जहाँ से सई को बन्द किया थी उसी जगह से शुरू कर दें।
तवाफ की तरह सई भी पैदल चल कर करना चाहिए, अलबत्ता अगर कोई उज्र हो तो कुर्सी पर भी सई कर सकते हैं।
अगर सई के चक्करों की तादाद में शक हो जाए तो कम तादाद शुमार करके बाकी चक्करों से सई पूरा करें।
औरतें सई में सब्ज़ सतूनों के दरमियान मर्द की तरह दौड़ कर न चलें।
अगर चाहें तो सई के बाद भी दो रिकात नमाज़ अदा कर लें क्योंकि बाज़ रिवायात में इस का ज़िक्र मिलता है।
नफली सई का कोई सबूत नहीं है, अलबत्ता नफली तवाफ ज़्यादा से ज़्यादा करने चाहिए।

बाल मुंडवाना या कटवाना
तवाफ और सई से फारिग हो कर सर के बाल मुंडवा दें या कटवा दें। मर्द के लिए मुंडवाना अफज़ल है क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बाल मुंडवाने वालों के लिए रहमत व मगफिरत की दुआ तीन बार फरमाई और बाल कटवाने वालों के लिए सिर्फ एक बार। नीज़ अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में हलक़ कराने वालों का ज़िक्र पहले और बाल कटवाने वालों का ज़िक्र बाद में किया है। लेकिन औरतें चोटी के आखिर में से एक पोरे के बराबर बाल खुद काट लें या किसी महरम से कटवा लें।

तम्बीह
बाज़ मर्द हज़रात चंद बाल सर के एक तरफ से और चंद बाल दूसरी तरफ से कैंची से काट कर एहराम खोल देते हैं यह सही नहीं है। ऐसी सूरत में जमहूर उलमा के नज़दीक दम वाजिब हो जाएगा लिहाज़ा या तो सर के बाल मुंडवाएं या इस तरह बालों को कटवाएं कि पूरे सर के बाल कट जाएं। अगर बाल ज़्यादा ही छोटे हों तो मुंडवाना ही लाज़िम है। सर के बाल मुंडवाने या कटवाने से पहले न एहराम खोलें और न ही नाखुन वगैरह काटें वरना दम लाज़िम हो जाएगा।
बाल का हुदूदे हरम में कटवाना जरूरी है लिहाज़ा जद्दा में बाल मुंडवाने की सूरत में दम वाजिब होगा।
जब बाल कटावाने का वक़्त हो जाए यानी तवाफ व सई से फरागत हो गई तो एक दूसरे के बाल काट सकते हैं।

उमरह पूरा हो गया
अब आपका उमरह पूरा हो गया। एहराम उतार दें, सिले हुए कपड़े पहन लें, खूशबू लगा लें। अब आपके लिए वह सब चीज़ें जाएज़ हो गईं जो एहराम की वजह से नाजाएज़ हो गई थीं।
एक से जायद उमरे करना
उमरह की अदाएगी के बाद अपनी तरफ से या अपने रिशतेदार की तरफ से नफली उमरे करना चाहें तो हिल में किसी जगह मसलन तनयीम जा कर गुस्ल करके एहराम बांधें, दो रिकात नमाज़ पढ़ कर नियत करें और तलबिया पढ़ें फिर उमरह का जो तरीका बयान किया गया है उसके मुताबिक उमरह करें। किसी मैय्यत या इंतिहाई बूढ़े या ऐसे बीमार शख्स जिसकी सेहत की बजाहिर पुर उम्मीद नहीं है, की जानिब से बिलाशुबहा उमरह बदल किया जा सकता है। लेकिन सेहतमंद जिन्दा शख्स की जानिब से उमरह बदल की अदाएगी में फुक़हा का इख्तलिाफ है अलबत्ता इहतियात सेहतमंद शख्स की तरफ से उमरह बदल न करने में है।

तवाफे विदा
वापसी के वक़्त तवाफे विदा करना चाहें तो कर लें लेकिन सिर्फ उमरह के सफर में तवाफे विदा जरूरी नहीं है।

उमरह से मुतअल्लिक बाज़ अहम मसाइल
औरत बेगैर महरम या शौहर के उमरह का सफर या कोई दूसरा सफर नहीं कर सकती अगर कोई औरत बेगैर महरम या शौहर के उमरह करे तो उसका उमरह तो अदा हो जाएगा लेकिन ऐसा करने में बड़ा गुनाह है।
औरतें मर्द की तरफ से और मर्द औरतों की तरफ से नफली उमरे बदल अदा कर सकते हैं।
एहराम की हालत में एहराम के कपड़े उतार कर गुस्ल भी कर सकते हैं और एहराम तबदील भी कर सकते हैं।
अगर कोई शख्स हज के महीने (शौव्वाल या ज़िलकादा या ज़िलहिज्जा के पहले अशरा) में उमरह करके अपने घर वापस चला गया और हज के दिनों में सिर्फ हज का एहराम बांध कर हज अदा करे तो यह हज्जे तमत्तो नहीं होगा क्योंकि जमहूर उलमा के नज़दीक हज्जे तमत्तो के लिए शर्त है कि वह उमरह करके अपने घर वापस न जाए।
बाज़ लोगों ने मशहूर कर रखा है कि अगर किसी औरत ने उमरह किया तो उस पर हज फ़र्ज़ हो गया, यह गलत है। अगर वह साहबे इस्तिताअत नहीं है यानी अगर उसके पास इतना माल नहीं है कि वह हज अदा कर सके तो उस पर उमरह की अदाएगी की वजह से हज फ़र्ज़ नहीं होता अगरचे वह उमरह हज के महीनों में ही अदा किया जाए फिर भी उसकी वजह से हज फ़र्ज़ नहीं होगा।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)