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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

हज / उमरह में हलक़ (बाल मुंडवाना) या क़सर (छोटा करवाना)

हज/उमरह में अल्लाह तआला के साथ वालिहना मोहब्बत और इस मोहब्बत में सब कुछ भुला देने का इज़हार होता है। सिले हुए कपड़े उतार कर एक कफ़न नुमा लिबास पहन लिया जाता है, अब जिस्म की ज़ीनत का होश है न कपड़ों के हुस्न का, ज़्यादा सफाई का ख्याल है, न बाल काटने का, बस लब्बैक लब्बैक की रट है, नीज़ अल्लाह तआला के घर पहुंच कर दीवानों की तरह काबा और सफा मरवा के चक्कर लगाना और सर की ज़ीनत बालों को कटवाना है।
हलक़ के मानी सर के बाल मुंडवाना और क़सर के मनी बालों का कटवाना है।
हज/उमरह में हलक़ या क़सर ज़रूरी है, उसके छोड़ने पर एक दम लाज़िम होगा बल्कि हज़रत इमाम शाफई (रहमतुल्लाहि अलैह) के नुक़्तए नज़र में तो हलक़ या क़सर हज/उमरह के अरकान में से है यानि इसके बगैर हज या उमरह अदा हो ही नहीं सकता चाहे कितने ही दम दे दिये जाएं।
पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक है कि मर्द हज़रात के लिए सर मुंडवाना अफज़ल है इसलिए कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हलक़ कराने वालों यानी बाल मुंडवाने वालों के लिए रहमत और मगफिरत की दुआ तीन मर्तबा फ़रमाई है और बाल छोटा कराने वालों के लिए सिर्फ एक बार दुआ फ़रमाई है।
हज़रत अबु हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया ए अल्लाह! सर मुंडवाने वालों की मगफिरत फरमाइये, सहाबा ने अर्ज़ किया कि बाल कटवाने वालों के लिए (भी दुआ फरमा दीजिये) लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस मर्तबा भी यही फ़रमाया ए अल्लाह! सर मुंडवाने वालों की मगफिरत फरमाइये, सहाबा ने अर्ज़ किया कि बाल कटवाने वालों के लिए (भी दुआ फरमा दीजिये) तीसरी मर्तबा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया और बाल कटवाने वालों की भी मगफिरत फरमाइये। (बुखारी व मुस्लिम)
नीज़ अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में बाल मुंडवाने वालों का ज़िक्र बाल कटवाने वालों से पहले किया है। (सूरह अल फतह 27) नीज़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद भी बाल ही मुंडवाए। (मुस्लिम)
औरतों के लिए चूँकि सर के बाल मुंडवाना नाजायज़ है, लिहाज़ा उनके लिए सिर्फ क़सर ही है, यानी वह अपनी चोटी के आखिर से उंगली के एक पूरे के बराबर बाल काट दें। (तिर्मिज़ी)
सर मुंडवाने के लिए ज़रूरी है कि पूरे सर के बाल मूंडे जाएं, इसलिए कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आधे या चौथाई सर के बाल मूंडने से मना फ़रमाया है जैसा कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) की रिवायत बुखारी व मुस्लिम में है।
सर मुंडवाने की तरह बालों की कटिंग भी पुरे सर की होनी चाहिए इसलिए कि मज़कूरा आयात में क़सर को हलक़ के साथ ज़िक्र किया है, जब हलक़ पूरे सर का है तो क़सर यानी बालों की कटिंग भी पूरे सर की ही होनी चाहिए, नीज़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म और सहाबाए किराम से किसी भी वक़्त चंद बाल सर के एक तरफ से और चंद बाल दूसरी तरफ से कैंची से काट कर एहराम खोलना साबित नहीं है, सिर्फ इमाम अबू हनीफा (रहमतुल्लाहि अलैह) ने वुज़ू के मसह पर क़यास करके कम से कम चौथाई सर के बाल काटने की शकल में वुजूब के अदा होने का फैसला दिया है- लिहाज़ा मालूम हुआ कि चंद बाल सर के एक तरफ से और चंद बाल दूसरी तरफ से कैंची से काट कर एहराम खोल देना जायज नहीं है, ऐसी सूरत में दम वाजिब हो जायेगा, लिहाज़ा या तो सर के बाल मुंड़वाएं या मशीन फिरवाये या इस तरह बालों को कटवाएं कि पूरे सर के बाल कुछ न कुछ कट जाएं। क़ुरान की आयत:
“अपने सर के बाल मुंड़वाओ और छोटा करो” से भी मालूम होता है कि सर पर कटिंग का असर ज़रूर ज़ाहिर होना चाहिए, चंद बालों की कटिंग से यह मकसद हासिल नहीं होता है।
औरतें अपनी चोटी का सर पकड़ कर एक पूरे के बराबर बाल खुद काट लें या किसी महरम या शौहर से कटवा लें।
सर के बाल हदूदे हरम के अंदर किसी भी जगह कटवा सकते हैं चाहे हज अदा कर रहे हों या उमरह।
बाल मुंडवाने या कटवाने से पहले नह एहराम खोले और न ही नाख़ून वगैरह काटें वरना दम लाज़िम हो जायेगा।
अगर किसी शख्स के सर पर बाल ही नहीं हैं तो वह ऐसे ही सर पर उस्तरा फिरवादे और एहराम उतार दे।
जब हाजी या मोतमिर हज या उमरह के तमाम आमाल से फारिग़ हो जाये और सिर्फ हलक़ या क़सर का अमल बाकी रह गया है तो हाजी या मोतमिर एक दूसरे के बाल कट सकता है।
बाज़ ने अक़ली दलाएल की रौशनी में जो लिखा है कि चंद बाल क़सर के लिए काफी हैं, उनका मतलूब सिर्फ ऐसे शख्स को दम से बचना है जो ऐसी गलती कर चुका हो, लेकिन उनका पूरा अमल पूरे सर के बाल मुंडवाने या कटवाने का ही है, लिहाज़ा जो मर्द हज़रात अपने बालों की इतनी भी क़ुरबानी नहीं दे सकते कि छोटे करालें तो उनसे मेरी दरखास्त है कि वह ज़िन्दगी में बार बार हज/उमरह न करें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)