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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

उमरह में तवाफे विदा जरूरी नहीं है

जमहूर उलमा की राय है कि उमरह की अदाएगी करने वालों पर अपने शहर या वतन वापसी के वक्त तवाफे विदा वाजिब नहीं है। हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के बहुत से उलमा (जो मुख्तलफफी मसाइल में क़ुरान व सुन्नत की रोशनी में हजरत इमाम अबु हनीफा रहमतुल्लाह अलैह) की राय को बेहतर करार देते हैं) की भी यही राय है। सउदी अरब के साबिक मुफती शैख अब्दुल अजीज बिन बाज़ ने भी मुतमेरीन के लिए तवाफे विदा के वाजिब न होने का फतवा दिया है जो इंटरनेट के इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है।
http://www.binbaz.org.sa/mat/19147
उमरह की अदाएगी की सूरत में तवाफे विदा के वाजिब न होने के अमूमन नीचे मज़मून में दलाइल पेश किए जाते हैं।
1) किसी भी एक सही हदीस में उमरह की अदाएगी के बाद तवाफे विदा के वाजिब होने का ज़िक्र मौजूद नहीं है।
2) नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने बहुत उमरह किए मगर किसी एक की अदाएगी के बाद भी तवाफे विदा नहीं किया।
3) उमरह में तवाफे विदा के वुजूब के मुतअल्लिक किसी सहाबी का कोई कौल अहादीस की किताबों में मौजूद नहीं है।
4) हजरत आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने हज्जतुल विदा के सफर में हज की अदाएगी के बाद उमरह की अदाएगी की थी मगर किसी भी हदीस में उमरह की अदाएगी के बाद हजरत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा) का तवाफे विदा करना साबित नहीं है।
हज्जतुल विदा के मौका पर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान ‘‘कोई शख्स तवाफ के बेगैर मक्का से रवाना न हो‘‘ उमरह की अदाएगी में तवाफे विदा के वाजिब होने के लिए दलील नहीं बन सकता है क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमान का ‘‘कोई भी हाजी तवाफे विदा के बेगैर मक्का से रवाना न हो, हाँ हाईजा औरत बेगैर तवाफे विदा के अपने घर जा सकती है‘‘ हज्जतुल विदा के मौका पर हुज्जाजे किराम से था, जैसा कि जलीलुल कदर सहाबी हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से इस हदीस की तशरीह मरवी है कि इस में खिताब हुज्जाजे किराम से है। शैख अब्दुल अजीज बिन बाज़ ने अपने मज़कूरा फतवा में हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) का बयान लिखा है। नीज़ बाज़ अहादीस में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मज़कूरा फरमान इन अलफाज़ के साथ आया है ‘‘जिन हजरात ने बैतुल्लाह का तवाफ किया है वह अपना आखरी अमल तवाफ को बनाऐं‘‘ जिससे वाज़ेह तौर पर मालूम होता है कि यह हुकुम हज अदा करने वालों के लिए है। रही सही मुस्लिम की हदीस ‘‘यानी उमरह में वह करो जो हज में किया है‘‘ तो यह हदीस उमरह में तवाफे विदा के वाजिब होने की दलील नहीं बन सकती क्योंकि इस हदीस में उमरह में तवाफे विदा के वाजिब होने का कोई ज़िक्र नहीं है और अगर इस हदीस को आम मान लिया जाए तो फिर उमरह में भी मिना, मुज़दलफा और अरफात में जाना जरूरी हो जाएगा जिसका कोई काइल नहीं है। नीज़ तवाफे विदा के वाजिब करार देने में उमरह को हज पर क़यास करना सही नहीं है क्योंकि उमरह के आमाल घंटों में जबकि हज के आमाल दिनों में पूरा होते हैं।
बाज़ हजरात ने तिर्मीज़ी में लिखी हुई हदीस ‘‘मन हज्ज अव इतमर आखिर तक‘‘ को उमरह में तवाफे विदा के वुजूब की दलील बनाई है हालाँकि यह हदीस कमज़ोर है खुद इमाम तिर्मीज़ी ने इस हदीस को रिवायत करने के बाद हदीस गरीब कहा है। शैख नासिरूद्दीन अलबानी (रहमतुल्लाह अलैह) ने फरमाया कि यह हदीस इस लफ्ज़ के साथ मुंकिर है यानी अवितमर का लफ्ज इस हदीस में सही नहीं है।
(वजाहत)
अगर कोई शख्स उमरह की अदाएगी के बाद जल्दी ही मक्का से रवाना हो रहा है जैसा कि सउदी अरब के रहने वाले हजरात आम तौर पर महदूद प्रोग्राम के तहत उमरह की अदाएगी के लिए मक्का जाते हैं तो उन हज़रात के लिए उम्मते मुस्लिम तवाफे विदा के वाजिब न होने पर मुत्तफिक है। इखतिलाफ सिर्फ इस सूरत में है जब कोई शख्स उमरह की अदाएगी के बाद मक्का में मुक़ीम रहे जैसा कि आम तौर पर सउदी अरब के बाहर से आने वाले मुतमेरीन। इन हजरात के लिए भी ऊपर ज़िक्र किए हुए दलाइल की रोशनी में जमहूर उलमा की राय है कि तवाफे विदा वाजिब और जरूरी नहीं है। गरज़ ये कि उमरह में तवाफे विदा नहीं है।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)