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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

हुज्जाजे किराम के लिए 10 ज़िलहिज्जा के आमाल में तरतीब

10 ज़िलहिज्जा का दिन हुज्जाजे किराम के लिए काफी मसरूफ दिन होता है, हुज्जाजे किराम के लिए दस ज़िलहिज्जा से मुतअल्लिक चार आमाल हैं-
1) रमी (आखरी जमरा पर सात कंकड़ियां मारना)
2) क़ुर्बानी
3) हलक़ या क़स्र (बाल मुंडवाना या छोटा कराना)
4) तवाफे ज़ियारत और हज की सई
(वज़ाहत) 10 ज़िलहिज्जा को रमी सुबह से मगरिब तक की जा सकती है और मगरिब तक कंकडि़यां न मार सके तो रात में भी कंकडि़यां मार सकते हैं। क़ुर्बानी, हलक़ या क़स्र और तवाफे ज़ियारत व हज की सई 10 ज़िलहिज्जा को करना ज़रूरी नहीं है बल्कि 12 ज़िलहिज्जा के आफताब डूबने तक दिन व रात में किसी भी वक़्त कर सकते हैं, बाज़ उलमा ने 13 ज़िलहिज्जा तक इजाज़त दी है लेकिन बेहतर यही है कि इन आमाल से 10 ज़िलहिज्जा को ही फारिग हो जाएं। 10 ज़िलहिज्जा के यह मज़कूरा आमाल क़यामत तक आने वाले तमाम इंसान व जिन्नात के नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने हज्जतुल विदा में जिस तरगीब से अंजाम दिए थे वह सही मुस्लिम की मज़कूरा हदीस में आया है।
हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब मिना आए तो पहले जमरा उक़बा पर गए और वहाँ कंकडि़यां मारीं फिर मिना में अपनी क़यामगाह पर तशरीफ लाए और फिर क़ुर्बानी की उसके बाद हज्जाम से कहा और अपने सर के दाहिनी तरफ इशारा किया और फिर बाएं जानिब इशारा किया और अपने बाल लोगों के देने शुरू कर दिए।
नीज़ सही मुस्लिम में है कि हज़रत जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दसवीं ज़िलहिज्जा को जमरा उक़बा की कंकडि़यां मारते हुए इरशाद फरमा रहे थे कि मुझसे अपने मनासिके हज सिख लो, इस लिए कि मुझे नहीं मालूम कि मैं इस हज के बाद फिर हज करूँगा। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल की रोशनी में पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक़ है कि हुज्जाजे किराम को 10 ज़िलहिज्जा के आमाल उसी तरतीब से करने चाहिए जो सही मुस्लिम में जिक्र किए गए हैं और आज़मीने हज को यही तालीम देनी चाहिए कि यह चारों आमाल उसी तरतीब से करें जिस तरतीब से तमाम नबियों के सरदार मोहम्म्द सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने पहले और आखरी हज में किए थे। लेकिन अगर कोई हाजी इन आमाल को तरतीब के खिलाफ कर ले मसलन रमी से पहले क़ुर्बानी कर ले या रमी से पहले बाल मुंडवाले तो क्या उसकी वजह से कोई दम वाजिब होगा या नहीं? इसमें फुक़हा व उलमा के दरमयान इखतिलाफ है। तवाफे ज़ियारत और बाकी तमाम तीन आमाल (रमी, क़ुर्बानी और हलक़) के दरमयान बिलइत्तिफाक़ तरतीब वाजिब नहीं है, यानी तवाफे ज़ियारत , रमी, क़ुर्बानी और हलक़ या क़स्र से पहले या बाद में कभी भी किया जा सकता है। इन आमाल से फरागत के बाद तवाफे ज़ियारत आम लिबास में वरना एहराम की हालत में अदा किया जाएगा। इस पर भी इत्तिफाक़ है कि हज इफराद अदा करने वाले के लिए चूंकि क़ुर्बानी वाजिब नहीं है इस लिए उसके हक़ में क़ुर्बानी में भी तरतीब ज़रूरी नहीं है। हज़रत इमाम अबु हनीफा की राय में हज्जे क़िरान और हज्जे तमत्तो करने वाले के लिए रमी, क़ुर्बानी और हलक़ या क़स्र में तरतीब ज़रूरी है चुनांचे हज़रत इमाम अबु हनीफा की राय में रमी, क़ुर्बानी और हलक़ या क़स्र में तरतीब की खिलाफवरज़ी की सूरत में दम वाजिब होगा। लेकिन हज़रत इमाम अबु हनीफा के नुक़तए नजर की बाबत यह बात ज़रूर मलहूज रखें कि अगर कोई शख्स मसाइल के न मालूम होने की बिना पर तरतीब की खिलाफवरज़ी करे तो खुद हज़रत इमाम अबु हनीफा के नज़दीक भी दम वाजिब नहीं होगा, हज़रत इमाम अबु हनीफा के मशहूर शागिर्द हज़रत इमाम मोहम्मद ने खुद इसकी वज़ाहत फरमाई है। हज़रत इमाम अबु हनीफा की दलील हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) का यह क़ौल है कि जिस शख्स ने हज के किसी (अहम) अमल को पहले या बाद में किया तो उस पर दम वाजिब होगा। नीज़ यह भी दलील है कि एहराम बांधने के बाद अगर किसी हाजी के सर में बहुत ज्यादा जुएं हो जाएं तो शरीअते इस्लामिया ने एहराम की हालत में सर मुंडवाने की इजाज़त दी है लेकिन फिदया वाजिब होगा यानी रोज़ा या सदका या क़ुर्बानी जैसा कि अल्लाह तआला ने सूरह बक़रा आयत 196 में जिक्र किया है तो जब परेशानी की वजह से क़ब्ल अज़ वक़्त सर मुंडवाने पर रोजा या फिदया या दम वाजिब हुआ तो बेगैर परेशानी के अगर क़ुर्बानी और रमी से पहले हलक़ कर दे तो बदरजा ऊला दम वाजिब होना चाहिए।
इसके अलावा अक़ली दलील भी है कि जिस तरह मीक़ाते मकानी में ताखीर हो जाए यानी कोई शख्स एहराम के बेगैर मीक़ात से आगे बढ़ जाए तो दम वाजिब होता है, इसी तरह 10 ज़िलहिज्जा को जिस अमल के लिए जो वक़्त मुक़र्रर है मसलन पहले रमी फिर क़ुर्बानी और फिर हलक़ या क़स्र तो मुक़र्रर वक़्त से ताखीर यानी तरतीब के बदलने पर दम आना चाहिए।
हज़रत इमाम मालिक की राय है कि रमी से पहले हलक़ या क़स्र कराने वाले पर दम वाजिब होगा। (अलमदुनल कुबरा जिल्द 1 पेज 23)
हज़रत इमाम अहमद बिन हमबल, हज़रत इमाम शाफई और हज़रत इमाम अबु हनीफा (रहमतुल्लाह अलैहिम) के दोनों मशहूर शागिर्द हज़रत इमाम यूसुफ और हज़रत इमाम मोहम्मद (रहमतुल्लाह अलैहिम) की राय है कि इन मज़कूरा आमाल में तरतीब वाजिब नहीं बल्कि सुन्नत है। (रद्दुल मुखतार जिल्द 2 पेज 250, बदाए अस सनाए जिल्द 2 पेज 141) लेकिन सबने जानते बुझते तरतीब की खिलाफवरज़ी को बाइसे कराहत कहा है। इन हज़रात का इस्तिदलाल उन मशहूर रिवायात से है जो सिहाये सित्ता में लिखी हुईं हैं और जिन में हज से फरागत के बाद ज़बह से पहले हलक़ और रमी से पहले ज़बह के सवाल में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ‘‘कोई हर्ज नहीं है” फरमाया है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अलआस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज्जतुल विदा में मिना में लोगों के लिए तशरीफ फरमा हुए ताकि लोग सवाल करें, एक शख्स ने कहा कि मैने लाइलमी में ज़बह से पहले हलक़ किया है तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ज़बह कर लो कोई हर्ज नहीं, दूसरे ने आ कर कहा मैंने रमी से पहले क़ुर्बानी करली, हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कोई हर्ज नहीं, तकदीम और ताखीर से मुतअल्लिक जो भी सवाल किया गया आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कोई हर्ज नहीं। (सही बुखारी)
अइम्मा सलासा और साहिबैन ने इस हदीस में हर्ज से हर्ज दुनियवी और हर्ज उखरवी दोनों ही मुराद लिए हैं, यानी न ऐसे शख्स पर दम जिनायत वाजिब होगा और न वह आखिरत में गुनहगार होगा। हज़रत इमाम अबु हनीफा (रहमतुल्लाह अलैह) ने इस हदीस से हर्ज उखरवी मुराद लिया है यानी इन तीनों आमाल के आगे पीछे करने पर आखिरत में कोई गुनहगार नहीं होगा। नीज़ गलती करने वाले सहाबा-ए-किराम को मसाइल से वाक़फियत ही नहीं थी जैसा कि अहादीस के अलफाज़ से वाजेज़ होता है और मसाइल से नावाक़फियत की वजह से इन आमाल को तरतीब से न करने पर हज़रत इमाम अबु हनीफा (रहमतुल्लाह अलैह) की राय में भी कोई दम लाज़िम नहीं। लेकिन जानबूझ कर इन आमाल को तरतीब के खिलाफ करने पर हज़रत इमाम अबु हनीफा (रहमतुल्लाह अलैह) की राय में दम लाज़िम होगा।
इस मौज़ू पर फिकहे इस्लामी हिन्द ने क़ाजी मुजाहिदुल इस्लाम क़ासमी (रहमतुल्लाह अलैह) की सरपरस्ती में उलमा व फुक़हा का एक सेमीनार का इंइकाद किया था कि हज़रत इमाम अबु हनीफा की राय में 10 ज़िलहिज्जा के आमाल (रमी , क़ुर्बानी और हलक़ या क़स्र) में तरतीब बरकरार रखना ज़रूरी है लेकिन आज के हालात में तरतीब बरकरार रखना इंतिजामी अमूर की वजह से मुश्किल हो गया है, नीज़ इन दिनों हूकूमते सउदी ने अपनी निगरानी में एदारे क़ायम किए हैं जो क़ुर्बानी कराते हैं और यह महसूस किया जाता है कि उनके यहां तरतीब वाजिब न होने की वजह से आम तौर पर तरतीब का खयाल नहीं रखा जाता है तो क्या उसके हल के लिए अदमे वजूब के काएलीन और अहनाफ में साहिबैन के क़ौल को इखतियार किया जा सकता है? इस मौजू पर बहुत से मुफतियाने किराम ने अपने क़ीमती मक़ाले तहरीर किए हैं। अक्सर मुफतियाने किराम की राय पर यह फैसला किया गया कि जमहूर और साहिबैन की राय भी कवी दलील पर मबनी है और यह भी एक हकीकत है कि जिन मसाइल में हज़रत इमाम अबु हनीफा और सहिबैन के दरमयान इखतिलाफ हो उनमें साहिबैन की राय को तरजीह देना असहाबे इफता के यहाँ कोई नादिर नहीं है, चुनांचे फैसला किया गया कि हुज्जाजे किराम को चाहिए कि जहाँ तक मुमकिन तो तरतीब की रिआयत को मलहूज़ रखें और यही मतलूब व मकसूद है ताहम भीड़, मौसम की शिद्दत और मज़बह की दूरी वगैरह की वजह से साहिबैन और अइम्मा सलासा के क़ौल पर अमल करने की गुनजाइश है, लिहाज़ा अगर यह मनासिक तरतीब के खिलाफ हों तो दम वाजिब नहीं होगा।
इन दिनों बाज़ हज़रात हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत और सहाबा के अमल के बरखिलाफ आज़मीने हज को इब्तिदा ही से यह दावत देते हैं कि 10 ज़िलहिज्जा के आमाल (रमी, क़ुर्बानी और हलक़ या क़स्र) अपनी सहूलत से जब चाहें करें। इन आमाल में तरतीब वाजिब न होने को अगर तसलीम भी कर लिया जाए तो इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि हम आज़मीने हज को हज की अदाएगी से पहले यह तरगीब दें कि वह हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के मुताबिक़ इन आमाल को करने की कोई कोशिश ही न करें बल्कि अपनी मर्ज़ी और सहूलत से इन आमाल में से जो चाहें कर लें। यह यक़ीनन शरीअते इस्लामिया की रूह के खिलाफ है, उलमा-ए-किराम को चाहिए कि वह आज़मीने हज को यही तालीम दें कि 10 ज़िलहिज्जा के आमाल उसी तरतीब से करें जिस तरतीब से हुज़ूर अकरम सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने किए थे जैसा कि सही मुस्लिम की हदीस में गुज़रा, और हज्जतुल विदा में एक लाख से ज्यादा सहाबा-ए-किराम ने यह आमाल इसी तरतीब से किए थे। लेकिन अगर कोई हाजी गलती से, न जानते हुए, तकलीफ और दुशवारी की वजह से यह आमाल तरतीब से न कर सका तो इंशाअल्लाह दम वाजिब नहीं होगा, जैसा कि बाज़ सहाबा-ए-किराम ने मसाइल के न मालूम होने की वजह से गलती होने पर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सवाल किया था और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ‘‘कोई हर्ज नहीं‘‘ कह कर उनको मुतमइन किया मगर बाकी तमाम सहाबा-ए-किराम ने जिनकी तादाद एक लाख से ज्यादा थी, यह आमाल उसी तरतीब से किए थे जिस तरतीब से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किए थे। नीज़ जिन हज़रात से गलती हुई उन्होंने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सवाल के वक़्त फरमाया था कि मसाइल की जानकारी न होने की वजह से यह गलती हुई है, जिसपर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया ‘‘कोई हर्ज नहीं”।
गरज़ ये कि वह आमाल जो हमारे इखतियार मे हें इस में हम तरतीब को जहाँ तक हो सके बाकी रखें मसलन अगर क़ुर्बानी का हमें इल्म नहीं हो पा रहा है कि किस वक़्त क़ुर्बानी हुई तो हमें यह तो मालूम है कि हमने कंकडि़यां मारी या नहीं नीज़ सर के बाल मुंडवाना या कटवाना हमारे इखतियार में है। लिहाजा हम सर के बाल उसी वक़्त मुंडवाएं या कटवाएं जब हम कंकडि़यां मार चुके हों और काफी हद तक यह यक़ीन हो जाए कि हमारी क़ुर्बानी हो गई होगी।
अल्लाह तआला तमाम आज़मीने हज के लिए आसानी व खैर का मामला फरमा कर उनके हज को मकबूल व मबरूर बनाए।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)