بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह

आप के पांच सवालात के जवाबात अपनी मालूमात के मुताबिक़ लिख रहा हूँ, अल्लाह तआला सही बात लिखने की तौफ़ीक़ अता फरमाये। (आमीन)
1- किसी शख्स के इंतिकाल के बाद उसकी जानिब से उमरह की अदायगी की जा सकती है। औरत मर्द की तरफ से और मर्द औरत की तरफ से उमरह बदल कर सकता है, लेकिन किसी ज़िंदा की जानिब से उमरह की अदायगी नहीं की जा सकती है।
2- एक मर्तबा एहराम बांध कर एक ही उमरह की अदायगी की जा सकती है, अलबत्ता एक उमरह से फराग़त के बाद अगर दूसरा उमरह अदा करना चाहते हैं तो हिल में किसी भी जगह (मसलन तनयीम जहाँ मस्जिदे आयशा बनी हुई है) जाएँ, उमरह की नियत करके तल्बिया पढ़ लें और फिर उमरह की अदायगी कर लें। दूसरे उमरह की अदायगी के लिये एहराम की चादरों को बदलना या पलटना या धोना ज़रूरी नहीं है। यानि एहराम की चादरों को एक से ज़्यादा उमरह की अदायगी के लिये इस्तेमाल कर सकते हैं, मगर हर उमरह की अदायगी के बाद बालों का कटवाना या मुंडवाना ज़रूरी है। याद रखें कि एक सफर में बार बार उमरह करने के बजाये तवाफ़ ज़्यादा करना अफज़ल और बेहतर है।
3- नियत असल में दिल के इरादा का नाम है, यानि जिस वक़्त आप घर से उमरह की अदायगी के लिये रवाना हुए तो नियत हो गई, मगर बेहतर यह है कि एहराम के कपड़े पहनने के बाद तल्बिया पढ़ने से पहले ज़बान से नियत कर लें और नियत के लिए अरबी ज़बान के अलफ़ाज़ ही इस्तेमाल करना ज़रूरी नहीं है, बल्कि आप उर्दू ज़बान में भी नियत कर सकते हैं। किसी दूसरे शख्स की जानिब से उमरह की अदायगी की सूरत में जिस की जानिब से उमरह अदा कर रहे हैं तो उसकी जानिब से उमरह की नियत करें, मसलन यू कहें कि मैं अपने वालिद की जानिब से उमरह अदा करने की नियत करता हूँ।
4- हर तवाफ़ के बाद दो रिकात नमाज़ अदा की जाती है (चाहे हज का तवाफ़ हो, उमरह का या नफ्ली तवाफ़) तवाफ़ की यह दो रिकात नमाज़ तवाफ़ के बाद मस्जिदे हराम में किसी भी जगह अदा कर सकते हैं, अगर भीड़ ज़्यादा न हो तो मक़ामे इब्राहिम के पीछे अदा करना अफज़ल व बेहतर है।
5- तवाफ़ और सई के दौरान कोई भी दुआ लाज़िम और ज़रूरी नहीं है, जो चाहें, जिस ज़बान में चाहें दुआ मांगे। फिर भी आप की खाहिश के मुताबिक़ उमरह के दौरान जिन दुआओं का ज़िक्र अहादीस में आया है उनको मुख़्तसर लिख देता हूँ:
“रब्बना आतिना आखिर तक” अगर याद हो तो ज़मज़म का पानी पी कर अल्हम्दु लिल्लाह कहकर यह दुआ पढ़े:
“अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका आखिर तक” सफा पर पहुंच कर बेहतर है कि ज़बान से कहें:
“अबदउ बिमा बदअल्लाहु बिहि आखिर तक” फिर काबा की तरफ रुख कर के दुआ की तरह हाथ उठा लें और तीन मर्तबा अल्लाहु अकबर कहें और यह दुआ याद हो तो इसे भी पढ़े:
“ला इलाहा इल्लाहु वह्दहू ला शारिका लहु आखिर तक” सई के दौरान भी कोई खास दुआ लाज़िम नहीं अलबत्ता इस दुआ को खास तौर पर पढ़ते रहें:
“रब्बिग्फिर वरहम व तजवाज़ अम्मा तालम आखिर तक”
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)