بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

तवाफ और सई के अहकाम व मसाइल

तवाफ की फज़ीलत
1) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अल्लाह तआला की एक सौ बीस रहमतें रोज़ाना उस घर (बैतुल्लाह) पर नाज़िल होती हैं जिनमें से साठ तवाफ करने वालों पर, चालीस वहाँ नमाज़ पढ़ने वालों पर और बीस खाना काबा को देखने वालों पर नाज़िल होती हैं। (तबरानी)
2) हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि मैंने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुए सुना जिसने काबा का तवाफ किया और दो रिकात नमाज़ अदा की गोया उसने एक गुलाम आज़ाद किया। (इबने माजा)
3) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया हजरे असवद को अल्लाह तआला क़यामत के दिन ऐसी हालत में उठाएंगे कि उसके दो आंखें होंगी जिनसे देखेगा और ज़बान होगी जिनसे वह बोलेगा और गवाही देगा उस शख्स के हक में जिसने उसका हक के साथ बोसा लिया हो। (तिर्मीज़ी व इबने माजा)
4) हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि मैंने हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना इन दोनों पत्थरों (हजरे असवद और रूकने यमानी) को छूना गुनाहों को मिटाता है। (तिर्मीज़ी)
5) हज़रत अबु हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया रूकने यमानी पर सत्तर फरिशते मौजूद हैं जो शख्स वहाँ जाकर यह दुआ पढ़े (अल्लाहुम्मा इन्नी असअलूकल अफवा आखिर तक) तो वह सब फरिशते आमीन कहते हैं। (इबने माजा)

तवाफ- बैतुल्लाह के गिर्द सात चक्कर और दो रिकात नमाज़ पढ़ने का नाम तवाफ है और हर चक्कर हजरे असवद के इस्तिलाम (छूना) से शुरू हो कर उसी पर खत्म होता है। हजरे असवद का बोसा लेना या उसकी तरफ दोनों या दाहिने हाथ से इशारा करना इस्तिलाम कहलाता है। तवाफ फ़र्ज़ हो या वाजिब या नफल इसमें सात ही चक्कर होते हैं और उसके बाद दो रिकात नमाज़ अदा की जाती है। अगर बैतुल्लाह के करीब से तवाफ किया जाए तो सात चक्कर में तकरीबन 30 मिनट लगते हैं लेकिन दूर से करने पर तकरीबन एक से दो घंटे लग जाते हैं। 10 जिलहिज्जा को तवाफे ज़ियारत करने में कभी कभी इससे भी ज्यादा वक्त लग जाता है।

तवाफ की किसमें
1) तवाफ कुदूम "यानी आने के वक्त का तवाफ" यह उस शख्स के लिए सुन्नत है जो मीक़ात के बाहर से आया हो और हज्जे इफराद या हज्जे क़िरान का इरादा रखता हो, हज्जे तमत्तो करने वालों के लिए सुन्नत नहीं।
2) तवाफे उमरह "यानी उमरह का तवाफ।"
3) तवाफे ज़ियारत "यानी हज का तवाफ" जिसको तवाफे इफाज़ा भी कहते है, यह हज का रुकन् है, इस तवाफ के बेगैर हज पूरा नहीं होता।
4) तवाफे विदा "यानी मक्का से रवानगी के वक्त का तवाफ" (यह मीक़ात से बाहर रहने वाले आफाक़ी के लिए ज़रूरी है)।

हज में ज़रूरी तवाफ की तादाद
हज्जे तमत्तो में तीन अदद "तवाफे उमरह, तवाफे ज़ियारत और आफाक़ी के लिए तवाफे विदा।"
हज्जे क़िरान में तीन अदद "तवाफे उमरह, तवाफे ज़ियारत और आफाक़ी के लिए तवाफे विदा।"
हज्जे इफराद में दो अदद "तवाफे ज़ियारत और आफाक़ी के लिए तवाफे विदा"

आफाक़ी- पांच मीकातों से बाहर रहने वालों को आफाक़ी कहा जाता है यानी अहले हरम और अहले हिल के अलावा पूरी दुनिया के लोग आफाक़ी हैं। अगर किसी औरत को रवानगी के वक्त माहवारी आ जाए तो उसके लिए तवाफे विदा माफ है।

नफली तवाफ
नफली तवाफ की कोई तादाद नहीं, रात या दिन में जब चाहें और जितने चाहें करें। बाहर से आने वाले हज़रात मस्जिदे हराम में नफली नमाज़ पढ़ने के बजाए नफली तवाफ ज्यादा करें। अहले हरम और अहले हिल को हज्जे इफराद ही करना चाहिए ताकि आफाक़ी लोग ज्यादा से ज्यादा नफली तवाफ कर सकें। याद रखें कि हर नफली तवाफ के बाद भी दो रिकात नमाज़ अदा करना जरूरी है।
(वजाहत)
दो तवाफ एक साथ करना मकरूह है कि तवाफ की दो रिकात दरमयान में अदा न करें, लिहाजा उस वक्त नमाज़ पढ़ना मकरूह हो तो दो तवाफों का इकटठा करना जाएज़ है। सउदी अरब में असर की नमाज़ अव्वल वक्त में अदा की जाती है और असर और मगरिब के दरमयान अच्छा खासा वाक्त खास कर गर्मियों में तकरीबन तीन घंटे होते हैं, अगर तवाफ से असर की नमाज़ के बाद फरागत हुई और मगरिब तक काफी वक्त बाकी है तो तवाफ की दो रिकात उस वक्त अदा कर सकते हैं, अलबत्ता अगर मगरिब का वक्त करीब आ गया है तो फिर आफताब डूबने के बाद ही अदा करें।

(अहम मसअला)
माज़ूर (जिसको बीमारी हो) शख्स जिसका वज़ू नहीं ठहरता (मसलन कोई जख्म जारी है या पेशाब के कतरात मुसलसल गिरते रहते हैं या औरत को बीमारी का खून आ रहा है) तो उसके लिए हुकुम यह है कि वह नमाज़ के एक वक्त में वज़ू करे फिर उस वज़ू से उस वक्त में जितने चाहे तवाफ करे, नमाजें पढ़े और क़ुरान की तिलावत करे, दूसरी नमाज़ का वक्त दाखिल होते ही वज़ू टूट जाएगा। अगर तवाफ पूरा होने से पहले ही दूसरी नमाज़ का वक्त दाखिल हो जाए तो वज़ू करके तवाफ पूरा करे।

तवाफ के दौरान जाएज़ काम
1) सलाम करना और बवक्ते जरूरत बात करना।
2) जरूरत के वक्त तवाफ को रोकना।
3) मसाइले शरईया बताना और दरयाफ्त करना।
4) किसी बीमारी की वजह से वहील कुर्सी पर तवाफ करना।

तवाफ करने का तरीका
मस्जिदे हराम में दाखिल हो कर काबा शरीफ के उस कोना के सामने आ जाऐं जिसमें हजरे असवद लगा हुआ है और तवाफ की नियत कर लें। अगर तवाफ के बाद उमरह की सई भी करनी है तो मर्द हज़रात इज़तिबा कर लें (यानी एहराम की चादर को दाएं बगल के नीचे से निकाल कर बाएं मूँढे के ऊपर डाल लें) फिर ज़बान से बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कह कर हजरे असवद का इस्तिलाम करें (यानी हजरे असवद का बोसा लें या अपनी जगह पर खड़े हो कर दोनों हाथों की हथेलियों को हजरे असवद की तरफ करके हाथ चूम लें) और फिर काबा को बाएं तरफ रख कर तवाफ शुरू कर दें। मर्द हज़रात पहले तीन चक्कर में (अगर मुमकिन हो) रमल करें यानी जरा मूँढे हिला के और अकड़के छोटे छोटे कदम के साथ किसी कदर तेज चलें। तवाफ करते वक्त निगाह सामने रखें। खाना काबा की तरफ सीना और पुश्त न करें यानी काबा शरीफ आप के बाएं जानिब रहे। तवाफ के दौरान बेगैर हाथ उठाए चलते चलते दुआएं करते रहें। आगे आधे दायरे की शकल की चार या पांच फिट की एक दीवार आप के बाएं जानिब आएगी उसको हतीम कहते हैं, उसके बाद खाना काबा के पीठ वाली दीवार आएगी, इसके बाद जब खाना काबा का तीसरा कोना आ जाए जिसे रूकने यमानी कहते है (अगर मुमकिन हो) तो दोनों हाथ या सिर्फ दाहिना हाथ उस पर फेरें वरना इसकी तरफ इशारा किए बेगैर यूं ही गुजर जाएं। रूकने यमानी और हजरे असवद के दरयमान चलते हुए यह दुआ पढ़ें ‘‘रब्बना अतिना फिद्दुनिया आखिर तक) फिर हजरे असवद के सामने पहुंच कर बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कह कर हजरे असवद का इस्तिलाम करें। इस तरह आप का एक चक्कर हो गया, इसके बाद बाकी छः चक्कर बिल्कुल इसी तरह करें। कुल सात चक्कर करने हैं।

तवाफ से मुतअल्लिक चंद मसाइल
1) तवाफ के दौरान कोई मखसूस दुआ जरूरी नहीं है बल्कि जो चाहें और जिस ज़बान में चाहे दुआ मांगते रहें। याद रखें कि असल दुआ वह है जो ध्यान, तवज्जुह और इंकिसारी से मांगी जाए चाहे जिस ज़बान में हो। अगर तवाफ के दौरान कुछ भी न पढ़े बल्कि खामोश रहें तब भी तवाफ सही हो जाता है।
2) तवाफ के दौरान जमाअत की नमाज़ शुरू होने लगे या थकन हो जाए तो तवाफ रोक दें, फिर जहाँ से तवाफ बन्द किया था उसी जगह से तवाफ शुरू कर दें।
3) नफली तवाफ में रमल और इज़तिबा नहीं होता है।
4) अगर तवाफ के दौरान वज़ू टूट जाए तो तवाफ रोक दें और फिर वज़ू करके उसी जगह से तवाफ शुरू कर दें जहाँ से तवाफ बन्द किया था क्योंकि बेगैर वज़ू के तवाफ करना जाएज नहीं है।
5) अगर तवाफ के चक्करों की तादाद में शक हो जाए तो कम तादाद शुमार करके बाकी चक्करों से तवाफ पूरा करें।
6) मस्जिदे हराम के अंदर ऊपर या नीचे या मताफ में किसी भी जगह तवाफ कर सकते हैं।
7) तवाफ हतीम के बाहर से ही करें, अगर हतीम में दाखिल हो कर तवाफ करेंगे तो वह मुतबर नहीं होगा।
8) अगर किसी औरत को तवाफ के दौरान हैज़ आ जाए तो फौरन तवाफ बन्द कर दे और मस्जिद से बाहर चली जाऐ।
9) औरतें तवाफ में रमल (अकड़ कर चलना) न करें, यह सिर्फ मर्द के लिए है।
10) तवाफ ज़ियारत (हज का तवाफ) का वक्त 10 जिलहिज्जा के गुरूबे आफताब तक है। बाज़ उलमा ने 13 ज़िलहिज्जा तक वक्त लिखा है। इन दिनों में अगर किसी औरत को माहवारी आती रही तो वह तवाफे ज़ियारत न करे बल्कि पाक होने के बाद ही करे।

दो रिकात नमाज़
तवाफ से फरागत के बाद मक़ामे इब्राहिम के पास आऐं। उस वक्त आप की ज़बान पर यह आयत हो तो बेहतर है ‘‘और तुम मक़ामे इब्राहिम को नमाज़ पढ़ने की जगह बनाओ‘‘ अगर सहुलत से मक़ामे इब्राहिम के पीछे जगह मिल जाए तो वहाँ, वरना मस्जिदे हराम में किसी भी जगह तवाफ की दो रिकात (वाजिब) अदा करें।
(वज़ाहत)
1) तवाफ की दो रिकात को तवाफ से फारिग होते ही अदा करें लेकिन अगर देर हो जाए तो कोई हर्ज नहीं।
2) तवाफ की इन दो रिकात के मुतअल्लिक नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत यह है कि पहली रिकात में सूरह काफेरून और दूसरी रिकात में सूरह इखलास पढ़ी जाए।
3) भीड़ के दौरान मक़ामे इब्राहिम के पास तवाफ की दो रिकात नमाज़ पढ़ने की कोशिश न करें क्योंकि इससे तवाफ करने वालों को तकलीफ होती है, बल्कि मस्जिदे हराम में किसी भी जगह अदा कर लें।
सई- सफा मरवा के दरमयान सात चक्कर लगाने को सई कहा जाता है। सई की इब्तिदा सफा से और इंतिहा मरवा पर होती है। हजरे असवद के सामने से ही सफा के लिए रास्ता जाता है। तवाफ से फरागत के बाद जमजम का पानी पी कर सफा पहाड़ी पर चलें जाऐं। सफा व मरवा दो पहाडि़यां थीं जो इन दिनों हुज्जाजे किराम की सहूलत के लिए तकरीबन खत्म कर दी गई हैं। जिन के दरमयान हज़रत हाजरा अलैहस्सलाम ने अपने प्यारे बेटे हज़रत इसमाइल अलैहिस्सलाम के लिए पानी की तलाश में सात चक्कर लगाए थे और मर्द हज़रात थोड़ा तेज चलते हैं यह उस जमाना में सफा मरवा पहाडि़यों के दरमयान एक वादी थी जहाँ से उनका बेटा नजर नहीं आता था, लिहाजा वह उस वादी में थोड़ा तेज़ दौड़ी थीं। हज़रत हाजरा अलैहस्सलाम की इस अज़ीम क़ुर्बानी को अल्लाह तआला ने कबूल फरमा कर क़यामत तक आने वाले तमाम मर्द हाजियों को इस जगह थोड़ा तेज चलने की तालीम दी, लेकिन शरीअते इस्लामिया ने औरतों को कमजोर जानते हुए इसको सिर्फ मर्द हज़रात के लिए सुन्नत करार दिया। सई का हर चक्कर तकरीबन 395 मीटर लंबा है, यानी सात चक्कर की मसाफत तकरीबन पौने तीन किलो मीटर बनती है। नीचे की मंजिल के मुकाबले में ऊपर वाली मंजिल पर भीड़ कुछ कम रहती है।

हज में ज़रूरी सई की तादाद
हज्जे इफराद में एक अदद (सिर्फ हज की)।
हज्जे क़िरान में दो अदद (एक उमरह की और एक हज की। बाज़ उलमा ने कहा है कि हज्जे क़िरान में एक सई भी काफी है)।
हज्जे तमत्तो में दो अदद (एक उमरह की और एक हज की)।
नफली सई - नफली सई का कोई सबूत नहीं है।

सई के बाज़ अहकाम
1) सई से पहले तवाफ का होना।
2) सफा से सई की इब्तिदा करके मरवा पर सात चक्कर पूरे करना।
3) सफा पहाड़ी पर थोड़ा चढ़कर किबला रूख खड़े होकर दुआएं करना।
4) मर्द हज़रात का सब्ज सुतूनों के दरमयान थोड़ा तेज़ तेज़ चलना।
5) मरवा पहाड़ी पर पहुंच कर किबला रूख खड़े हो कर दुआएं मांगना।
6) सफा और मरवा के दरमयान चलते चलते कोई भी दुआ बेगैर हाथ उठाए मांगना या अल्लाह का ज़िक्र करना या क़ुरान करीम की तिलावत करना।

सई के दौरान जाएज़ काम
1) बिला वज़ू सई करना, इसी तरह औरतों का माहवारी की हालत में सई करना।
2) सलाम करना और बात करना।
3) ज़रूरत पड़ने पर सई का सिलसिला बन्द करना।
4) किसी बीमारी की वजह से व्हीलचेयर पर सई करना।

सई करने का तरीका
सफा पर पहुंच कर बेहतर है कि ज़बान से कहे ‘‘अबदअु बिमा बदअल्लाहु बिहि आखिर तक‘‘ फिर खाना काबा की तरफ रूख करके दुआ की तरह हाथ उठा लें और तीन मरतबा अल्लाहु अकबर कहें और अगर यह दुआ याद हो तो इसे भी तीन बार पढ़ें‘‘लाइलाह इल्लल्लाहु वहदहु आखिर तक‘‘ उसके बाद खड़े हो कर खुब दुआएं मांगे। यह दुआओं के कबूल होने का खास मक़ाम और खास वक्त है। दुआओं से फारिग हो कर नीचे उतर कर मरवा की तरफ आम चाल से चलें। बेगैर हाथ उठाऐं दुआएं मांगते रहें या क़ुरान करीम की तिलावत करते रहें। सई के दौरान भी कोई खास दुआ लाजिम नहीं अलबत्ता इस दुआ को खास तौर पर पढ़ते रहें ‘‘रब्बिगफिर वरहम आखिर तक‘‘ जब सब्ज सुतून (जहाँ हरी टूयब लाईटें लगी हुई हैं) के करीब पहुंचे तो मर्द हज़रात ज़रा दौड़ कर चलें उसके बाद फिर ऐसे ही हरे सुतून और नज़र आएंगे वहाँ पहुंच कर दौड़ना खत्म कर दें और आम चाल से चलें। मरवा पर पहुंच कर क़िबला की तरफ रूख करके हाथ उठा कर दुआएं मांगे, यह सई का एक चक्कर हो गया। इसी तरह मरवा से सफा की तरफ चलें। यह दूसरा चक्कर हो जाएगा। इस तरह आखरी व सातवाँ चक्कर मरवा पर खत्म होगा। हर मरतबा सफा और मरवा पर पहुंच कर खाना काबा की तरफ रूख करके दुआएं करनी चाहिए।

सई से मुतअल्लिक चंद मसाइल
1) सई के लिए वज़ू का होना जरूरी नहीं अलबत्ता अफज़ल व बेहतर है। हैज़ (माहवारी) और निफास की हालत में भी सई की जा सकती है यानी अगर किसी औरत को तवाफ से फरागत के बाद माहवारी आ जाए तो वह सई नापाकी की हालत में कर सकती है लेकिन उसको चाहिए कि वह सई से फरागत के बाद मरवा की जानिब से बाहर चली जाए, मस्जिदे हराम में दाखिल न हो। अलबत्ता तवाफ हैज़ या निफास की हालत में हरगिज़ न करे बल्कि मस्जिदे हराम में भी दाखिल न हो।
2) तवाफ से फारिग हो कर अगर सई करने में देरी हो जाए तो कोई हर्ज नहीं।
3) सई का तवाफ के बाद होना शर्त है, तवाफ के बेगैर कोई सई मुतबर नहीं चाहे उमरह की सई हो या हज की।
4) सई के दौरान नमाज़ शुरू होने लगे या थक जाऐं तो सई रोक दें फिर जहाँ से सई रोकी थी उसी जगह से दोबारह शुरू कर दें।
5) अगर सई के तादाद में शक हो जाए तो कम तादाद शुमार करके बाकी चक्करों से सई पूरा करें।
6) औरतें सई में हरगिज सब्ज सुतूनों (जहाँ हरी टूयब लाईटें लगी हुई हैं) के दरमयान मर्द की तरह दौड़ कर न चलें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)