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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

हज से मुतअल्लिक औरतों के खुसूसी मसाइल

मर्द हज़रात की तरह हज की अदाएगी औरतें भी करती हैं मगर उनकी चंद फितरी आदात की बिना पर कुछ मसाइल में मर्द हज़रात से फर्क मौजूद है, जिसकी वजह से उनके बाज़ मसाइल मर्द हज़रात से मुख्तलिफ हैं, जिनका जानना हज की अदाएगी करने वाली हर औरत के लिए ज़रूरी है। हज से मुतअल्लिक औरतों के चंद खुसूसी मसाइल नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात की रौशनी में हस्बे ज़ैल हैं।
1) औरत अगर मालदार यानी साहिबे इस्तिआत है तो उस पर हज फ़र्ज़ है वरना नहीं।
2) औरत बेगैर महरम या शौहर के हज का सफर या कोई दूसरा सफर नहीं कर सकती अगर कोई औरत बेगैर महरम या शौहर के हज कर ले तो उसका हज अदा हो जाएगा लेकिन बेगैर महरम या शौहर के हज का सफर कोई दूसरा सफर करना बड़ा गुनाह है। महरम वह शख्स है जिसके साथ उसका निकाह हराम हो जैसे बाप, बेटा, भाई, हक़ीक़ी मामू और चाचा वगैरह। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा रिवायत करते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया हरगिज़ कोई मर्द किसी (नामहरम) औरत के साथ तनहाई में न रहे और हरगिज़ कोई औरत सफर न करे मगर यह कि उसके साथ महरम हो। यह सुन कर एक शख्स ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह मेरा नाम फलां जिहाद में शरीक होने के लिए आया है और मेरी बीवी हज करने के लिए निकली है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जाओ अपनी बीवी के साथ हज करो। (बुखारी व मुस्लिम)
3) औरतों के लिए भी एहराम से पहले हर तरह की पाकीज़गी हासिल करना और गूसल करना मसनून है, खाह नापाकी की ही हालत में हों।
4) औरतों के एहराम के लिए कोई खास लिबास नहीं है, बस आम लिबास पहन कर दो रिकात नमाज़ पढ़ लें और नियत करके अहिस्ता से तलबिया पढ़ लें।
5) एहराम बांधने के वक़्त माहवारी आ रही हो तो एहराम बांधने का तरीका यह है कि गूसल करें या सिर्फ वजू करें, अलबत्ता गूसल करना अफज़ल है, नमाज़ न पढ़े बल्कि चेहरे से कपड़ा हटा कर नियत कर लें और तीन बार अहिस्ता से तलबिया पढ़ें।
6) औरतें एहराम में आम सिले हुए कपड़े पहने, उनके एहराम के लिए कोई खास रंग का कपड़ा ज़रूरी नहीं है, बस ज्यादा चमकीले कपड़े न पहने नीज़ कपड़ों को तबदील भी कर सकती हैं।
7) औरतें इस पूरे सफर के दौरान परदा का इहतिमाम करें। यह जो मशहूर है कि हज व उमरह में परदा नहीं है गलत है। हुकुम सिर्फ यह है कि औरत एहराम की हालत में चेहरा पर कपड़ा न लगने दे। इससे यह कैसे लाज़िम आया कि वह नामहरमों के सामने चेहरा खोले। हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) बयान फरमाती है कि हम हालते एहराम में हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थे, गुज़रने वाले जब अपनी सावारियों पर गुज़रते थे तो हम अपनी चादर को अपने सर से आगे बढ़ा कर चेहरा पर लटका लेते थे, जब वह आगे बढ़ जाते तो चेहरा खोल देते थे। (मिशकात) गरज़ ये कि एहराम की हालत में औरतें अपने चेहरा को खुला रखें, अगर मर्द हज़रात सामने आ जाऐं तो चेहरा पर निकाब डाल लें। अगर कुछ वक़्त के लिए चेहरा पर निकाब पड़ी रह जाए या कुछ वक़्त के लिए मर्द के सामने चेहरा खुल जाए तो कोई दम वगैरह लाज़िम नहीं और इंशाअल्लाह हज पूरा अदा होगा।
8) औरतों का सर पर सफेद रूमाल बांधने को एहराम समझना गलत है, सिर्फ बालों को टूटने से महफूज़ रखने के लिए सर पर रूमाल बांध लें तो कोई हर्ज नहीं लेकिन पेशानी के ऊपर सर पर बांधें और इसको एहराम का हिस्सा न समझें, नीज़ वजू के वक़्त मसह करना फ़र्ज़ है लिहाजा वजू के वक़्त खास तौर पर इस सफेद रूमाल को खोल कर सर पर मसह जरूर करें।
9) अगर कोई औरत ऐसे वक़्त में मक्का पहुंची कि उसको माहवारी आ रही है तो वह पाक होने तक इंतिजार करे, पाक होने के बाद ही मस्जिदे हराम में जाए, अगर 8 ज़िलहिज्जा तक भी पाक न हो सकी तो एहराम ही की हालत में तवाफ किए बेगैर मिना जा कर हज के सारे आमाल करे।
10) अगर किसी औरत ने हज्जे किरान या हज्जे तमत्तो का एहराम बांधा मगर शरई उज्र की वजह से 8 ज़िलहिज्जा तक उमरह न कर सकी और 8 ज़िलहिज्जा को ही एहराम ही की हालत में मिना जा कर हाजियों की तरह सारे आमाल अदा कर लिए तो हज सही हो जाएगा लेकिन दम और उमरह की कजा वाजिब होने या न होने में उलमा की राय मुख्तलिफ हैं।
11) माहवारी की हालत में सिर्फ तवाफ करने की इजाजत नहीं है बाकी सारे आमाल अदा किए जाएंगे जैसा कि हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि हम लोग (हज्जतुल विदा वाले सफर में) रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मदीना से चले, हमारी ज़बानों पर बस हज ही का ज़िक्र था यहाँ तक कि जब (मक्का के बिल्कुल करीब) मक़ामे सरफ पर पहुंचे (जहाँ मक्का सिर्फ एक मंजिल रह जाता है) तो मेरे वह दिन शुरू हो गए जो औरतों के हर महीने आते हैं। रसूलुल्लाहु सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (खेमा में) तशरीफ लाए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने देखा कि मैं बैठी रो रही हूँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया शायद तुम्हारे माहवारी के दिन शुरू हो गए हैं। मैंने अर्ज़ किया हाँ, यही बात है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया रोने की किया बात है) यह तो ऐसी चीज है जो अल्लाह तआला ने आदम की बेटियों (यानी सब औरतों) के साथ लाज़िम कर दी है तुम वह सारे आमाल करती रहो जो हाजियों को करने हैं सिवाए इसके कि खाना काबा का तवाफ उस वक़्त तक न करो जब तक कि इससे पाक व साफ न हो जाओ। (सही बुखारी व मुस्लिम)
12) माहवारी की हालत में नमाज़ पढ़ना, मसिजद में दाखिल होना और तवाफ करना बिल्कुल नाजाएज़ है अलबत्ता सफा व मरवा की सई करना जाएज़ है। यानी अगर किसी औरत को तवाफ करने के बाद माहवारी आ जाए तो वह सई कर सकती है मगर उसको चाहिए कि सई के बाद मस्जिदे हराम के अंदर दाखिल न हो बल्कि मरवा से बाहर निकल जाए।
13) औरतें माहवारी की हालत में ज़िक्र व अज़कार जारी रख सकती है बल्कि उनके लिए मुस्तहब है कि वह अपने आप को अल्लाह के ज़िक्र में मशगुल रखें, नीज़ दुआऐं भी करती रहें, अलबत्ता माहवारी की हालत में क़ुरान करीम की तिलावत नहीं कर सकती हैं।
14) अगर किसी औरत को तवाफ के दौरान हैज़ आ जाए तो फौरन तवाफ बन्द कर दे और मस्जिद से बाहर चली जाए।
15) औरतें तवाफ में रमल (अकड़ कर चलना) न करें, यह सिर्फ मर्द के लिए है।
16) भीड होने की सूरत में औरतें हजरे असवद का बोसा लेने की कोशिश न करें, बस दूर से इशारा करने पर इकतिफा करें। इसी तरह भीड़ होने की सूरत में रूकने यमानी को भी न छूऐं। सही बुखारी (किताबुल हज) की हदीस में है कि हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहुअन्हा) लोगों से बच बच कर तवाफ कर रही थीं कि एक औरत ने कहा कि चलये उम्मुल मोमेनीन बोसा ले लें तो हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने इंकार फरमा दिया। एक दूसरी हदीस मैं है कि एक औरत हज़रत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के साथ तवाफ कर रही थीं, हजरे असवद के पास पहुंच कर कहने लगीं अम्मा आईशा! क्या आप बोसा नहीं लेंगी? आप ने फरमाया औरतों के लिए कोई ज़रूरी नहीं, चलो आगे बढ़ो। (अखबारि मक्का लिलफाकेही)
17) मक़ामे इब्राहिम में मर्द हज़रात का भीड़ हो तो औरतें वहाँ तवाफ की दो रिकात नमाज़ पढ़ने की कोशिश न करें बल्कि मस्जिदे हराम में किसी भी जगह पढ़ लें।
18) औरतें सई में सब्ज़ सतून (जहाँ हरी टूयब लाईटें लगी हुई हैं) के दरमयान मर्द हज़रात की तरह दौड़ कर न चलें।
19) तवाफ और सई के दौरान मर्द हज़रात से जहाँ तक मुमकिन हो दूर रहें और मस्जिदे हराम में नमाज़ पढ़नी हो तो अपने मखसूस हिस्सा में ही अदा करें, मर्द हज़रात के साथ सफों में खड़ी न हों।
20) हज के दिनों बहुत ज्यादा भीड़ हो जाती है, औरतें ऐसे वक़्त में तवाफ करें कि जमाअत खड़ी होने से काफी पहले ही तवाफ से फारिग हो जाएं।
21) औरतें भी अपने माँ बाप और रिशतेदार की तरफ से नफली उमरे कर सकती हैं।
22) तलबिया हमेशा अहिस्ता आवाज से पढ़ें।
23) मिना, अरफात और मुज़दलफा के क़याम के दौरान हर नमाज़ को अपनी क़यामगाह ही में पढ़ें।
24) हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि अरफात का पूरा मैदान वकूफ की जगह है इस लिए अपने ही खेमों में रहें और खड़े हो कर क़िबला रुख हो कर खूब दुआऐं मांगे। थकने पर बैठ कर भी अपने आपको दुआओं और ज़िक्र व तिलावत में मशगूल रखें। दुनियावी बातें हरगिज न करें।
25) मुज़दलफा पहुंच कर मगरिब और ईशा दोनों नमाजें ईशा ही के वक़्त अदा करें।
26) औरतों के लिए इजाज़त है कि मुज़दलफा के मैदान से आधी रात के बाद मिना में अपने खेमा में चली जाऐं।
27) भीड़ के अवकात में कंकड़ियां मारने हरगिज़ न जाएं, औरतें रात में भी बेगैर कराहियत के कंकड़ियां मार सकती हैं।
28) मामूली, मामूली उज्र की वजह से दूसरों से रमी (कंकड़ियां मारना) न कराएं बल्कि भीड़ कम होने के बाद खुद कंकड़ियां मारें। बिला शरई उज्र के दूसरे से रमी कराने पर दम लाज़िम होगा। महज़ भीड़ के खौफ से औरत कंकड़ियां मारने के लिए दूसरे को नाइब नहीं बना सकती है।
29) तवाफे ज़ियारत हैज़ के दिनों हरगिज़ न करें वरना एक बुदना यानी पूरा ऊंट या पूरी गाए (हुदूदे हरम के अंदर) ज़बह करना वाजिब होगा।
30) माहवारी की हालत में अगर तवाफे ज़ियारत किया मगर फिर पाक हो कर दोबारा कर लिया तो बुदना यानी पूरे ऊंट या पूरी गाए की कुर्बानी वाजिब नहीं।
31) तवाफे ज़ियारत (हज का तवाफ) का वक़्त 10 ज़िलहिज्जा से 12 ज़िलहिज्जा के गोरूबे आफताब तक है। बाज़ उलमा ने 13 ज़िलहिज्जा तक वक़्त तहरीर किया है। इन दिनों में अगर किसी औरत को माहवारी आती रही तो वह तवाफे ज़ियारत न करे बल्कि पाक होने के बाद ही करे, इस ताखीर की वजह से कोई दम वाजिब नही। अलबत्ता तवाफे ज़ियारत किए बेगैर कोई औरत अपने वतन वापस नहीं जा सकती है अगर वापस चली गई तो उम्र भर यह फ़र्ज़ लाज़िम रहेगा और शौहर के साथ सुहबत करना और बोस व किनार हराम रहेगा यहाँ तक कि दोबारह हाज़िर हो कर तवाफे ज़ियारत करे। लिहाज़ा तवाफे ज़ियारत किए बेगैर कोई औरत घर वापस न जाए। अगर तवाफे ज़ियारत से पहले किसी औरत को माहवारी आ जाए और उसके तैय शुदा प्रोग्राम के मुताबिक उसकी गुंजाइश न हो कि वह पाक हो कर तवाफे ज़ियारत कर सके तो उसके लिए ज़रूरी है कि वह हर तरह की कोशिश करे कि उसके सफर की तारीख आगे बढ़ सके ताकि वह पाक हो कर तवाफे ज़ियारत (हज का तवाफ) अदा करने के बाद अपने घर वापस जा सके (अमूमन मुअल्लिम हज़रात ऐसे मौका पर तारीख बढ़ा देते हैं) लेकिन अगर ऐसी सारी ही कोशिशें नाकाम हो जाऐं और पाक होने से पहले इस का सफर ज़रूरी हो जाए तो ऐसी सूरत में नापाकी की हालत में वह तवाफे ज़ियारत कर सकती है। यह तवाफे ज़ियारत शरअन मोतबर होगा और वह पूरे तौर पर हलाल हो जाएगी लेकिन उसपर एक बुदना (यानी पूरा ऊंट या पूरी गाए) की कुर्बानी बतौर हुदूदे हरम में लाज़िम होगी, यह दम उसी वक़्त देना ज़रूरी नहीं बल्कि ज़िन्दगी में जब चाहे दे दे।
32) तवाफे ज़ियारत और हज की सई करने तक शौहर के साथ खास जिनसी तअल्लुकात से बिल्कुल दूर रहें।
33) अगर कोई औरत अपनी आदत या आसार व अलामत से जानती है कि जल्द ही हैज़ शुरू होने वाला है और हैज़ आने में इतना वक़्त है कि वह मक्का जा कर तवाफे ज़ियारत (तवाफे ज़ियारत के वक़्त में) कर सकती है तो फौरन कर ले, ताखीर न करे, और अगर इतना वक़्त भी नहीं कि तवाफ कर सके तो फिर पाक होने तक इंतिजार करे। तवाफे ज़ियारत, रमी (कंकड़ियां मारना), कुर्बानी और बाल कटवाने से पहले या बाद में किसी भी वक़्त किया जा सकता है।
34) मक्का से रवानगी के वक़्त अगर किसी औरत को माहवारी आने लगे तो तवाफे विदा उसपर वाजिब नहीं। तवाफे विदा किए बेगैर वह अपने वतन जा सकती है।
35) जो मसाइल माहवारी के बयान किए गए हैं वही बच्चा की पैदाइश के बाद आने वाले खून के हैं, यानी उस हालत में भी औरतें तवाफ नहीं कर सकती हैं, अलबत्ता तवाफ के अलावा सारे आमाल हाजियों की तरह अदा करें।
36) अगर किसी औरत को बीमारी का खून आ रहा है तो नमाज़ भी अदा करेगी और तवाफ भी कर सकती है। इसकी सूरत यह है कि एक नमाज़ के वक़्त में वजू करे और फिर उस वजू से उस नमाज़ के वक़्त जितने चाहें तवाफ करे और जितनी चाहे नमाजें पढ़ें। दूसरी नमाज़ का वक़्त दाखिल होने पर दोबारा वजू करे। अगर तवाफ पूरा होने से पहले ही दूसरी नमाज़ का वक़्त दाखिल हो जाए तो वजू करके तवाफ को पूरा करे।
37) बाज़ औरतों को हज या उमरह का एहराम बांधने के वक़्त या उनको अदा करने के दौरान माहवारी आ जाती है जिसकी वजह से हज या उमरह अदा करने मे रूकावट पैदा हो जाती है और बाज़ मरतबा क़याम की मुद्दत खत्म होने या मुख्तसर होने की वजह से सख्त दुशवारी लाहिक हो जाती है, इस लिए जिन औरतों को हज या उमरह अदा करने के दौरान माहवारी आने का डर हो और वह सिर्फ चंद दिनों के टूर पर हज की अदाएगी के लिए जा रही है जैसा कि सउदी अरब में रहने वाले हज़रात चंद दिनों के लिए जाते हैं तो उन के लिए यह मशविरा है कि वह किसी लेडी डाक्टर से अपनी सेहत के मुताबिक आरज़ी तौर पर माहवारी रोकने वाली दवा तजवीज़ करा लें और इस्तेमाल करें ताकि हज व उमरह के अरकान अदा करने में कोई उलझन पेश न आए। शरई लिहाज से ऐसी दवाऐं इस्तेमाल करने की गुंजाइश है।
38) हरमैन में तकरीबन हर नमाज़ के बाद जनाज़ह की नमाज़ होती है, औरतें भी इसमें शरीक हो सकती हैं।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)