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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

एक सफर में एक से ज़्यादा उमरह की अदायगी

साहबे इस्तिताअत के लिए ज़िन्दगी में एक मर्तबा उमरह अदा करना सुन्नत है और एक से ज़्यादा करना मुस्तहब है, मदीना मुनव्वरा से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तक़रीबन चार उमरे की अदायगी फ़रमाई, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उमरह के बहुत से फ़ज़ाएल बयान किये हैं, जिनमें दो अहादीस नीचे लिखे हुए हैं:
(1) एक उमरह दूसरे उमरह तक उन गुनाहों का कफ़्फ़ारा है जो दोनों उमरों के दरम्यान सरज़द हों और हज मब्रूर का बदला तो जन्नत ही है- (बुखारी व मुस्लिम)
(2) पै दर पै हज व उमरे किया करो, बेशक यह दोनों (हज व उमरह) गरीबी और गुनाहों को इस तरह दूर कर देते हैं जिस तरह भट्टी लोहे और सोने व चांदी के मैल कुचैल को दूर कर देती है। (तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)
हिन्द व पाक या रियाज़ वगैरह से मक्का जाने वाले हज़रात वक़्त से फायदा उठा कर एक सफर में एक उमरह की अदायगी के बाद हस्बे सहूलत दूसरे या तीसरे उमरह की अदायगी भी करते हैं, मगर बाज़ हज़रात एक सफर में एक से ज़्यादा उमरह करने को यह कह कर मना करते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक सफर में एक से ज़्यादा उमरह नहीं किया, हालांकि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बार बार उमरह करने की तर्ग़ीब दी है जैसा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात ज़िक्र किये गए हैं, नीज़ उमरह की अदायगी का कोई वक़्त नहीं, साल में पांच दिन जिनमें हज अदा होता है यानि 9 ज़िलहिज्जा से 13 ज़िलहिज्जा तक उमरह करना मकरूह है जैसा कि हदीस की मशहूर किताब (बैहिक़ी) में लिखा है कि हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि इन पांच दिनों के अलावा साल भर में जब चाहें (रात या दिन में) और जितने चाहें उमरह करें, एक सफर में एक से ज़्यादा उमरह की अदायगी से रोकने के लिए शरई दलील मतलूब है, जो ज़ाहिर है पूरे ज़ख़ीरए हदीस में मौजूद नहीं है, सिर्फ यह कहना कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से ऐसा साबित नहीं है काफी नहीं होगा, मसलन हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमजान में उमरह की अदायगी नहीं की, सिर्फ एक मौका पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक सहाबिया की खास मजबूरी सुन कर रमज़ान में उमरह की फ़ज़ीलत बयान की थी, जैसा कि बुखारी व मुस्लिम की हदीस में लिखा है, मगर जमहूर फुक़हा व उलमा मुत्तफ़िक़ हैं कि एक औरत को नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़रिया बयान की गई फ़ज़ीलत क़यामत तक आने वाले तमाम इंसानों (मर्द व औरत) के लिये है अगरचे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ानुल मुबारक में कोई उमरह अदा नहीं किया।
(3) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अंसार की एक औरत (उम्मे सनान रज़ियल्लाहु अन्हा) से फ़रमाया तुम हमारे साथ हज करने क्यों नहीं जाती? उन्होंने अर्ज़ किया हमारे पानी लाने के दो ही ऊँट थे, एक पर मेरा शौहर और बेटा हज के लिये गया है और एक ऊँट हमारे पानी लाने के लिये छोड़ दिया है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अच्छा रमज़ान आये तो उमरह कर लेना, इसलिए कि इसका सवाब भी हज के बराबर है। (सही बुखारी-अब्वाबुल उमरह- उमरह फि रमज़ान) सही मुस्लिम में इस तरह लिखा है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: मेरे साथ हज के बराबर है यानि रमज़ान में उमरह की अदायगी हुज़ूर अकरम सल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ हज की अदायगी के बराबर है। (सही मुस्लिम- किताबुल हज - बाब फज़लुल उमरह फि रमज़ान)
(वज़ाहत) जिस तरह कोई शख्स हर साल रमज़ान में उमरह की अदायगी का एहतिमाम कर सकता है इसी तरह एक सफर में एक से ज़्यादा उमरह भी कर सकता है, हाँ उमरह ज़्यादा करने के बजाये तवाफ़ ज़्यादा करना अफज़ल और बेहतर है, जो हज़रात एक से ज़्यादा उमरह करते हैं हर बार सर पर उस्तरा या मशीन फिरवाले या बालों को कटवाले, एक से ज़्यादा उमरह करने के लिये एहराम के कपड़ों को धोना या तब्दील करना ज़रूरी नहीं है, एक मर्तबा उमरह की अदायगी के बाद दूसरे उमरह की अदायगी के लिये मक्का वालों की तरह हरम से बाहर जाना होगा, हिल में मस्जिदे हराम से सब से ज़्यादा करीब जगह तनयीम है जहाँ से हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात के मुताबिक़ अपने हज की अदायगी के बाद उमरह का एहराम बांधने के लिये गई थीं, अब इस जगह मस्जिदे आयशा बनी हुई है।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)