بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

हज्जे क़िरान में तवाफ और सई की तादाद

हज की तीन किसमें हैं- (1) तमत्तो (2) क़िरान (3) इफ़राद
हज्जे तमत्तो में मीक़ात से सिर्फ उमरह का एहराम बांधा जाता है। तवाफ, सई और हलक़ या क़स्र करके यानी उमरह की अदाएगी से फरागत के बाद एहराम उतार दिया जाता है फिर 7 या 8 ज़िलहिज्जा को मक्का ही से हज का एहराम बांध कर मिना जा कर दूसरे हाजियों की तरह हज के आमाल किए जाते हैं।
हज्जे क़िरान में मीक़ात से हज व उमरह का एक साथ एहराम बांधा जाता है। उमरह के तवाफ और सई से फरागत के बाद न बाल कटवाए जाते हैं और एहराम उतारा जाता है, फिर तवाफे कुदूम कर लिया जाता है जो हज्जे क़िरान वालों के लिए सुन्नत है। फिर मिना जा कर दूसरे हाजियों की तरह हज के आमाल किए जाते हैं।
हज्जे इफ़राद में मीक़ात से सिर्फ हज का एहराम बांधा जाता है, कुदूम (जो कि सुन्नत है) करके मिना जा कर दूसरे हाजियों की तरह हज के आमाल किए जाते हैं। हज्जे तमत्तो और हज्जे क़िरान में शुक्रुया हज की क़ुर्बानी करना वाजिब है जबकि इफ़राद में मुस्तहब है।
गरज़ ये कि हज्जे क़िरान और हज्जे तमत्तो में हज के साथ उमरह की अदाएगी की वजह से एक तवाफ उमरह का और एक तवाफ हज का इसी तरह एक सई उमरह की और एक सई हज की अदा करनी होती है, जबकि मीक़ात के बाहर से आने वालों के लिए तवाफे विदा भी ज़रूरी है। इस तरह हज में ज़रूरी तवाफ की तादाद अहादीसे नबविया की रौशनी में उलमा-ए-अहनाफ की राय में हस्बे ज़ैल हैं।

हज में ज़रूरी तवाफ की तादाद
हज्जे तमत्तो में तीन अदद- (तवाफे उमरह, तवाफे ज़ियारत ज़ियारत और आफाक़ी के लिए तवाफे विदा)।
हज्जे क़िरान में तीन अदद- (तवाफे उमरह, तवाफे ज़ियारत और आफाक़ी के लिए तवाफे विदा)।
हज्जे इफ़राद में दो अदद- (तवाफे ज़ियारत और आफाक़ी के लिए तवाफे विदा)।
हज्जे इफ़राद और हज्जे क़िरान में तवाफे कुदूम भी सुन्नत है, इस तरह उलमा-ए-अहनाफ के राय में हज्जे क़िरान करने वालों को चार तवाफ करने चाहिए, सबसे पहले तवाफे उमरह जिसके बाद उमरह की सई भी करनी होती है, दूसरे तवाफे कुदूम जो सुन्नत है, तीसरे तवाफे इफाज़ा या तवाफे ज़ियारत जिसको हज का तवाफ भी कहा जाता है, इसके बाद हज की सई भी होती है बर्शतेकि तवाफ कुदूम के साथ न की हो। चैथे तवाफे विदा जो आफाक़ी के लिए वाजिब है अलबत्ता तवाफे विदा ऐसी औरत के लिए माफ है जिसको रवानगी के वक़्त माहवारी आ जाए। गरज़ ये कि उलमा-ए-अहनाफ के नज़दीक हज्जे तमत्तो की तरह हज्जे क़िरान में भी उमरह का अलग अलग तवाफ करना ज़रूरी है। इस तरह उलमा-ए-अहनाफ के नज़दीक हज्जे तमत्तो और हज्जे क़िरान में सिर्फ यह फर्क होगा कि हज्जे तमत्तो में उमरह करके एहराम उतार दिया जाता है और फिर मक्का ही से हज का एहराम बांधा जाता है जबकि हज्जे क़िरान में एक ही एहराम से दोनों की अदाएगी की जाती है बाकी सारे आमाल एक जैसे हैं।
हिन्द व पाक के जमहूर उलमा (जो मुख्तलफ फी मसाइल में 80 हिजरी में पैदा हुए मशहूर व मारूफ फकीह व मुहद्दीस हज़रत हज़रत इमाम अबु हनीफा की राय को तरजीह देते हैं) की भी यही राय है कि हज्जे क़िरान में एक तवाफ उमरह और हज दोनों के लिए काफी नहीं होगा बल्कि दोनों के मुस्तकिल इबादत होने की वजह से दोनों के लिए अलग अलग तवाफ करने होंगे और जो हदीस में आया है कि हज्जे क़िरान में उमरह हज में शामिल हो गया, इसका यह मतलब नहीं कि एक ही तवाफ दोनों के लिए काफी है बल्कि मतलक यह है कि उमरह से फरागत के बाद एहराम नहीं उतराना है बल्कि उमरह और हज से फरागत के बाद एक ही मरतबा हलक़ हलक़ या क़स्र करके एहराम उतारना है। क़ुरान करीम की आयत से भी यही मालूम हो रहा है कि यह दो अलग अलग इबादतें हैं और दोनों की तकमील ज़रूरी है।
इसके बरखिलाफ दूसरे उलमा के नज़दीक क़ारिन को तीन तवाफ करने हैं, एक तवाफे क़ुदूम जो सुन्नत है दूसरा तवाफे ज़ियारत और आखरी तवाफे विदा। यानी उनकी राय में हज्जे क़िरान में उमरह का तवाफ करने की जरूरत नहीं है बल्कि हज का तवाफ यानी इफाज़ा उमरह के तवाफ के लिए काफी है। दोनों मकातिबे फिक्र के पास दलाएल मौजूद हैं लेकिन मशहूर व मारूफ फकीह व मुहद्दीस हज़रत इमाम अबु हनीफा और उलमा-ए-अहनाफ की राय हमेशा की तरह इहतियात पर मबनी है और वह यह है कि हज्जे क़िरान में भी उमरह और हज का अलग अलग तवाफ किया जाए ताकि हज की अदाएगी के बाद कोई शक व शुबहा पैदा न हो क्योंकि इंसान को अपनी जिन्दगी में बार बार हज करने की तौफीक आम तौर पर नहीं मिलती है। सहाबा-ए-किराम में से हज़रत उमर फारूक, हज़रत अली मुर्तज़ा, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद, हज़रत हसन बिन अली, हज़रत हुसैन बिन अली (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और ताबेईन व तबेताबईन में से हज़रत मुजाहिद, हज़रत काजी शुरैह, हज़रत इमाम शाबी, हज़रत इब्ने शुबरूमा हज़रत इब्ने अबी लैला, इमाम नखई, हज़रत इमाम सौरी, हज़रत असवद बिन ज़ियाद, हज़रत हम्माद बिन सलमा, हज़रत हम्माद बिन सुलैमान, हज़रत ज़ियाद बिन मलिक, हज़रत हसन बसरी और हज़रत इमाम अबु हनीफा (रहमतुल्लाह अलैहिम) से यही मंकूल है। एक रिवायत के मुताबिक हज़रत इमाम अहमद बिन हमबल का भी यही क़ौल है। तफसीलात के लिए अल्लामा बदरूद्दीन अैनी (762 हिजरी-885 हिजरी) की बुखारी की शरह उमदतुल क़ारी फी शरह अल बुखारी जिल्द 9 पेज 184 का मुतालआ फरमाएं।
(वज़ाहत) उलमा-ए-अहनाफ के दलाएल के ज़िक्र से पहले हज्जतुल विदा के मौका पर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तवाफ के मुतअल्लिक एक वज़ाहत करना मुनासिब समझता हूँ जिस पर उम्मते मुस्लिमा का इत्तिाफ है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ एक हज 10 हिजरी में किया जिसको हज्जतुल विदा के नाम से जाना जाता है और इस सफर में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पहला तवाफ मक्का में दाखिल होने के दिन 4 ज़िलहिज्जा को किया था, दूसरा तवाफ (तवाफे इफाज़ा) 10 ज़िलहिज्जा को किया था और तवाफे विदा 14 ज़िलहिज्जा को किया था।

उलमा-ए-अहनाफ के बाज़ दलाएल
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाहु सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने उमरह और हज के लिए 2 (अलग अलग) तवाफ और 2 (अलग अलग) सई कीं। हज़रत अबु बकर सिद्दीक, हज़रत उमर फारूक और हज़रत अली मुर्तजा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने भी इसी तरह 2 (अलग अलग) तवाफ और 2 (अलग अलग) सई की थीं। (सूनने दारे क़ुतनी जिल्द 2 पेज 264)
हज़रत इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने (उमरह और हज के) दो अलग अलग तवाफ किए और (उमरह और हज की) दो अलग अलग सई कीं। । (सूनने दारे क़ुतनी जिल्द 2 पेज 264)
मशहूर ताबई हज़रत मुजाहिद फरमाते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने हज व उमरह को एक साथ जमा किया (यानी क़िरान किया) और उन्होंने (उमरह और हज के) दो अलग अलग तवाफ किए और (उमरह और हज की) दो अलग अलग सई कीं और उन्होंने फरमाया कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी मैंने ऐसा ही करते देखा था जैसे मैंने किया है। (सूनने दारे क़ुतनी) (मआरिफुसूनन जिल्द 4 पेज 609)
हज़रत इब्राहिम बिन मोहम्मद इब्ने अलहनफीया फरमाते हैं कि उन्होंने अपने वालिद के साथ हज किया और उन्होंने हज व उमरह को एक साथ जमा किया (यानी हज्जे क़िरान का एहराम बांधा) और उन्होंने (उमरह और हज के) दो अलग अलग तवाफ किए और (उमरह और हज की) दो अलग अलग सई कीं और उन्होंने मुझसे बयान किया कि हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने भी ऐसा ही किया था और उन्होंने (हज़रत अली) ने इन्हें (हज़रत इब्राहिम के वालिद) बताया कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी ऐसा ही किया था। (सूनन कुबरा लिलनसाई- मसनद अली) (नसबुर राया-बाबुल क़ुरान जिल्द 3 पेज 110)
हज़रत हसन बिन अम्मारह हज़रत हकम से और वह हज़रत इब्ने अबी लैला से रिवायत करे हैं कि हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने हज में दो तवाफ किए और दो सई कीं और फरमाया कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी ऐसा ही किया था। । (सूनने दारे क़ुतनी जिल्द 2 पेज 263)
हज़रत मंसूर बिन अलमोतमिर हज़रत इब्राहिम नखई से और वह हज़रत अबु नसर अस्सलमा से रिवयात करते हैं कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि जब मैं हज व उमरह का एहराम बांधता हूं तो दो तवाफ और दो सई करता हूं। हज़रत मंसूर फरमाते हैं कि मेरी मुलाकात हज़रत मुजाहिद से हुई और उन्होंने फतवा दिया कि क़िरान करने वाले के लिए एक तवाफ है तो मैंने यह हदीस बयान की तो उन्होंने फरमाया अगर मुझे पहले से मालूम होता तो मैं ऐसा फतवा नहीं देता बल्कि दो ही तावफ करने के फतवा देता लेकिन आज के बाद (उमरह और हज के अलग अलग) दो ही तवाफ करने का फतवा दूंगा । (किातबुल आसार- किताबुल मनासिक- बाबुल क़िरान व फजलुल एहराम)
हज़रत ज़ियाद बिन मालिक से रिवयात है कि हज़रत अली और हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने फरमाया कि हज्जे क़िरान में (उमरह और हज के अलग अलग ) दो ही तवाफ हैं। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)
मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा में ही हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हुमा का असर मरवी है कि जब तुम हज्जे क़िरान का एहराम बांधो तो (हज व उमरह के अलग अलग) दो तवाफ और दो सई करो।
मुजल्ला (जिल्द 7 पेज 175) में शैख इब्ने हज़म ने हज़रत हुसैन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हुमा का असर नकल किया है कि जब तुम क़िरान का एहराम बांधो तो (हज व उमरह के अलग अलग) दो तवाफ और दो सई करो।

अईम्मा सलासा की दलील का जवाब
दूसरे उलमा की दलील हज़रत जाबिर, हज़रत आईशा और हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की वह रिवायत हैं जो सही बुखारी, सही मुस्लिम और तिर्मीजी में मरवी हैं, जिसमें मज़कूर है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज्जे क़िरान का एहराम बांधा और एक तवाफ किया। यह अहादीस मुअव्वल हैं यानी इनके मानी में तावील की गई है और इनका ज़ाहिरी मफहूम किसी के नज़दीक भी मुराद नहीं है क्योंकि इस पर इत्तिफाक है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ एक तवाफ नहीं बल्कि तीन तवाफ किए थे। अइम्मा सलासा इन रिवायात की यह तावील करते हैं कि तवाफे वाहिद से मुराद तवाफे ज़ियारत है जिसमें तवाफे उमरह का तदाखुल जबकि उलमा-ए-अहनाफ इसकी यह तौजीह बयान करते हैं कि इन अहादीस में तवाफे वाहिद से मुराद तवाफे उमरह है जिस में तवाफे कुदूम का तदाखुल हो गया है और यह भी मुमकिन है कि इन अहादीस से मुराद तवाफे तहल्लुल हो और मतलब यह है कि ऐसा तवाफ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक ही किया है जो तहल्लुल का सबब बना हो और वह तवाफे ज़ियारत है क्यों कि तवाफ उमरह के बाद आप क़िरान का एहराम बांधने की वजह से हलात नहीं हुए। गरज़ ये कि इन अहादीस के बहुत से मफाहिम मुराद लिए जा सकते हैं।

हज्जे क़िरान में दो सई
सई के बारे में भी इखतिलाफ है। उलमा-ए-अहनाफ के नज़दीक हज्जे क़िरान में तवाफ की तरह हज व उमरह के लिए दो अलग अलग सई करनी होंगी, जबकि दूसरे उलमा के नज़दीक हज्जे क़िरान में एक ही सई हज व उमरह दोनों के लिए काफी है। अईम्मा सलासा का इस्तिदलाल इन अहादीस से है जिनमें तवाफे वाहिद के साथ सई वाहिद का ज़िक्र आया है। उलमा-ए-अहनाफ का इस्तिदलाल इन अहादीस से है जिनमें हज्जे क़िरान में सराहत के साथ दो सई का ज़िक्र आया है। नीज़ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सई पैदल की या सवार हो कर दोनों तरह की अहादीस मौजूद हैं। इस ज़ाहिरी तआरूज़ को दूर करने की एक तौजीह यह भी है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक सई पैदल की और दूसरी सई सवार हो कर की थी।

हज में ज़रूरी सई की तादाद
अहादीसे नबविया की रौशनी में उलमा-ए-अहनाफ की राय है कि हज्जे तमत्तो और हज्जे क़िरान में ज़रूरी सई की तादाद दो अदद जबकि इफ़राद में एक अदद है।

खुलासा कलाम
मौजू बहस मसअला में ज़माना ए क़दीम से इखतिलाफ चला आ रहा है, दोनों मकातिबे फिक्र के पास दलाएल मौजूद हैं। अइम्मा सलासा की राय जिन अहादीस पर मबनी है वह सनद के एतबार से तो मजबूत हैं लेकिन उनके ज़ाहिरी मफहूम किसी के नज़दीक मुराद नहीं है बल्कि उसके मानी में तावील की गई है और उसके कसीर इहतिमालात हैं, इस लिए इनसे कोई दावा साबित नहीं किया जा सकता। उलमा-ए-अहनाफ के दलाएल जिन अहादीस पर मबनी हैं उनकी सनद पर कुछ एतेराज़ात किए गए हैं, जिन के उलमा-ए-अहनाफ ने माकूल जवाबात भी दिए हैं। मगर उलमा-ए-अहनाफ के दलाएल मफहूम के एतेबार से बिल्कुल वाज़ेह हैं कि हज्जे क़िरान में तवाफ विदा के अलावा दो तवाफ और दो सई ज़रूरी हैं। नीज़ उलमा-ए-अहनाफ का क़ौल एहतियात पर मबनी है कि अगर कोई शख्स हज्जे क़िरान में उमरह और हज का अलग अलग तवाफ और सई करता है तो पूरी दुनिया का कोई भी आलिम हज में किसी तरह की कमी का फतवा सादिर नहीं कर सकता है, मगर हज्जे क़िरान में उमरह व हज के लिए सिर्फ एक तवाफ या सिर्फ एक सई करता है तो उलमा-ए-अहनाफ जो दुनिया में एक हजार साल से ज्यादा के अरसा से बराबर अकसरियत में रह कर क़ुरान व हदीस की अज़ीम खिदमात पेश कर रहे हैं, दम के वाजिब होने का फतवा सादिर फरमाएंगे, लिहाज़ा एहतियात इसी में है कि हज्जे तमत्तो की तरह हज्जे क़िरान में भी उमरह और हज का अलग अलग तवाफ और अलग अलग सई करें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)