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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

हुज्जाजे किराम की बाज़ गलतियां

हज ऐसी इबादत है जो ज़िन्दगी में एक मर्तबा साहबे इस्तिताअत पर फ़र्ज़ है, अगरचे एक से ज़्यादा मर्तबा हज की अदायगी की तरग़ीब हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात में वाज़ेह तौर पर मिलती है चुनाचे हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: पै दर पै हज व उमरे किया करो, बेशक यह दोनों (हज व उमरह) फक़्र यानि गरीबी और गुनाहों को इस तरह दूर कर देते हैं जिस तरह भट्टी लोहे के मैल कुचैल को दूर कर देती है। (इब्ने माजा)
इंसान को अपनी ज़िन्दगी में बार बार हज करने की तौफ़ीक़ आम तौर पर नहीं मिलती है, हज के मसाएल कुछ इस किस्म के हैं कि हज की अदायगी क़े बगैर उनका समझना बज़ाहिर मुश्किल है, नीज़ पहले से ज़रूरी तैयारी न होने की वजह से भी आम हाजी अपने हज की अदायगी में गलतियां करता है, बाज़ गलतियां हज क़े सही न होने या दम वाजिब होने का सबब बनती हैं, लिहाज़ा आज़मीने हज को चाहिए कि वह हुज्जाजे किराम से सरज़द होने वाली गलतियों को अच्छी तरह याद कर लें ताकि हज की अदायगी सही तरीका पर हो और उनका हज हज्जे मब्रूर बने जिस का बदला जन्नतुल फ़िरदौस है जैसा कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया एक उमरह दूसरे उमरह तक उन गुनाहों का कफ़्फ़ारा है जो दोनों उमरों के दरम्यान सरज़द हों और हज्जे मब्रूर का बदला तो जन्नत ही है। (बुखारी व मुस्लिम)

1) हज के अख़राजात में हराम माल का इस्तेमाल करना- हज और उमरह के लिए सिर्फ पाकीज़ा हलाल कमाई में से खर्च करना चाहिए क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है अल्लाह तआला पाकीज़ा है और पाकीज़ा चीज़ों को ही क़बूल करता है। हज़रात अबु हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जब आदमी हज के लिए रिज़्क़े हलाल लेकर निकलता है और अपना पैर सवारी के रकाब में रख कर (यानि सवारी पर सवार होकर) लब्बैक कहता है तो उसको आसमान से पुकारने वाले जवाब देते हैं तेरी लब्बैक क़बूल हो और रहमते इलाही तुझ पर नाज़िल हो, तेरा सफर खर्च हलाल और तेरी सवारी हलाल और तेरा हज मक़बूल है और तू गुनाहों से पाक है और जब आदमी हराम कमाई के साथ हज के लिए निकलता है और सवारी के रकाब पर पैर रख कर लब्बैक कहता है तो आसमान के मुनादी जवाब देते हैं तेरी लब्बैक क़बूल नहीं, न तुझ पर अल्लाह की रहमत हो, तेरा सफर खर्च हराम, तेरी कमाई हराम और तेरा हज गैर मक़बूल है। (तबरानी)
हमेशा हमें हलाल रिज़्क़ पर ही इक्तिफ़ा करना चाहिए चाहे बज़ाहिर कम ही क्यों न हो, हराम रिज़्क़ के तमाम तरीके से बचना चाहिए जैसा कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया हराम माल से जिस्म की बढ़ोतरी ना करो क्योंकि इससे बेहतर आग है। (तिर्मिज़ी)
2) हज के सफर से पहले हज के मसाएल को दरयाफ्त न करना, लिहाज़ा आज़मीने हज को चाहिए कि वह हज की अदायगी पर जाने से पहले उलमा किराम से मसाएल हज को अच्छी तरह याद कर लें।
3) बाज़ लोगों ने मशहूर कर रखा है कि अगर किसी ने उमरह किया तो उस पर हज फ़र्ज़ हो गया, यह गलत है। अगर वह साहबे इस्तिताअत नहीं है यानि अगर उसके पास इतना माल नहीं है कि वह हज अदा कर सके तो उस पर उमरह की अदायगी की वजह से हज फ़र्ज़ नहीं होता है अगरचे वह उमरह हज के महीनों में अदा किया जाये फिर भी उमरह की अदायगी की वजह से हज फ़र्ज़ नहीं होगा।
4) अपनी तरफ से हज किये बगैर दूसरे की जानिब से हज्जे बदल करना।
5) सफर हज के दौरान इन नमाज़ों का एहतिमाम न करना, याद रखें कि अगर ग़फ़लत की वजह से एक वक़्त की नमाज़ भी छूट गई तो मस्जिदे हराम की सौ नफलों से भी इसकी तलाफ़ी नहीं हो सकती है, नीज़ जो लोग नमाज़ का एहतिमाम नहीं करते वह हज की बरकात से महरूम रहते हैं और उनका हज मक़बूल नहीं होता है।
6) हज के इस अज़ीम सफर के दौरान लड़ना झगड़ना यहाँ तक कि किसी पर गुस्सा होना भी गलत है। अल्लाह तआला फ़रमाता है हज के चंद महीने मुक़र्रर हैं इसलिए जो इन में हज को लाज़िम कर ले वह अपनी बीवी से मेल मिलाप करने, गुनाह करने और लड़ाई झगड़ा करने से बचता रहे। (सूरह अलबक़रा आयत 197) नीज़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया जिसने हज किया हौर शहवानी बातों और फिस्क व फुज़ूर से बचा वह गुनाहों से इस तरह पाक हो जाता है जैसे उस दिन पाक था जब उसकी माँ ने उसे जना (पैदा किया) था। (बुखारी व मुस्लिम)
7) बड़ी गलतियों में से एक बगैर एहराम के मीक़ात से आगे बढ़ जाना है, लिहाज़ा हवाई जहाज़ पर सवार होने वाले हज़रात एयरपोर्ट पर ही एहराम बांध लें या एहराम लेकर हवाई जहाज़ में सवार हो जाए और मीक़ात से पहले पहले बांध लें।
8) बाज़ हज़रात शुरू ही से इज़तिबा (यानि दाहिनी बग़ल के नीचे से एहराम की चादर निकाल कर बाएं कंधे पर डालना) करते हैं, यह गलत है बल्कि सिर्फ तवाफ़ के दौरान इज़तिबा करना सुन्नत है, लिहाज़ा दोनों बाज़ू ढांक कर ही नमाज़ पढ़ें।
9) बाज़ हुज्जाजे किराम हजरे असवद का बोसा लेने के लिए दूसरे हज़रात को तकलीफ देते हैं हालाँकि बोसा लेना सिर्फ सुन्नत है जबकि दूसरों को तकलीफ पहुचाना हराम है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत उमर फारूक (रज़ियल्लाहु अन्हु) को खास तौर से ताकीद फ़रमाई थी कि देखो तुम ताक़तवर आदमी हो हजरे असवद के इस्तिलाम के वक़्त लोगों से मुज़ाहमत न करना, अगर जगह हो तो बोसा लेना वरना सिर्फ इस्तिक़बाल करके तकबीर व तहलील कह लेना।
10) हजरे असवद का इस्तिलाम करने के अलावा तवाफ़ करते हुए खाना क़ाबा की तरफ चेहरा या पुश्त करना गलत है, लिहाज़ा तवाफ़ के वक़्त आप का चेहरा सामने हो और क़ाबा आप के बाएं जानिब हो, अगर तवाफ़ के दौरान आप का चेहरा क़ाबा की तरफ हो जाये तो उस पर दम लाज़िम नहीं होगा लेकिन जानबूझ कर ऐसा न करें।
11) बाज़ हज़रात हजरे असवद के अलावा खाना क़ाबा के दूसरे हिस्से का भी बोसा लेते हैं और छूते हैं जो गलत है, बल्कि बोसा सिर्फ हजरे असवद या खाना क़ाबा के दरवाज़े का लिया जाता है, रुक्ने यामनी और हजरे असवद के अलावा क़ाबा के किसी हिस्सा को भी तवाफ़ के दौरान न छुएं, अलबत्ता तवाफ़ और नमाज़ से फ़राग़त के बाद मुल्ताज़िम पर जा कर उससे चिमट कर दुआ मांगना हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है।
12) रुक्ने यमानी का बोसा लेना या दूर से उसकी तरफ हाथ से इशारा करना गलत है, बल्कि तवाफ़ के दौरान उसको सिर्फ हाथ लगाने का हुक्म है वह भी अगर सहूलत से किसी को तकलीफ दिए बगैर मुमकिन हो।
13) बाज़ हज़रात मकामे इब्राहीम का इस्तिलाम करते हैं और उसका बोसा लेते हैं, अल्लामा नौवी (रहमतुल्लाह अलैह) ने इज़ाह और इब्ने हजर मक्की (रहमतुल्लाह अलैह) ने तौज़ीह में फ़रमाया है कि मकामे इब्राहीम का न इस्तिलाम किया जाये और न उसका बोसा लिया जाये यह मकरूह है।
14) बाज़ हज़रात तवाफ़ के दौरान हजरे असवद के सामने देर तक खड़े रहते हैं, ऐसा करना गलत है क्योंकि इससे तवाफ़ करने वालों को परेशनी होती है सिर्फ थोड़ा रुक कर इशारा करें और बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कह कर आगे बढ़ जाएं।
15) बाज़ हुज्जाजे किराम तवाफ़ के दौरान अगर गलती से हजरे असवद के सामने से इशारा किये बगैर गुज़र जाऐं तो वह हजरे असवद के सामने दुबारा वापस आने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं जिससे तवाफ़ करने वालों को बेहद परेशानी होती है, इसलिए अगर ऐसा हो जाये और भीड़ ज़्यादा हो तो दुबारा वापस आने की कोशिश न करें, क्योंकि तवाफ़ के दौरान हजरे असवद का बोसा लेना या उसकी तरफ इशारा करना सुन्नत है वाजिब नहीं।
16) तवाफ़ के दौरान रुक्ने यमानी को छूने के बाद (हजरे असवद की तरह) हाथ का बोसा देना गलत है।
17) तवाफ़ और सई के हर चक्कर के लिए मख़्सूस दुआ को ज़रूरी समझना गलत है, बल्कि जो चाहें और जिस ज़बान में चाहें दुआ करें।
18) भीड़ के वक़्त हुज्जाजे किराम को तकलीफ देकर मक़ामे इब्राहीम के क़रीब ही तवाफ़ की दो रिकात अदा करने की कोशिश करना गलत है बल्कि मस्जिदे हराम में जहाँ जगह मिल जाये यह दो रिकात अदा कर लें।
19) तवाफ़ और सई के दौरान चंद हज़रात का आवाज़ के साथ दुआ करना सही नहीं है क्योंकि इससे दूसरे तवाफ़ और सई करने वालों की दुआओं में खलल पड़ता है।
20) बाज़ हज़रात को जब तवाफ़ या सई के चक्करों में शक हो जाता है तो वह दुबारा तवाफ़ या सई करते हैं, यह गलत है बल्कि कम अदद तसलीम करके बाकी तवाफ़ या सई के चक्कर पूरे करें।
21) बाज़ हज़रात सफा और मरवा पर पहुंच कर खाना काबा की तरफ हाथ से इशारा करते हैं, ऐसा करना गलत है बल्कि दुआ की तरह दोनों हाथ उठा कर दुआएं करें, हाथ से इशारा न करें।
22) बाज़ हज़रात नफ्ली सई करते हैं जबकि नफ्ली सई का कोई सबूत नहीं है।
23) बाज़ हुज्जाजे किराम अरफ़ात में जबले रहमत पर चढ़ कर दुआएं मांगते हैं, हालांके पहाड़ पर पढ़ने की कोई फ़ज़ीलत नहीं है बल्कि उसके नीचे या अरफ़ात के मैदान में किसी भी जगह खड़े होकर काबा की तरफ रुख करके हाथ उठा कर दुआएं करें।
24) अरफ़ात में जबले रहमत की तरफ रुख करके और काबा की तरफ पीठ करके दुआ मांगना गलत है, बल्कि दुआ के वक़्त काबा की तरफ रुख करें खाह जबले रहमत पीछे हो या सामने।
25) अरफ़ात से मुज़दलफा जाते हुये रास्ता में सिर्फ मगरिब या मगरिब और इशा दोनों का पढ़ना सही नहीं है, बल्कि मुज़दलफा पहुंच कर ही इशा के वक़्त में दोनों नमाज़ें अदा करें।
26) बाज़ हज़रात अरफ़ात से निकल कर मुज़दलफा के मैदान आने से पहले ही मुज़दलफा समझ कर रात को रुक जाते हैं जिससे उन पर दम भी वाजिब हो सकता है, लिहाज़ा मुज़दलफा के हुदूद में दाखिल होकर ही ठहरें।
27) मुज़दलफा पहुंच कर मगरिब और इशा की नमाज़ पढ़ने से पहले ही कंकरियाँ उठाना सही नहीं है, बल्कि मुज़दलफा पहुंच कर सबसे पहले इशा के वक़्त में दोनों नमाज़ें अदा करें।
28) बहुत से हुज्जाजे किराम मुज़दलफा में 10 ज़िलहिज्जा की फज्र की नमाज़ पढ़ने में जल्द बाज़ी से काम लेते हैं और क़िबला रुख होने में इहतियात से काम नहीं लेते जिससे फज्र की नमाज़ नहीं होती, लिहाज़ा फज्र की वक़्त दाखिल होने के बाद ही पढे नीज़ क़िबला का रुख वाक़िफ़ हज़रात से मालूम करें।
29) मुज़दलफा में फज्र की नमाज़ के बाद अरफ़ात के मैदान की तरफ हाथ उठा कर क़िबला रुख हो कर खूब दुआएं मांगी जाती हैं, मगर अक्सर हुज्जाजे किराम इस अहम वक़्त के वक़ूफ़ को छोड़ देते हैं।
30) बाज़ हज़रात वक़्त से पहले ही कंकरियाँ मारना शुरू कर देते हैं हालांके रमी के औक़ात से पहले कंकरियाँ मारना जाएज़ नहीं है, पहले दिन यानि 10 ज़िलहिज्जा को आफ़ताब निकलने के बाद से कंकरियाँ मारी जा सकती हैं, बाज़ फुक़हा ने सुबह सादिक़ के बाद से कंकरियाँ मारने की इजाज़त दी है मगर 11 और 12 ज़िलहिज्जा को आफ़ताब यानि ज़ूहर की अज़ान के बाद ही कंकरियाँ मारी जा सकती हैं, हां अगर कोई शख्स गुरूब आफताब से पहले कंकरियाँ न मार सका तो हर दिन की कंकरियाँ उस दिन के बाद आने वाली रात में भी मार सकता है।
31) बाज़ लोग कंकरियाँ मारते वक़्त यह समझते हैं कि इस जगह शैतान है इसलिए कभी कभी देखा जाता है कि वह उसको गाली बकते हैं और जूता वगैरह भी मार देते हैं, इसकी कोई हकीकत नहीं बल्कि छोटी छोटी कंकरियाँ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की इत्तिबा में मारी जाती हैं। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जब अल्लाह क़े हुक्म से हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को ज़बह करने के लिए ले जा रहे थे तो शैतान ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को इन्ही तीन मुक़ामात पर बहकाने की कोशिश की, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने इन तीनों मुक़ामात पर शैतान को कंकरियाँ मारी थीं।
32) बाज़ ख़वातीन सिर्फ भीड़ की वजह से खुद रमी नहीं करतीं बल्कि उनके महरम उनकी तरफ से भी कंकरियाँ मार देते हैं, उस पर दम वाजिब होगा क्योंकि सिर्फ भीड़ उज़रे शरई नहीं है और बिला उज़रे शरई किसी दूसरे से रमी कराना जाएज़ नहीं है, औरतें अगर दिन में कंकरियाँ मारने नहीं जा सकती हैं तो वह रात में जा कर कंकरियाँ मारें, हाँ अगर कोई औरत बीमार या बहुत ज़्यादा कमज़ोर है कि वह जमरात जा ही नहीं सकती है तो उसकी जानिब से कोई दूसरा शख्स रमी कर सकता है।
33) बाज़ हज़रात 11, 12 और 13 ज़िलहिज्जा को पहले जमरह और बीच वाले जमरह पर कंकरियाँ मारने क़े बाद दुआएं नहीं करते, यह सुन्नत क़े खिलाफ है, लिहाज़ा पहले और बीच वाले जमरह पर कंकरियां मार कर थोड़ा दायें या बाएं जानिब हट कर खूब दुआएं करें, यह दुआओं क़े क़बूल होने क़े खास औकात हैं।
34) बाज़ लोग 12 ज़िलहिज्जा की सुबह को मिना से मक्का तवाफ़ विदा करने के लिए जाते हैं और फिर मिना वापस आकर आज की कंकरियाँ ज़वाल क़े बाद मारते हैं और यहीं से अपने शहर को सफर कर जाते हैं। यह गलत है, क्योंकि आज की कंकरियाँ मारने क़े बाद ही तवाफ़ विदा करना चाहिए।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)